
कल को रांची में बारिश कम हो जाए तो क्या यह भी कहा जाएगा कि पटना वाले बादल लेकर भाग गए? और अगर परीक्षा केंद्र पर पंखा बंद हो जाए तो क्या इसके पीछे भी कोई अंतरराज्यीय साजिश खोजी जाएगी?
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में JPSC-JSSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन अब सिर्फ परीक्षा और नियुक्ति का मामला नहीं रह गया है। इसमें राजनीति, प्रशासनिक जवाबदेही, निजी एजेंसी और अब बिहार-यूपी कनेक्शन का तड़का भी लग चुका है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 11 अगस्त को विधानसभा में कहा कि परीक्षा संचालन से जुड़ी TDPL कंपनी लखनऊ की है और आरोप लगाया कि वहां से षड्यंत्र कर यूपी-बिहार के कुछ लोगों के साथ जुड़ाव बनाकर झारखंड के युवाओं को दिग्भ्रमित किया जा रहा है।
अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर परीक्षा झारखंड में हुई, अभ्यर्थी झारखंड के हैं और परीक्षा व्यवस्था की निगरानी झारखंड की संस्थाओं की जिम्मेदारी है तो हर गड़बड़ी का भूगोल आखिर कब तक लखनऊ, पटना और दिल्ली घूमता रहेगा?
व्यंग्यकार की नजर से देखें तो मामला कुछ ऐसा दिखाई देता है। JPSC में विवाद हुआ तो कंपनी लखनऊ की। JSSC में सवाल उठा तो एजेंसी की जांच। छात्र सड़क पर आए तो विपक्ष पर राजनीति का आरोप। और अब चर्चा में आ गया यूपी-बिहार कनेक्शन। तो भाई, जनता पूछ सकती है कि हुजूर, नौकरी का विज्ञापन झारखंड का था या अंतरराज्यीय अपराध का टेंडर?
कल को रांची में बारिश कम हो जाए तो क्या यह भी कहा जाएगा कि पटना वाले बादल लेकर भाग गए? और अगर परीक्षा केंद्र पर पंखा बंद हो जाए तो क्या इसके पीछे भी कोई अंतरराज्यीय साजिश खोजी जाएगी? बेशक यह तंज है, लेकिन असली सवाल बेहद गंभीर है। परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही आखिर किसकी है?
छात्रों के लंबे आंदोलन के बीच मुख्यमंत्री ने विधानसभा में 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा को रद्द करने की घोषणा की। इसके अलावा दो अन्य JPSC परीक्षाओं को भी रद्द करने और TDPL द्वारा आयोजित परीक्षाओं की जांच कराने की बात कही गई है। TDPL ने JSSC CGL परीक्षा भी आयोजित की थी। सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार के लिए IIT, IIM और XLRI जैसे संस्थानों से सलाह लेने की बात भी कही है।
यानी सरकार ने अब रीसेट बटन’ दबाने का संकेत तो दे दिया है, लेकिन अभ्यर्थियों के लिए असली सवाल यह है कि अगली परीक्षा कितनी पारदर्शी होगी और पुरानी गड़बड़ियों की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
छात्र संगठनों की मांग सिर्फ आश्वासन तक सीमित नहीं है। वे परीक्षा विवादों की निष्पक्ष जांच और भर्ती प्रक्रिया में भरोसा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पिछले दिनों सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के कई दौर भी हुए, लेकिन आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि झारखंड की भर्ती परीक्षाओं से जुड़े पुराने विवाद भी अभी लोगों की स्मृति से बाहर नहीं हुए हैं। 2022 के JSSC जूनियर इंजीनियर भर्ती परीक्षा पेपर-लीक मामले में मुंबई से एक निजी एजेंसी के निदेशक की गिरफ्तारी की खबर सामने आई है। इससे परीक्षा संचालन में निजी एजेंसियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े हुए हैं।
यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि कंपनी कहां की है? असल सवाल यह है कि कंपनी को काम किसने दिया? उसकी जांच-पड़ताल कैसे हुई? निगरानी किसने की? गड़बड़ी हुई तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई? और सबसे महत्वपूर्ण कि अभ्यर्थी का भरोसा कौन लौटाएगा?
दरअसल राजनीति में आरोप लगाना आसान है। विपक्ष को दोष देना आसान है। एजेंसी को कटघरे में खड़ा करना भी आसान है। लेकिन जिस युवा ने महीनों किताब लेकर तैयारी की, फीस भरी, परीक्षा दी और परिणाम का इंतजार किया, उससे यह कहना आसान नहीं है कि भाई, गड़बड़ी में थोड़ा भूगोल भी शामिल था!
युवा को यह नहीं जानना कि कंपनी का मुख्यालय लखनऊ में है या रांची में। उसे यह जानना है कि मेरी परीक्षा कब होगी? नौकरी कब मिलेगी? पेपर सुरक्षित रहेगा या नहीं? मेहनत का परिणाम मिलेगा या फिर जांच आयोग बनेगा?
यही वह बिंदु है जहां व्यंग्य खत्म होकर व्यवस्था का गंभीर सवाल शुरू होता है। अगर हर प्रशासनिक समस्या का समाधान किसी दूसरे शहर, दूसरे राज्य या विपक्ष की साजिश खोजने से हो सकता तो शासन चलाना दुनिया का सबसे आसान काम होता।
सरकार ने परीक्षाएं रद्द करने और जांच का रास्ता चुना है। अब असली परीक्षा सरकार की यह है कि क्या वह ऐसी व्यवस्था बना पाएगी, जिसमें अगली बार अभ्यर्थी परीक्षा केंद्र में बैठकर यह सोचे कि इस बार मेरी मेहनत का पेपर सुरक्षित है, न कि यह कि परीक्षा खत्म होने के बाद फिर कोई नया कनेक्शन सामने आएगा?
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