‘पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो रे संप्रदा का खेल’

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“जी हां, अडाणी-अंबानी और टाटा-बिड़ला जैसे अमीरों की इस कतार में जिनका नाम शामिल हुआ है, वे हैं बिहार के संप्रदा सिंह। संप्रदा सिंह बिहार के इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने कुछ दिनों पहले ही विश्व की मशहूर पत्रिका फोब्र्स की ओर से जारी भारत के सबसे अमीर लोगों की जारी सूची में अपना नाम दर्ज करवाया।”

वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रोमांचक रिपोर्ट

‘पढे फारसी बेचे तेल, देखो रे संप्रदा का खेल।’ जहानाबाद जिले के मोदनगंज प्रखंड के ओकरी गांव के लोग यह पंक्ति तब गया कॉलेज में कामर्स की पढाई करने वाले संप्रदा सिंह के बारे में तब कहते थे, जब वो 17-18 वर्ष की उम्र में अपने गांव आते थे और अपने गांव में पानी के अभाव में अपनी बंजर जमीन को पटवन करने का असफल प्रयास करते थे।

तब इस गांव के लोगों को यह पता नहीं था कि यही छात्र आगे चलकर देश के दूसरे सबसे बडे उद्योगपति और देश के दूसरे सबसे धनी व्यक्ति के रुप में अपना नाम शुमार करेगा

बिहार का जहानाबाद जिला कई मायनों में पूरे देश भर में बदनाम रहा है। 70 के दशक में खासकर इस जिले का घोषी प्रखंड जातीय उन्मादता के लिए जहां मशहुर था उसके बाद के दशकों में यह जिला नक्सली आंदोलन की भेंट चढ गया था।

लगभग तीन दशक तक चले जातीय उन्माद और नक्सल आंदोलन में सैकडों लोगों की जान चली गईं। पर वही जिला और वहीं प्रखंड जो कभी पूरे देश में बदनाम रहा के निवासी व दवा निर्माता संप्रदा सिंह देश के सबसे दूसरे अमीर में अपना नाम शामिल करवा जहानाबाद और घोषी (वर्तमान में मोदनगंज प्रखंड) सहित पूरे बिहार का नाम रौशन कर दिया है।

चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या सामाजिक क्षेत्र, हर जगह बिहार के निवासियों को हीन भावना से देखा और आंका जाता है। मगर, बिहार ने देश-दुनिया में कई ऐसे कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं, जिसका अनुकरण और अनुसरण आज भी किया जाता है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल से लेकर आज तक बिहार ने देश के लोगों को बहुत कुछ देने की कोशिश की है।

खैर, इसी बदनामी के दलदल में फंसे होने के बावजूद बिहार के जहानाबाद जिले ने एक ऐसे शख्स को भी दिया है, जिसने देश भर के अमीरों की पांत में खुद को शामिल कर लिया है।

जी हां, अडाणी-अंबानी और टाटा-बिड़ला जैसे अमीरों की इस कतार में जिनका नाम शामिल हुआ है, वे हैं बिहार के संप्रदा सिंह। संप्रदा सिंह बिहार के इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने कुछ दिनों पहले ही विश्व की मशहूर पत्रिका फोब्र्स की ओर से जारी भारत के सबसे अमीर लोगों की जारी सूची में अपना नाम दर्ज करवाया।

इस सूची में सबसे ऊपर रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी का नाम है और उनके भाई अनिल अंबानी को इस सूची में 45वां स्थान दिया गया है। अनिल अंबानी की कुल संपत्ति 2.4 मिलियन डॉलर बतायी गयी है।

जहानाबाद जिले के इस लाल संप्रदा सिंह ने फोब्र्स की ओर से जारी इस सूची में अनिल अंबानी को भी पीछे छोड़ते हुए 43वां स्थान पाया है। फोब्र्स ने उनकी कीमत 3.3 बिलियन डॉलर बतायी है, जिसकी भारतीय रुपयों में कीमत लगभग करीब 2 खरब 13 अरब 41 करोड़ 59 लाख रुपये है।

संप्रदा सिंह का जन्म 26 अगस्त 1926 को मध्य रात्रि बिहार के जहानाबाद जिले के ओकरी गांव जो कभी घोषी प्रखंड में था पर अब मोदनगंज प्रखंड में है में हुआ था। उस वक्त जहानाबाद जिले में गिने-चुने हाई स्कूल थे जिनमें एक स्कूल घोषी हाई स्कूल था। संप्रदा सिंह ने 1942 में घोषी हाई स्कूल से ही प्रथम श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण की।

तत्पश्चात उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बीकॉम की पढ़ाई की थी। इसके बाद उन्होंने दवा बनाने वाली कंपनी अल्केम लेब्रोटीज की स्थापना की। इस समय वे इसके संस्थापक और चेयरमैन हैं। संपदा सिंह इस समय मुंबई में अपने परिवार के साथ रहते हैं। संप्रदा सिंह भारत में सबसे अमीर लोगों की सूची में मेटल और माइनिंग के व्यापार में वेदांता के अनिल अग्रवाल से भी आगे निकल गये हैं।

अनिल अग्रवाल का नाम फोब्र्स सूची में संप्रदा सिंह के बाद 44वें नंबर पर है। संप्रदा सिंह के व्यवसाय को आगे बढाने में उनके तीन पुत्रों और उनके परिवार का अमूल्य योगदान रहा है।

संप्रदा सिंह के बडे पुत्र नवल किशोर सिंह जहां अल्केम की ही सहयोगी कंपनी ‘गल्फा’ का कार्यभार संभालते हैं वहीं उनके मंझले और दूसरे पुत्र बाल्मिकी प्रसाद सिंह अपने पिता के साथ ही ‘अल्केम’ के व्यवसाय में उनके साथ है जबकि तीसरे औश्र सबसे छोटे पुत्र सतीश सिंह अल्केम की ही सहयोगी कंपनी ‘कैचेट’ का कार्यभार संभालते हैं।

संप्रदा सिंह ने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को खुद ही लिखी किताब ‘मेरी जीवन यात्रा’ में उदृत किया है। संप्रदा सिंह इस मुकाम तक पहुंचने के पहले जीवन में कई उतार-चढाव देखे।

सर्वप्रथम उन्होंने पटना में छतरी (छाता) बेचेने का व्यवसाय शुरु किया पर चुकी यह व्यवसाय सीजनल था तो उन्होंने कुछ वर्ष बाद इसे छोडकर अशोक राजपथ सिथत एक फार्मेसी की दूकान में काम करना शुरु किया। यहीं से इनका रुझान दवा निर्माण की तरफ गया।

महज एक लाख रुपये की पूंजी से महेन्द्र प्रसाद उर्फ किंग महेन्द्र के साथ मुबई में साझा दवा कंपनी खेल उन्होंने दवा निर्माता के रुप में अपनी पहचान शुरु की। बाद के वर्षों सम्प्रदा सिंह और उनके पडोस गांव गोविन्दपुर के निवासी महेन्द्र प्रसाद ने अलग-अलग दवा कंपनी खोल ली।

महेन्द्र प्रसाद अभी वर्तामान में बिहार से जदयू के राज्यसभा सदस्य भी हैं। संप्रदा सिंह भले ही देश के दूसरे सबसें बडे अमीर हो गए औश्र इन्होंने अपने गृह जिला जहानाबाद सहित बिहार के हजारों बेरोजगार नौजवानों को अपनी कंपनी में रोजगार मुहैया कराया पर इनका पैतृक गांव ओकरी आज भी विकास और कृषि के क्षेत्र में काफी पीछे है।

इस गांव में पटवन की कोई्र सुविधा नहीं रहने के कारण गांव की सैकडो एकड भूमि हमेशा बंजर ही रहती है। गांव में दो सरकारी ट्रयूबवेल हैं पर वह भी हांथी दांत के समान दिखाने को ही।

हां संप्रदा बाबबू इतना जरुर किया कि उन्होंने अपनी कंपनी अल्केम की तरफ से जहानाबाद जिला प्रशासन को चार अत्याधुनिक एम्बुलेंस मुहैया कराए जिनमें एक एम्बुलेंस उनके गांव आकरी स्थित स्वास्थ्य केन्द्र को दिया गया है।

देश के इस दूसरे सबसे बडे अमीर का मुंबई और पटना सहित कई स्थानों परभले ही भव्य कोठियां और बंगले हों पर इनके गांव ओकरी में आज भी वर्ष1960 का बना वहीं पुराना मकान है जहां रहने वाला कोई्र नहीं।

उनके छोटे पुत्र सतीश सिंह बताते हैं कि अब उनकी पहली प्राथमिकता गांव के अपने पैतृक मकान को रिमाडलिंग और गांव में सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करवाना है।

देश के दूसरे सबसे अमीर बनने के बाद संप्रदा सिंह के दिल में यह कचोट है कि उन्हें इस उंचाइयों तक जाने की प्रेरणा देने वाली उनकी धर्मपरायण पत्नी नन्हमति सिंह उन्हें इन उंचाइयों तक पहुंचने को देखने के लिए जिंदा नहीं रह सकीं।

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