खेतों और गाँव से हल-बैल गायब, ट्रैक्टर की होने लगी पूजा

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नालंदा (राम बिलास)। पांच दिवसीय दीपोत्सव में लक्ष्मी पूजन के साथ गोवंश पूजा का भी महत्व है। इसीलिए लक्ष्मी पूजन से पहले गाय पूजी जाती है। दीपावली के अगले दिन गोवंश के नाते बैलों का पूजन होता है।

लेकिन अब आधुनिक युग में सदियों पुरानी यह परंपरा विलुप्त होती जा रही है। खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ले ली है। इसीलिए अब बैल  की जगह ट्रैक्टर पूजा जा रहा है।

नालंदा के इलाके में ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही है। शुक्रवार को गाँव- गाँव में गोवर्धन पूजा का आयोजन  किया गया। बैलों की जगह किसान गोवर्धन पूजा के दिन ट्रैक्टरों की पूजा किये।

गोवर्धन पूजा के दिन गोवंश मानकर ट्रैक्टर पूजा करने की यह नई परंपरा शुरू हुई है। इसका कारण है कि गांव के अधिकांश किसानों के पास गोवंश  नहीं रहे। उनके खाड़ और खूटे में  गोवंश से  उजाड़ हैं ।

वैसे किसानों का मानना है कि अब बैल की जगह ट्रैक्टर ही हमें खेत की जुताई कर रहे हैं। अनाज दे रहे हैं और उनका भंडार भर रहे हैं। इसलिए उनकी पूजा से ही धन्य धान में वृद्धि होगी।

इसी मान्यता के आधार पर दर्जनों किसानों ने गोवर्धन पूजा के दिन पूरे विधि विधान से ट्रैक्टर की पूजा की। गोवर्धन पूजा के दिन पहले  बैलों  को अलग अलग तरीके से सजाया जाता था।

पहले  गोवर्धन  (भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा) भी गाय के गोबर से बनाए जाते थे। गोवर्धन पूजा शाम को होती थी और सुबह बैलों का पूजन होता था। उनके शब्दों को एक जैसा भी किल बनाकर उन्हें रंगा जाता था। मोरपंख और कौड़ियो  का सुंदर हार पहनाया जाता था। लेकिन यह सब अब बड़े बुजुर्गों की कहानी बनकर रह गई है या इतिहास के गर्त में छुपता जा रहा है।

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