टांय-टांय फिस्स होते मानव श्रृखंला की यत्र-तत्र स्कूली बच्चों ने बचाई इज़्ज़त

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पिछले वर्ष जहाँ तीन करोड़ से ज्यादा लोगों ने शराब बंदी के समर्थन में मानव श्रृखंला को समर्थन दिया था। वहीं इस बार बिहार की जनता ने वह उत्साह नहीं दिखाया।”

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज ब्यूरो)। बिहार में दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ  मानव श्रृखंला का आयोजन किया गया था। इस मानव श्रृखंला को पहले से भी बड़ा और ऐतिहासिक बताया जा रहा था। सता पक्ष इस श्रृखंला को सफल और अपनी कामयाबी बता रहा है। वही विपक्ष ने इसे फ्लॉप बताया है।

वेशक रविवार को बिहार की जनता दहेज प्रथा और बाल विवाह के लिए फिर से हाथ से हाथ जोड़े मानव श्रृखंला में शामिल तो हुए लेकिन वह हाथ की लम्बाई नहीं बढ़ सकी, जैसी आशा की जा रही थी।

सीएम नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा में अक्टूबर से ही जिला प्रशासन मानव श्रृखंला की तैयारी में दिन रात एक किए हुए था। लेकिन नालंदा में सरकारी दावों की पोल खुल गई।

नालंदा के विभिन्न प्रखंडों से आई तस्वीरें बयां कर रही है कि मानव श्रृखंला का हश्र क्या हुआ। डीएम-एसपी से लेकर सतापक्ष के लोग मानव श्रृखंला को लेकर लाख दावे कर रहे थे लेकिन हुआ उल्टा।

मानव श्रृखंला में काफी प्रशासनिक कुव्यवस्था दिखी। सड़क पर सन्नाटा पसरा रहा। कहीं-कहीं हाथ जोड़े लोग दिखाई दिए तो कहीं आधे किमी तक लोग नदारद।

मानव श्रृखंला के दौरान बेगूसराय जिले के साहेबपुर कमाल के बीडीओ को लोगों ने दौड़ा दौड़ाकर पीटा। लोगों ने आरोप लगाया कि बीडीओ जबरन लोगों से श्रृखंला में शामिल होने के लिए दबंगई कर रहे थे। उधर त्रिवेणीगंज एसडीओ पर शिक्षकों के साथ अभद्र व्यवहार तथा गाली गलौज का आरोप लगा है।

मानव श्रृखंला के समाप्ति के बाद राजनीतिक बयान बाजी भी सामने आने लगी है। सीएम नीतीश कुमार ने मानव श्रृखंला को सफल बताते हुए बिहार की जनता को धन्यवाद दिया है। उन्होंने कहा कि आनेवाले समय में भी इस तरह का आयोजन किया जाएगा।

वही डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा कि अगर राजद और कांग्रेस भी मानव श्रृखंला में शामिल होते तो अच्छा होता। उधर राजद ने इस मानव श्रृखंला को बिल्कुल फ्लॉप बताते हुए कहा कि सीएम सबसे महंगे मुख्यमंत्री हो गए हैं।

रविवार को दहेज प्रथा और बाल विवाह के विरोध में आयोजित मानव श्रृखंला के लिए पांच करोड़ लोगों के शामिल होने का अनुमान लगाया जा रहा था। लेकिन सूबे के जिले से आ रही रिपोर्ट के अनुसार मानव श्रृखंला को लेकर लोगों के बीच कोई खास उत्साह नहीं देखा गया।

अगर सरकारी और निजी शिक्षण संस्थान के छात्र अगर शामिल नहीं होते तो श्रृखंला टाय टाय फिस्स हो जाता। इसका मुख्य कारण लोगों में नीतीश कुमार के कामकाज से नाराजगी भी बताई जा रही है।

पिछले कई माह से राज्य के कार्यालयों में रूटीन वर्क ठप्प पड़ा हुआ है। दो अक्टूबर से पहले तथा सरकारी कार्यालय ओडीएफ को लेकर व्यस्त थी तो पुलिस महकमा शराब और शराब के धंधेबाज को पकड़ने में लगी थी। उधर से फूर्सत मिली तो मानव श्रृखंला में ताकत झोंक डाली।

शायद इस मानव श्रृखंला से सीएम कुछ सीख लें आखिर शराबंदी की तरह लोगों ने इस मानव श्रृखंला को नकार क्यों दिया? जनता ने जो आईना उन्हें दिखाने का काम किया है क्या उसमें वह अपना चेहरा देख पाएँगे? बुनियादी सुविधाओं को हल करने के वजाय सीएम समाज सुधारक का चोला क्यों पहन रहें हैं? क्यों अपनी गिरती छवि  चमकाने की चालाकी में जुटे हुए हैं?

राजनीतिक पंडित भले ही मानव श्रृखंला से सीएम की व्यक्तिगत छवि चमक जाने की बात कहता हो, लेकिन बिहार में बढ़ती अपराध की घटनाएँ, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से ग्रस्त बिहार की छवि सुधरेगी या बिहार का चेहरा मलिन ही रहेगा।

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