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Jharkhand treasury scam : किसके राज़ में यह महाघोटाला हुआ, जांच समिति गठन के बीच उलझे नेता

“झारखंड ट्रेजरी घोटाला (Jharkhand treasury scam) न केवल भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर कर रहा है, बल्कि सरकारी वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता और तकनीकी सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता भी रेखांकित कर रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर रहा कि ऐसे गंभीर भ्रष्टाचार को लेकर भी सरकार और विपक्ष से जुड़े नेता कैसे ‘तू-तू मैं-मैं’ करने पर उतारु हो जाते हैं, ताकि आम जनता का ध्यान भटकने लगे, आखिर हमाम में नंगे जो ठहरें…

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज/मुकेश भारतीय)। झारखंड के वित्तीय प्रशासन को झकझोर देने वाले ट्रेजरी घोटाले (Jharkhand treasury scam) ने अब राज्य सरकार को बड़े स्तर पर कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। बोकारो और हजारीबाग में सामने आई करोड़ों रुपये की संदिग्ध निकासी के बाद वित्त विभाग ने एक वरीय आईएएस अधिकारी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेज दिया है। यह समिति न केवल मौजूदा घोटाले की तह तक जाएगी, बल्कि राज्य गठन वर्ष 2000 से अब तक सभी 33 कोषागारों की व्यापक जांच की अनुशंसा भी की गई है।

यह मामला अब सिर्फ वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी भुगतान प्रणाली, ट्रेजरी पोर्टल की सुरक्षा, डीडीओ नियंत्रण तंत्र और बैंकिंग सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

हजारीबाग से 30 करोड़ की अवैध निकासी का बड़ा खुलासाः जांच के शुरुआती चरण में हजारीबाग कोषागार से पुलिस वेतन मद में हुई अवैध निकासी में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। प्रारंभिक जांच के अनुसार लेखा शाखा में तैनात रहे आरक्षी शंभु कुमार, उनके सहयोगी रजनीश कुमार सिंह उर्फ पंकज सिंह और धीरेंद्र सिंह पिछले लगभग 10 वर्षों से इस सुनियोजित वित्तीय गड़बड़ी में सक्रिय रहे।

अब तक की जांच में लगभग 30 करोड़ रुपये की अवैध निकासी की पुष्टि हुई है। यह राशि 14 से अधिक बैंक खातों में 22 बार ट्रांसफर की गई। कई खातों में दो से तीन बार राशि भेजे जाने के प्रमाण मिले हैं।

यह रकम झारखंड और बिहार के विभिन्न एसबीआई शाखाओं के खातों में भेजी गई, जिनमें गया, शेरघाटी, परैया, गांधी मैदान, मखदुमपुर, तपेज, और यहां तक कि महाराष्ट्र के बोरीवली स्थित खाते भी शामिल हैं।

फर्जी पे-आईडी और दस्तावेजों में छेड़छाड़ का संगठित खेलः जांच एजेंसियों के अनुसार यह घोटाला किसी एक बार की गलती नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही एक संगठित वित्तीय साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है।

सूत्रों के मुताबिक डीडीओ से हस्ताक्षर लेने के बाद दस्तावेजों में छेड़छाड़ की जाती थी। नए पुलिसकर्मियों के वेतन के नाम पर टेंपररी पे-आईडी बनाई जाती थी, लेकिन भुगतान वास्तविक कर्मियों के खातों में भेजने के बजाय आरोपी अपने परिवार, रिश्तेदारों और करीबी लोगों के खातों में राशि ट्रांसफर कर देते थे।

33 कोषागारों की जांच से खुल सकते हैं और बड़े राजः वित्त विभाग ने इस मामले को केवल दो जिलों तक सीमित नहीं रखा है। विभाग ने वर्ष 2000 से अब तक राज्य के सभी 33 कोषागारों की व्यापक जांच की अनुशंसा की है।

यदि यह जांच शुरू होती है, तो संभावना है कि अन्य जिलों में भी इसी तरह की गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ट्रेजरी सिस्टम के जरिए सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, अनुदान और विभागीय भुगतान होते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सिस्टम ऑडिट नहीं हुआ तो यह घोटाला राज्यव्यापी वित्तीय संकट का रूप ले सकता है।

महालेखाकार और सीआईडी की भूमिका होगी अहमः वित्त विभाग ने महालेखाकार को पत्र लिखकर बोकारो और हजारीबाग का तत्काल स्पेशल ऑडिट कराने का अनुरोध किया है। साथ ही प्रस्तावित उच्चस्तरीय समिति के लिए वित्तीय विशेषज्ञ उपलब्ध कराने को भी कहा गया है।

दूसरी ओर आरोपियों की संपत्ति, बैंक लेन-देन और संभावित आपराधिक नेटवर्क की जांच के लिए सीआईडी को नोडल एजेंसी बनाने का प्रस्ताव भी भेजा गया है। यह संकेत है कि सरकार अब इसे महज विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित आर्थिक अपराध के रूप में देख रही है।

आरोपी कॉस्टेबल की आलीशान संपत्ति ने बढ़ाए सवालः घोटाले के मुख्य आरोपी कॉस्टेबल शंभु कुमार की संपत्तियों को लेकर भी लगातार सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं।

ताजा जानकारी के अनुसार शहर के खासमहाल मौजा सारले क्षेत्र में करीब 27 डिसमिल जमीन पर एक आलीशान तीन मंजिला भवन का निर्माण कराया गया है। बताया जा रहा है कि इस भवन में आठ फ्लैट बने हुए हैं।

यह जमीन अमीर बानो के नाम लीज पर दर्ज है, जिसकी वैधता 31 मार्च 2038 तक है। नियमों के अनुसार खासमहाल जमीन की खरीद-बिक्री और निर्माण पर कड़े प्रतिबंध होते हैं।

इसके बावजूद आरोपी द्वारा यहां निर्माण कार्य कराए जाने की बात सामने आने के बाद प्रशासन ने नोटिस जारी कर दिया है। यह संपत्ति अब जांच एजेंसियों के लिए आय से अधिक संपत्ति और अवैध धन निवेश की दिशा में अहम सुराग बन सकती है।

क्या यह सिस्टम फेल्योर है या संगठित भ्रष्टाचार? यह पूरा मामला सिर्फ कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत का नहीं, बल्कि सरकारी वित्तीय निगरानी प्रणाली की कमजोरी का भी प्रतीक है।

मुख्य सवाल यह है कि 10 वर्षों तक इतनी बड़ी निकासी कैसे होती रही?  ऑडिट सिस्टम ने इसे पहले क्यों नहीं पकड़ा? डीडीओ, ट्रेजरी और बैंकिंग स्तर पर कौन-कौन जिम्मेदार हैं? क्या अन्य जिलों में भी इसी तरह का नेटवर्क सक्रिय है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पोर्टल स्तर पर लॉग ट्रैकिंग, मल्टी-लेयर ऑथेंटिकेशन और रियल-टाइम ऑडिट मॉनिटरिंग होती तो इस तरह की हेराफेरी संभव नहीं होती।

बहरहाल, झारखंड ट्रेजरी घोटाला अब राज्य के प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुका है। उच्चस्तरीय जांच समिति, स्पेशल ऑडिट और सीआईडी जांच से आने वाले दिनों में कई और बड़े नाम सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

Expert Media News

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लेखन-संपादन करते आ रहे हैं।

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