सम्राट अशोक पर फिर बवाल, बीजेपी ने जाति खोजी थी तो जदयू ने जन्मदिन और अब...

 
सम्राट अशोक पर फिर बवाल, बीजेपी ने जाति खोजी थी तो जदयू ने जन्मदिन और अब...

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क डेस्क। बिहार की राजनीति से विभूतियों को लेकर सदैव गर्म रहा है। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और भाजपा आमने-सामने है। पाटलिपुत्र के महान शासक सम्राट अशोक, जिनकी विजय गाथा इतिहास कि किताबों में दर्ज है।

अब उन पर दया प्रकाश सिन्हा की टिप्पणी से नीतीश की पार्टी मर्माहत है। दया प्रकाश ने सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की है। पर सम्राट अशोक पर राजनीति की शुरुआत इन्हीं नेताओं ने बड़े ही तुच्छ तरीके से छह साल पहले कर दी थी।

सम्राट अशोक और पाटलिपुत्र एक दूसरे के पर्याय हैं। बिहार के लोगों को इस पर नाज है। इतिहास के अलग-अलग स्कूल जरूर मौर्य वंश के इस महान राजा की व्याख्या अलग-अलग नजरिए से करते हैं।

लेकिन दया प्रकाश सिन्हा के नाटक 'सम्राट अशोक' ने नया बखेड़ा शुरू कर दिया है। कलिंग युद्ध के बाद बुद्धम शरणं गच्छामि को मूलमंत्र बनाने वाले सम्राट अशोक आज पाटलिपुत्र यानी पटना की राजनीति के धुरि बन गए हैं।

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक को बदसूरत और क्रूर शासक बताया है जिसने भाई की हत्या कर सत्ता हथियाई थी। नाटक में मौर्य शासक की तुलना औरंगजेब से की गई है। और भी कई तरह के आक्षेप लगाए गए

दया प्रकाश सिन्हा भातीय जनता पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ से भी जुड़े हैं और उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला है। उनके इस नाटक के बाद बिहार एनडीए में रार बढ़ गया है। नीतीश कुमार की पार्टी ने बीजेपी से दया प्रकाश को निकालने और पद्मश्री वापस लेने की मांग की है।

जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने बीजेपी को निशाने पर लिया है। उधर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा को भस्मासुर और जड़ में मठ्ठा डालने वाला बुद्धिजीवी बता दिया।

लेकिन हम भूल गए कि सम्राट अशोक बिहार की राजनीति में नए नहीं घुसे हैं। उपेंद्र कुशवाहा भूल गए, जब ये 2015 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ थे और सम्राट अशोक की जाति खोजी गई थी।

बीजेपी पार्षद सूरजनंदन कुशवाहा ने सम्राट अशोक को कोईरी जाति का बताकर 2330 वीं जयंती आयोजित की थी। रविशंकर प्रसाद समेत बीजेपी के बड़े नेता उस कार्यक्रम में मौजूद थे।

उधर नीतीश कुमार बीजेपी से नाता तोड़ लालू के साथ गलबहियां करने लगे और लव-कुश के चक्कर में सम्राट अशोक पर उनकी पार्टी ने भी दावेदारी कर दी। नतीजतन सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को अशोक जयंती घोषित करते हुए राजकीय छुट्टी घोषित कर दी।

मतलब तब बीजेपी और नीतीश के विरोध उपेंद्र कुशवाहा ने एकसुर में सम्राट अशोक की जाति बताई और नीतीश कुमार ने बर्थ डे खोज लिया। उधर महान इतिहासकार रोमिला थापर सिर पीट रही थीं जिन्होंने प्राचीन भारत और सम्राट अशोक पर शोधपरक पुस्तक लिखी है।

बिहार के नेताओं को इससे मन नहीं भरा तो सम्राट अशोक की तस्वीर खोजकर ले आए। रविशंकर प्रसाद ने सम्राट अशोक की उस तस्वीर के साथ डाक टिकट जारी कर दिया। एक टिकट तो 2017 में पटना के जनरल पोस्ट ऑफिस में जारी किया गया।

उधर इतिहासकार कह रहे थे कि सम्राट अशोक की जाति या जन्मदिन को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, इधर बीजेपी और जेडीयू कुंडली निकाल कर पटना में बैठ गई। इतिहासकारों में अशोक की मां की जाति पर तरह-तरह की राय है। एक स्कूल के मुताबिक बिंदुसार की पत्नी शूद्र थी। कुछ इतिहासकार उन्हें क्षत्रिय मानते हैं।

उपेंद्र कुशवाहा आज नीतीश कुमार की पार्टी में हैं। उन्हें दया प्रकाश की टिप्पणी पर दर्द है। निश्चित तौर पर जिन्हें आप आदर्श या प्रेरणास्रोत मानते हैं वैसी ऐतिहासिक शख्सियत के खिलाफ अतार्किक टिप्पणी से उबाल आना स्वाभाविक है। पर, इन नेताओं को आत्मावलोकन भी करना चाहिए। राजनीतिक फायदे के लिए सम्राट अशोक का इस्तेमाल बंद होना चाहिए।

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक पर नवभारत टाइम्स को एक इंटरव्यू दिया, जिसके बाद ये मामला तूल पकड़ने लगा। इसमें उनसे पूछा गया कि नाटक ‘सम्राट अशोक’ तत्कालीन इतिहास के उजले और स्याह पक्ष को उजागर करता है। प्लीज बताएं स्याह पक्ष क्या है और उजले पक्ष क्या हैं? इसके जवाब में उन्होंने जो कहा वो हूबहू नीचे है.

इस पर दया प्रसाद सिन्हा ने कहा था कि हमारे यहां अशोक का बहुत महत्व है, क्योंकि कलिंग युद्ध के बाद वह अहिंसक हो गया था और उसने निर्णय लिया था कि अब वह कभी युद्ध नहीं करेगा। भारत सरकार ने भी अशोक स्तंभ पर बने शेर को अपना शासकीय निशान बनाया है।

देश के विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में भी सम्राट अशोक के उजले पक्ष को ही शामिल किया गया है। श्रीलंका के तीन बौद्ध ग्रंथ दीपवंश, महावंश ,अशोकावदान और तिब्बती लेखक तारानाथ के ग्रंथ से यह ज्ञात होता है कि सम्राट अशोक बहुत ही बदसूरत था। उसके चेहरे पर दाग था और वह आरंभिक जीवन में बहुत ही कामुक था।

बौद्ध ग्रंथ भी कहते हैं कि अशोक कामाशोक और चंडाशोक था। चंडाशोक यानी कि वह बहुत ही क्रूर था। उसने बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवाई थी। बाद में वह धम्म अशोक बन गया था। बिंदुसार चाहते थे कि बड़े बेटे सुसीम राजा बनें, लेकिन अशोक ने विद्रोह कर दिया और अपने भाई की हत्या कर दी। वह अपने पिता की हत्या का कारण भी बना था।

अशोक ने अपने आरंभिक जीवन के पापों को छिपाने के लिए एक पागल की तरह बौद्ध धर्म के प्रचार में धन लुटा दिया जिस कारण उसे राज्य से अपदस्थ कर दिया गया था और एक कारावास में डाल दिया गया था। एक दिन उसके पास एक बौद्ध भिक्षु भिक्षा मांगने गया तो उसने कहा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है। मेरे पास तो यही एक फल है, और उसने वही दे दिया।