राजद की राजनीति से महज इसलिए आउट है तेजस्वी !

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तो क्या महज  22 साल की उम्र में राजद  की लालटेन की लौ मंद पड़ने लगी है। राजद में विरासत की लड़ाई चल रही है। दोनों भाइयों के बीच अनकही जंग चल रही है। जंग का ही नतीजा है कि लालू की राजद की लालटेन की लौ मद्धिम पड़ने लगी है या फिर लालू बिन राजद की राजनीति सून है……..….”

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क ब्यूरो)। बिहार की राजनीति में कभी लालू प्रसाद यादव और उनके कुनबे की तूती बोलती थी। 15 साल तक बिहार की सत्ता पर काबिज रही राजद अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उसके सामने नेतृत्व का ही संकट नही है, बल्कि लालू परिवार  के द्वारा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भी कई सवाल खड़े करती है।

लोकसभा चुनाव परिणाम के शून्यता के बाद पार्टी में भी शून्यता दिख रही है। पार्टी के नेता तेजस्वी यादव भूमिगत हो गए। बिहार विधानसभा सत्र के दौरान भी उनकी अनुपस्थिति को लेकर सत्ता पक्ष के नेताओं ने उनकी आलोचना की। फिर से प्रतिपक्ष नेता श्री यादव अपने दल से कटे नजर आ रहे हैं।

राजद के सदस्यता अभियान की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष पार्टी के सदस्यता अभियान में शामिल नही हो सकें। यहाँ तक कि लालू परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी के इस सदस्यता अभियान में शामिल नही हुआ। नेता प्रतिपक्ष के नहीं आने से कार्यकर्ताओं में मायूसी दिख रही है।

बताया जा रहा है लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव दिल्ली में ही रह रहे हैं। वहीं से टेलीफोन से पार्टी को चला रहे हैं। उनके ही निर्देश पर पार्टी की नीतियाँ और कार्यक्रम तय होते हैं। लेकिन उन कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी नगण्य देखी जा रही है।

लोकसभा चुनाव के हार की समीक्षा हो या फिर पार्टी की स्थापना दिवस तेजस्वी ने बेरूखी ही दिखाई। नेता प्रतिपक्ष के द्वारा इस तरह मैदान छोड़ने से पार्टी में हताशा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पार्टी में विरासत की लड़ाई और बड़े भाई के पारिवारिक कलह का असर उन पर पड़ा है तब से पार्टी और घर परिवार से अलग थलग पड़े हुए हैं।

बिहार की राजनीति में लालूप्रसाद यादव की एक बड़ी भूमिका रही थी।उनकी भूमिका की वजह से ही बिहार में 2015 में नीतीश कुमार के साथ उनकी सरकार बनी थी।

लेकिन जबसे लालू प्रसाद रांची जेल में हैं तब से राजद छिन भिन्न दिख रही है। उनकी गैर मौजूदगी में पार्टी की कमान छोटे पुत्र तेजस्वी को सौंपी थी। लेकिन चुनावी हार से हताश राजद को अपने रवैये से और हताश कर चुके हैं तेजस्वी।

लालू प्रसाद यादव की गैर मौजंदगी में पार्टी की हालत बिगड़ती जा रही है। परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी को संभालने या देखने आगे नहीं आ रहा है। देखा जाए तो कार्यकर्ताओं में लालूप्रसाद के प्रति असीम आस्था है। लेकिन नेतृत्व संकट से लालू परिवार की साख घट रही है।

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले  पार्टी की दुर्दशा से नेता और कार्यकर्ता हताश है। अब सवाल यह है कि क्या लालू परिवार के हाथ से राजद की बागडोर फिसलने वाली है।

तेजस्वी कहाँ है? मीडिया में यह  सवाल   राजद नेताओं का पीछा नही छोड़ रहा है तभी तो नेता भी इन सवालों से अजीज आ गए हैं। पूर्व सीएम राबड़ी देवी तो मीडिया के इस सवाल पर कई बार भड़क उठी और उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि वे सुशील कुमार मोदी के घर पर हैं।

फिलहाल राजद बिना पतवार की कश्ती है जो बीच मंझधार में है। उस कश्ती का खेवनहार ही गायब है। पूर्व सीएम राबड़ी देवी भी पार्टी के खेवनहार बनती नहीं दिख रही हैं। पार्टी की स्थिति उनसे छिपी नहीं है।

सदस्यता अभियान के दौरान  राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी का सब्र का पैमाना छलक गया। उन्होंने खीज भरे अंदाज में यहां तक कह डाला कि पार्टी में इतने सारे नेता हैं, कार्यकर्ता हैं, क्या उनका कोई महत्व नहीं है कि सिर्फ़ एक आदमी के बारे में सोचे।

शिवानंद तिवारी राजद के ऐसे नेता है, जो पार्टी में रहकर कुछ कहने का माद्दा रखते है। यही शिवानंद तिवारी हैं, जिन्होंने कभी  नेता प्रतिपक्ष को ललकारते हुए कहा था कि अगर आप शेर के बेटे हैं तो मांद से बाहर निकलिए। राजनीतिक बदलाव करना है तो सड़क पर उतरिए, लाठियां खाइए।

तेजस्वी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने के बाद क्या अब वो समय आ गया है कि पार्टी को लालू कुनबे से बाहर निकल कर सोचना होगा?

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