“अगर मान भी लें कि किसी सरकारी बाबू की नींद खुली नहीं थी और उसने झारखंड सूचना आयोग की नियुक्ति का आवेदन शॉर्टलिस्ट कर दिया तो चयन समिति को कम से कम फाइल देखकर उसे रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहिए था। लेकिन सिफारिश की खूबसूरती देखिए कि वही आवेदन योग्य घोषित हो गया…
एक्सपर्ट मीडिया न्यूज / मुकेश भारतीय। लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए बनाए गए सूचना आयोग के चयन को देखकर अब कई लोगों को लगने लगा है कि शायद पारदर्शिता का असली मतलब आर-पार दिखने वाली सिफारिश होता है।
दरअसल, चर्चा इस बात की है कि जिन आवेदनों को स्क्रूटिनी में ही राम नाम सत्य हो जाना चाहिए था, वे न सिर्फ जीवित रहे, बल्कि पूरी शान से राज्यपाल तक पहुंच गए। अब सवाल उठ रहा है कि यह चयन प्रक्रिया थी या राजनीतिक प्रयोगशाला में किया गया कोई प्रैक्टिकल?
पत्रकार अनुज सिन्हा का नाम सामने आया तो किसी ने ज्यादा भौंहें नहीं तानीं। आखिर पत्रकारिता में उनकी पहचान है। यह अलग बात है कि हमारे यहां किसी भी व्यक्ति की पहचान एक बार तय हो जाए तो फिर वह चाहे सांसद बन जाए, शिक्षक बन जाए या किताबों की ट्रॉली भर लिख डाले, लोग उसे उसी पुराने पेशे से याद रखती है।
जैसे हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति बनकर भी देश में पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। कपिल सिब्बल चाहे जितनी राजनीति कर लें, पहचान वकील की ही रहती है। और शशि थरूर की छवि लेखक और डिप्लोमेट वाली ही चमकती रहती है।
इसलिए माना जा सकता है कि अनुज सिन्हा ने पत्रकारिता के खाते से आवेदन भरा होगा तो उनका चयन कम से कम तर्क की सीमा में तो बैठता है। लेकिन असली पहेली तो बाकी तीन नामों को लेकर है और वे हैं भाजपा के शिवपूजन पाठक, झामुमो के तनुज खत्री और कांग्रेस के अमूल्य नीरज खलखो। अब जनता के बीच सवाल घूम रहा है कि ये सज्जन किस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं?
अगर समाजसेवा के क्षेत्र से हैं तो किस समाज की सेवा की है? क्या ये सिमोन उरांव की तरह जल संरक्षण में लगे रहे? या छुटनी महतो की तरह अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ी? या फिर जमुना टुडू की तरह जंगल और पर्यावरण बचाने की मुहिम में जुटे रहे? या फिर उन्होंने भूख, कुपोषण, शिक्षा या स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ऐसा काम किया जिससे हजारों लोगों का जीवन बदल गया हो?
जनता की जिज्ञासा इतनी बढ़ी कि कुछ लोगों ने कोल्हान से लेकर संथाल तक दर्जनों लोगों से पूछ लिया कि भाई ये लोग कौन हैं? जवाब मिला कि कौन? पहली बार नाम सुन रहे हैं!
अब नियमावली पर नजर डालिए तो उसमें राजनीति, शिक्षण, कला-साहित्य या किसी पार्टी के संगठन में पद धारण करना सूचना आयुक्त बनने की योग्यता नहीं है। न ही पीएचडी, डिग्री या किताब लिख देना इस पद का टिकट है।
लेकिन जमीन की हकीकत यह है कि पाठक जी, खत्री जी और खलखो जी को जानने वाले लोग उन्हें मुख्यतः राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता के रूप में ही पहचानते हैं। नेता के अलावा किसी और रूप में उनकी पहचान न तो पहले रही और न ही आज दिखाई देती है। ऐसे में सामान्य समझ कहती है कि उनका आवेदन स्क्रूटिनी में ही छंट जाना चाहिए था।
अगर मान भी लें कि किसी सरकारी बाबू की नींद खुली नहीं थी और उसने आवेदन शॉर्टलिस्ट कर दिया तो चयन समिति को कम से कम फाइल देखकर उसे रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहिए था।
लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए कि वही आवेदन योग्य घोषित हो गया। अब लोग पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों हुआ? कुछ लोग कहते हैं कि यह योग्यता की जीत है। कुछ कहते हैं कि यह सिस्टम की महान उदारता है।
और कुछ सीधे शब्दों में कह रहे हैं कि भाई, बेईमानी करनी थी… इसलिए की गई। क्योंकि जब सूचना आयोग ही अगर सत्ता के इशारे पर चलने लगे तो फिर सूचना मांगने वालों को जवाब देने के लिए सिर्फ एक वाक्य काफी होगा कि सूचना उपलब्ध नहीं है, लेकिन सिफारिश उपलब्ध है। 😄📰


