डेटलाइन खत्म- एनडीए छोड़ने को लेकर कुशवाहा ‘कंफ्यूज्ड’

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केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा का एनडीए प्रेम बरकरार दिख रहा है।इसके पीछे उनकी मजबूरी भी है।फिलहाल वे एनडीए छोड़ने के फैसले को लेकर अपनी ही पार्टी में अलग थलग दिख रहे हैं। सांसद अरूण कुमार, नागमणि तथा भगवान सिंह कुशवाहा जैसे लोग पहले ही एनडीए नहीं छोड़ने की राय दे चुके हैं। यहां तक कि रालोसपा के दोनों विधायक भी एनडीए के साथ रहना चाहते हैं….”

टना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज ब्यूरो)। सीट शेयरिंग को लेकर रालोसपा सुप्रीमों सह केंद्रीय राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए छोड़ने को लेकर छह दिसंबर तक की डेटलाइन तय की थी।लेकिन डेटलाइन खत्म होने के बाद भी केंद्रीय मंत्री अभी तक एनडीए छोड़ने को लेकर कंफ्यूज्ड दिख रहे हैं ।

अभी तक उन्होंने एनडीए छोड़ने या रहने को लेकर कोई पते नहीं खोले हैं।लेकिन उन्होंने कहा है कि इस मामले में जल्द ही कोई फैसला लिया जाएगा । मीडिया के हवाले से मिल रही खबर के मुताबिक केंद्रीय मंत्री अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ सोमवार को मुलाकात करेंगे ।

देखा जाए तो अगर केंद्रीय राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए छोड़ने का फैसला लेते हैं तो इसका लोकसभा चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा।एनडीए को कितना झटका लग सकता है।

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलएसपी ने एनडीए  के साथ गठबंधन किया था, लेकिन पार्टी अकेले दम पर महज 3 प्रतिशत वोट ही ला पाई थी। दूसरी ओर, उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था।

जाहिर है वोट शेयर के मामले में आरएलएसपी से जेडीयू ने पांच गुना ज्यादा वोट प्राप्त किया था । 2015 के विधानसभा चुनाव में आरएलएसपी के साथ आने के बाद भी कुशवाहा वोटर एनडीए के साथ नहीं आए पाए थे।

यही नहीं, कई उपचुनावों में भी कुशवाहा समाज ने एनडीए का साथ नहीं दिया है। देखा जाए तो  उपेन्द्र कुशवाहा फैक्टर का फायदा एनडीए को अधिक नहीं मिला है।

दूसरा यह कि बिहार में अब सियासी समीकरण बदल गए हैं, क्योंकि नीतीश कुमार अब फिर से एनडीए गठबंधन में हैं। जाहिर है गठबंधन का वोट शेयर और बढ़ने की संभावना है।

यह तो साफ है कि नीतीश के आने से एनडीए की स्थिति और मजबूत हो गई है। ऐसी स्थिति में अगर कुशवाहा एनडीए से अलग भी होते हैं तो एनडीए को इसका ज्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा है।

2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के गठन के बाद भी कहा जाता रहा है कि  कुशवाहा मास के नहीं, मीडिया के लीडर रहे हैं। जमीन पर उनका जनाधार नगण्य है।

एक समय  ‘लव-कुश’ के नारे के सहारे नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी नसीब हुई। लेकिन कुशवाहा का कोई सर्वमान्य नेता नहीं उभर सका। जबकि नीतीश कैबिनेट में भी कई कुशवाहा मंत्री और नेता हैं।

चार साल केंद्रीय राज्य मंत्री रहते हुए भी श्री कुशवाहा अपने समाज का वोट बैंक भी नहीं बना सके। कुशवाहा बोट बैंक फिलहाल सीएम नीतीश कुमार के समर्थन में ही दिखता आ रहा है।

अगर केंद्रीय राज्य मंत्री एनडीए छोड़ने का फैसला लेते हैं तो  एनडीए को इसका ज्यादा नुकसान होने की संभावना नहीं दिख रही है। बल्कि खुद कुशवाहा का नुकसान हो सकता है।

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