महिषासुर शहादत दिवस पर बोले उनके अनुयायी- बंद हो हत्या का जश्न

यहां के आदिवासी समुदाय दस दिनों तक शोक मनाते है। दशाई नृत्य का आयोजन भी आदिवासी समुदाय अपने राजा के याद में करते है। इस नृत्य का जो गीत है, उसी में उनकी इतिहास का कहानी छुपी हुई है…………..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज। झारखंड के चांडिल में आज 7 अक्टूबर को हर वर्ष की भांति देशज संस्कृति मंच की ओर से चिलगु-चाकुलिया, चांडिल में आदिम होड़ महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया। सबसे पहले आदिम होड़ महिषासुर के फोटो पर माल्यार्पण किया गया। इसके बाद एक छोटी सी सभा का भी आयोजन किया गया।

शहादत दिवस पर सभा को संबोधित करते हुए साथियों ने कहां कि असुर एक आदिवासी समुदाय से है। जो आज भी झारखण्ड के पलामू, नेतरहाट आदि क्षेत्र में निवास करते है। असुर समुदाय ने ही दुनिया में पहली बार लोहा बनाने का महारत हासिल किया था। लेकिन आज समाज में असुरों का चित्रण गलत तरीके से चित्रण किया जा रहा है।

देशज संस्कृति मंच ने दुर्गोमहोत्सव मनाने वाले सभी से निवेदन किया कि जिसको दुर्गा महोत्सव मनाने हैं, वे मनाएं। लेकिन उनके आदिम होड़ महिषासुर को मारते हुए न दिखाए। हत्या का जश्न बंद किया जाय।

देशज संस्कृति मंच के संरक्षक कपूर बागी ने कहां कि हमारा इतिहास लिखा हुआ नहीं है। हमारे आदिवासी पूर्वज आदि काल से हमारे वीर लड़ाके को अपने अपने गीत-भाषा- संस्कृति-सभ्यता के माध्यम से हमारे इतिहास को जिंदा रखा है।

उन्होंने आगे कहा कि राक्षक का मतलब होता है  रक्षा करने वाला। यानी हमारे पूर्वजों ने हमारे जल-जंगल-जमीन रक्षा के लिए उठ खड़ा हुआ तो उन्हें रक्षक कहां गया और आज भी हमारे पूर्वज हमारे जल जंगल जमीन के रक्षा के लिए संघर्ष जारी है।

इस कार्यक्रम में मुख्य रूप दिनकर कच्छप, सुमन मुखी, चंदन सिंह, बिरश्पती सिंह सरदार, सुदाम हेंब्रम, प्रकाश महतो, दीपक रंजीत, सुनील हेंब्रम, सुकराम टुडू, होपना हांसदा, घनश्याम महतो, देवनाथ शर्मा, ओम प्रकाश, चंदन महतो, स्वपन किस्कू, सुकेन्दर हेम्ब्रम आदि लोग मुख्य रूप से उपस्थित थे।

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