पढ़ेगी बेटी-बढ़ेगी बेटीः लेकिन कहते हैं गार्जियन- ‘माहौल खराब है, हम बेटियों को नहीं जाने देंगे स्कूल’

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“एक ओर जहां झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास पूरे प्रदेश में बालिका शिक्षा पर जोर देते हुए बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा दे रहे हैं, वहीं उनके ही प्रदेश में बेटियां आठवीं पास करने के बाद ही पढ़ाई छोड़ रही हैं। जमाने को देख मां-बाप बेटियों को दूसरे गांव स्कूल भेजने को तैयार नहीं…..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क (वीरेन्द्र मंडल)। झारखंड प्रांत के सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ प्रखंड का चौड़ा गांव स्कूल विलय का दंश झेल रहा है। आठवी के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रहीं बेटियां। बेटियां पढ़ना चाहती हैं, लेकिन पढ़ने-बढ़ने का उनका सपना गांव की गलियों में ही टूट रहा है।

सरायकेला जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर स्थित कुकड़ू प्रखंड का एक मुस्लिम बहुल गांव है चौड़ा। करीब 5000 लोगों की आबादी वाले इस गांव में अधिकांश लोग गरीब तबके के हैं ओर यहां के लोग नाईटी, पेटीकोट वगैरह सिलाई कर अपना घरबार चलाते है।

गांव में मिडिल तक की पढ़ाई का इंतजाम तो है, लेकिन इससे आगे कुछ नहीं। आठवीं पास करके अधिकांश बेटियों और बेटों को पढ़ाई छोड़ घर में बैठना पड़ रहा है। 

वहीं नौवीं और दसवीं की पढ़ाई के लिए 6 किलोमीटर दूर तिरुलडीह हाई स्कूल जाना पड़ता है, लेकिन अधिकांश मां-बाप अपनी बेटियों को गांव से बाहर पढ़ने नहीं भेजते। सबसे अहम कारण बेटियों की सुरक्षा है, जिससे वे समझौता नहीं करना चाहते।

कहते हैं माहौल खराब है, हम बेटियों को नहीं जाने देंगे। अगर गांव में ही आगे की पढ़ाई हो जाए तो बेटियो को पढ़ाने वे तैयार हैं। गांव के लोग और स्कूलों में पढ़ने वाली बेटियां  भी कहती हैं कि पिछले कुछ सालों में गांव की कई बेटियों ने मजबूरी में पढ़ाई छोड़ दी। गांव में ही स्कूल होता तो गांव की बेटियां भी पढ़-लिखकर सपने साकार करतीं।

दरसअल सरायकेला जिले के कुकड़ू प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय चौड़ा को सत्र 2015-16 में हाई स्कूल का दर्जा दिया गया था। और उसके बाद से सत्र 2015-16 ,2016,17 व सत्र 2017-18 को लगातर तीन बार चौड़ा हाई स्कूल से बच्चो ने मैट्रिक की परीक्षा भी दी, साथ ही तीनो बार हाई स्कूल का रिजल्ट भी शत प्रतिशत हुआ।

लेकिन वर्ष 2018 में चौड़ा हाई स्कूल को तिरुलडीह हाई स्कूल से विलय कर दिया गया। जिसका दंश चौड़ा सहित आसपास के एक दर्जन गांव के बच्चे झेल रहे हैं। और आठवीं के बाद स्कूल छोड़ने को मजबूर है।

वही कई संगठनों ने सरकार पर स्कूलों को बंद कर शराब की दुकानें खोलने का आरोप लगाया है। ग्रामीणों ने सरकार के सबका साथ, सबका विकास ओर सबका विश्वास के नारे को झूठा बताया है और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ओर सरकार पर सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया है।

आजादी के 70 साल होने के बाद आज भी अनेको ऐसे गांव विकास के लिए दुर्दशा के आंसू बहा रहें है। चुनाव के समय जनप्रतिनिधी अनेकों वायदे और घोषणाएं करते है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद विकास करने  पीछे गांवो की ओर मुडकर नहीं देखते।

हमारे देश के प्रधानमंत्री भारत को डिजिटल इंडिया, शाईनिंग इडिया सहित विभिन्न नामो से नवाज रहें है। लेकिन लगता है प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि गांव की हकीकत जानने का प्रयास नहीं कर रहें है।

क्योंकि देश की 70 प्रतिशत आबादी गांव में ही निवास करती है और आजदी के 70 साल बीतने के बाद आज भी गांवो में मूल भूत सुविधाए सडक, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ जैसी महत्वपूर्ण सुविधाए तक उपलब्ध नहीं करा पाए तो देश को शाईनिंग डिजिटल, विश्व गुरू बनाने की थोथी कल्पना करना सरासर बेईमानी है।

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