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JPSC-JSSC आंदोलनः अनशनकारी देवेंद्र महतो को तिरंगा यात्रा-झंडा फहराने से रोका, की मारपीट! टाइगर का बड़ा ऐलान

JPSC-JSSC भर्ती में कथित गड़बड़ी के खिलाफ आंदोलन कर रहे देवेंद्र नाथ महतो ने तिरंगा फहराने और तिरंगा यात्रा में शामिल होने की इच्छा जताई थी। सदर अस्पताल के बाहर भारी पुलिस तैनाती और धक्का-मुक्की और मार-पीट की घटना ने स्वतंत्रता दिवस पर नई बहस छेड़ दी है।

आज जब देश भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान व्यक्तित्वों के संघर्ष और बलिदान को याद कर रहा है, तब रांची की यह घटना एक असहज सवाल छोड़ जाती है कि आजादी का अर्थ आखिर क्या है? क्या आजादी सिर्फ तिरंगा फहराने का उत्सव है? या फिर उस नागरिक को सवाल पूछने, सरकार से जवाब मांगने और लोकतांत्रिक तरीके से असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी आजादी का हिस्सा है?

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राजधानी रांची में जेपीएससी-जेएसएससी (JPSC-JSSC) भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन उस समय एक बार फिर सुर्खियों में आ गया, जब आंदोलनकारी छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो को अस्पताल से निकलकर तिरंगा यात्रा में शामिल होने से रोकने के दौरान पुलिस और उनके समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, देवेंद्र नाथ महतो पिछले कई दिनों से आंदोलन और अनशन से जुड़े हैं। 15 अगस्त को उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में तिरंगा फहराने और इसके बाद प्रस्तावित तिरंगा यात्रा में शामिल होने की इच्छा जताई थी। इसके बाद रांची सदर अस्पताल में उनके कमरे के बाहर पुलिस बल की तैनाती की गई।

स्थिति तब और गरमा गई, जब देवेंद्र महतो के बाहर निकलने की कोशिश के दौरान पुलिसकर्मियों और आंदोलनकारियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। विभिन्न रिपोर्टों में देवेंद्र महतो के चोटिल होने और पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल से बाहर जाने से रोकने की बात सामने आई है।

तिरंगा यात्रा पर रोक क्यों?

यही वह सवाल है जिसने स्वतंत्रता दिवस के दिन पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक और लोकतांत्रिक बहस का विषय बना दिया है।

अगर किसी आंदोलनकारी को कानून-व्यवस्था के आधार पर किसी कार्यक्रम में जाने से रोका गया तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके कारण एक अस्पताल में भर्ती आंदोलनकारी को तिरंगा यात्रा में शामिल होने से रोकने के लिए भारी पुलिस बल लगाना पड़ा?

दूसरी ओर प्रशासन के सामने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। इसलिए पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रतिबंध का लिखित आधार क्या था और क्या संबंधित व्यक्ति को उसके बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया था? यही पारदर्शिता इस विवाद को शांत कर सकती है।

आंदोलन बनाम प्रशासन का असल टकरावः

 जेपीएससी और जेएसएससी की भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन कोई अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं है। देवेंद्र नाथ महतो इससे पहले भी भर्ती परीक्षाओं और परिणामों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि युवाओं के भविष्य से जुड़े भर्ती मामलों में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। वहीं, ऐसे आरोपों को संबंधित परीक्षा संस्थाओं और प्रशासन की ओर से तथ्यों और जांच के आधार पर स्पष्ट किया जाना जरूरी है।

लेकिन भर्ती में कथित गड़बड़ी का सवाल अपनी जगह है और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सवाल अपनी जगह।

सरकार चाहे तो आंदोलनकारियों के आरोपों को गलत साबित करने के लिए दस्तावेज सामने रख सकती है। जांच करा सकती है। संवाद कर सकती है। विधानसभा में जवाब दे सकती है। अदालत का रास्ता खुला है।

लेकिन यदि विरोध और असहमति का जवाब केवल पुलिस बल से दिया जाता है तो इससे मूल सवाल खत्म नहीं होता, बल्कि कई बार और बड़ा हो जाता है।

टाइगर जयराम महतो ने किया बड़ा ऐलानः 

झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के विधायक टाइगर जयराम महतो ने इस घटनाक्रम पर सरकार से जवाब मांगने की बात कही है। उनका कहना है कि देवेंद्र नाथ महतो को तिरंगा फहराने, तिरंगा यात्रा में शामिल होने और अपनी इच्छा के अनुसार इलाज कराने से रोकने तथा उनके साथ हुई कथित धक्का-मुक्की का मामला सदन में उठाया जाएगा।

यह बयान अब इस पूरे घटनाक्रम को सड़क से विधानसभा तक ले जाने का संकेत है। और यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी होनी चाहिए। सवाल सड़क पर उठे तो जवाब सदन में मिले।

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना अपराध है?

यहां एक बुनियादी प्रश्न सामने आता है। क्या भर्ती प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार या अनियमितता के खिलाफ आंदोलन करना देशविरोधी गतिविधि है?

निश्चित रूप से किसी भी आंदोलन को कानून के दायरे में रहना चाहिए। हिंसा, तोड़फोड़ या सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। लेकिन उसी संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा जैसे लोकतांत्रिक अधिकार भी दिए हैं।

इसलिए सरकार और प्रशासन को यह अंतर बेहद साफ रखना होगा कि कानून-व्यवस्था नियंत्रित करना अलग बात है और असहमति की आवाज को दबाना अलग।

स्वतंत्रता दिवस पर सबसे बड़ा सवाल?

आज जब देश भगवान बिरसा मुंडा, शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान व्यक्तित्वों के संघर्ष और बलिदान को याद कर रहा है, तब रांची की यह घटना एक असहज सवाल छोड़ जाती है कि आजादी का अर्थ आखिर क्या है?

क्या आजादी सिर्फ तिरंगा फहराने का उत्सव है? या फिर उस नागरिक को सवाल पूछने, सरकार से जवाब मांगने और लोकतांत्रिक तरीके से असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी आजादी का हिस्सा है?

देवेंद्र नाथ महतो और प्रशासन के बीच 15 अगस्त को जो हुआ, उसका अंतिम सच जांच और आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि जेएसपीसी-जेएसएससी भर्ती विवाद अब केवल परीक्षा और नियुक्ति का मुद्दा नहीं रह गया है। यह युवाओं के भरोसे, प्रशासन की जवाबदेही और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार की परीक्षा बनता जा रहा है।

सरकार के लिए सबसे बेहतर रास्ता यही होगा कि वह आरोपों को पुलिस बल से नहीं, तथ्यों, जांच और संवाद से जवाब दे। क्योंकि तिरंगा केवल सत्ता की इमारतों पर नहीं लहराता, वह उस नागरिक के हाथ में भी उतना ही सम्मानित है, जो लोकतंत्र के भीतर रहकर सत्ता से सवाल पूछता है।

अब देखना यह है कि रांची की इस घटना पर सरकार विधानसभा में क्या जवाब देती है और क्या युवाओं के सवालों का समाधान पुलिस के पहरे से होगा या लोकतांत्रिक संवाद से?

Expert Media News

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लेखन-संपादन करते आ रहे हैं।

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