बांका के लाइफ लाइन का यूं भरभराया पाया, वाहनों का परिचालन ठप

हाल के दिनों में बांका जिले में बड़े पैमाने पर हो रहे बालू उत्खनन से इस पुल पर बालू ढोने वाले ओवरलोड वाहनों का दबाव बढ़ा है। इसी दबाव की वजह से आखिरकार आज इस पुल के एक हिस्से की बलि चढ़ गई…..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज/ बांका लाइव। बिहार के बांका का लाइफ़ लाइन कहे जाने वाले चांदन पुल का एक पाया आज बुरी तरह धंस गया। यह हादसा आज सुबह करीब 5:30 बजे हुआ, जब इस पुल पर से होकर ओवरलोड बालू लदे वाहन पार कर रहे थे।

हादसे के बाद चांदन पुल से होकर बड़े वाहनों के परिचालन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। छोटे किंतु भारी वाहनों के परिचालन पर भी नजर रखी जा रही है। मौके पर सुरक्षा बल तैनात कर दिए गए हैं।

जानकारी के अनुसार आज सुबह करीब 5:30 बजे इस पुल से होकर जब एक विशालकाय ओवरलोड बालू लदा वाहन पार कर रहा था, तभी गड़गड़ाहट की आवाज के साथ चांदन पुल का पाया संख्या 26 भरभरा कर टूट गया।

इस पुल का बेसमेंट एक ओर झुक गया है। पुल भी टेढ़ी हो गई है, जिससे कभी भी किसी भी वक्त किसी मामूली दबाव में भी पुल के गिर जाने का खतरा बना हुआ है।

चांदन पुल को बांका जिले का लाइफ लाइन कहा जाता है। बांका जिला मुख्यालय तथा इस जिले के एक बड़े हिस्से को प्रमंडलीय मुख्यालय भागलपुर, मुंगेर एवं राजधानी सहित उत्तर बिहार एवं झारखंड से जोड़ने वाले इस एकमात्र पुल से होकर रोजाना छोटे-बड़े वाहनों की कतार चलती रहती है।

झारखंड के रांची व जमशेदपुर जैसे शहरों के अलावा पश्चिम बंगाल के कोलकाता, सिलीगुड़ी एवं रामपुरहाट आदि के लिए भी यहां से चलने वाली बस एवं अन्य वाहन इसी पुल से होकर गुजरते हैं।

आज सुबह इस पुल के क्षतिग्रस्त होने की खबर जिले भर में जंगल के आग की तरह फैली। फलस्वरूप, बड़ी संख्या में लोग स्थिति को देखने- समझने पुल पर एकत्रित हो गए।

सूचना पाकर प्रशासनिक एवं तकनीकी पदाधिकारी भी सुरक्षा बल के साथ मौके पर पहुंच गए। एहतियात के तौर पर उन्होंने अविलंब पुल पर से होकर वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाई।

अधिकारियों ने अपने उच्चाधिकारियों से भी इस संबंध में बात की है। सुरक्षाबलों ने पुल पर बड़ी संख्या में जुटे लोगों को भी किसी भी खतरे के प्रति आगाह करते हुए वहां से हटाने की कोशिश की।

बांका जिले की सबसे बड़ी चांदन नदी पर यह पुल बांका शहर की पूर्वी सीमा पर अवस्थित है। चांदन नदी पर यहां पुल का निर्माण अंग्रेजों के जमाने में हुआ था, जो लोहे का पुल था।

वर्ष 1995 की विनाशकारी बाढ़ के दौरान तत्कालीन ऐतिहासिक पुल बह गया था। जिसके बाद वर्ष 1996- 97 में उसी जगह नए पुल का निर्माण पुल निर्माण निगम के द्वारा किया गया था।

पुल की गुणवत्ता और मजबूती इसके निर्माण के बाद से ही विवादों में रही है। समय-समय पर पुल के कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त भी होते रहे हैं, जिनकी मरम्मत भी समय-समय पर होती रही है।

हाल के दिनों में बांका जिले में बड़े पैमाने पर हो रहे बालू उत्खनन से इस पुल पर बालू ढोने वाले ओवरलोड वाहनों का दबाव बढ़ा है। इसी दबाव की वजह से आखिरकार आज इस पुल के एक हिस्से की बलि चढ़ गई।

बालू लदे ओवरलोड वाहन तो फिर भी अपनी राह तलाश लेंगे, लेकिन आम नागरिकों के लिए इस पुल की यह बड़ी क्षति बड़ा अभिशाप बनकर सामने आयी है।

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