
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में प्रतियोगी परीक्षा की कहानी इन दिनों ऐसी हो चली है, जिसमें परीक्षार्थी किताब लेकर बैठे हैं, सरकार रद्द करने को तैयार बतायी जा रही है और आयोग निर्णय लेने के लिए अपनी ही कुर्सियों को तलाश रहा है। यानी परीक्षा हो या रद्द हो, फैसला लेने के लिए सबसे पहले आयोग में फैसला लेने वाले लोग चाहिए!
मामला 14वीं सिविल सेवा रेगुलर पीटी के साथ-साथ सिविल सेवा बैकलॉग पीटी से जुड़ा है। राज्य सरकार इन परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमत बतायी जा रही है। लेकिन सरकारी सहमति और आयोग की औपचारिक स्वीकृति के बीच फिलहाल एक ऐसा प्रशासनिक ‘ट्रैफिक जाम’ खड़ा है, जिसमें सबसे बड़ी कमी वाहन की नहीं, बल्कि अध्यक्ष और सदस्यों की है।
आयोग के नियमों के अनुसार किसी परीक्षा को रद्द करने के लिए आयोग में अध्यक्ष और कम से कम एक सदस्य का होना जरूरी है। इसके बाद आयोग की बैठक होगी और उसी बैठक में परीक्षा रद्द करने का औपचारिक निर्णय लिया जा सकेगा। अब समस्या यह है कि आयोग में इस समय न अध्यक्ष हैं और न सदस्य।
अर्थात सरकार कह रही है कि परीक्षा रद्द करने में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन आयोग के पास फिलहाल उस हां को सरकारी आदेश में बदलने के लिए जरूरी संवैधानिक-प्रशासनिक व्यवस्था ही उपलब्ध नहीं है। इसे झारखंडी प्रशासनिक शैली में यूं समझा जा सकता है कि फैसला तैयार है, बस फैसला लेने वाली बैठक के लिए लोग नहीं हैं!
स्थगित करने का अधिकार है, रद्द करने का अधिकार नहीः 21 जुलाई को सीआईडी की छापेमारी के बाद राज्य सरकार के निर्देश पर आयोग के परीक्षा नियंत्रक ने 25 जुलाई से शुरू होने वाली 14वीं सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2025 समेत कई परीक्षाओं को स्थगित कर दिया था।
परीक्षा नियंत्रक राज्य सरकार के निर्देश पर परीक्षा स्थगित कर सकते हैं, लेकिन उसे रद्द करने के लिए आयोग की स्वीकृति आवश्यक होगी। यही वह बारीक अंतर है, जिसने परीक्षार्थियों की बेचैनी को और बढ़ा दिया है। स्थगित परीक्षा यानी अभी नहीं। रद्द परीक्षा यानी अब नहीं। और झारखंड में फिलहाल परीक्षार्थियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे किस नहीं की तैयारी करें!
परीक्षाओं की लंबी कतार, इंतजार उससे भी लंबाः सीआईडी छापेमारी के बाद जिन परीक्षाओं को स्थगित किया गया, उनमें 25 जुलाई से आरंभ होनेवाली 14वीं सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2025 के अलावा एक अगस्त से शुरू होने वाली सिविल सेवा बैकलॉग-2023, आठ अगस्त से शुरू होने वाली सिविल सेवा बैकलॉग-2025 छह सितंबर से शुरू होने वाली सिविल जज जूनियर लिखित परीक्षा, आठ सितंबर से शुरू होने वाली एपीपी बैकलॉग लिखित परीक्षा, 11 सितंबर से होने वाली फैक्ट्री इंस्पेक्टर लिखित परीक्षा, 19 सितंबर से शुरू होने वाली प्रोजेक्ट मैनेजर लिखित परीक्षा, 25 सितंबर से शुरू होने वाली एपीपी रेगुलर लिखित परीक्षा तथा 26 सितंबर से शुरू होने वाली ब्यॉलर इंस्पेक्टर लिखित परीक्षा शामिल हैं।
यानी परीक्षा कैलेंडर में तारीखें तो थीं, लेकिन अब उन तारीखों के सामने स्थगित का ठप्पा है। परीक्षार्थियों के लिए यह ठप्पा किसी परिणाम से कम भारी नहीं है। उन्होंने महीनों पढ़ाई की। समय सारिणी बनायी। नौकरी और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाया। परीक्षा केंद्र की तैयारी की। और अंततः परीक्षा के बजाय उन्हें मिला स्थगन।
अब यदि परीक्षा रद्द करनी है तो उसके लिए आयोग चाहिए। आयोग के लिए अध्यक्ष चाहिए। अध्यक्ष के साथ कम से कम एक सदस्य चाहिए। फिर बैठक चाहिए। और बैठक के बाद निर्णय चाहिए। परीक्षार्थी शायद सोच रहे होंगे कि अगली परीक्षा की तैयारी करें या आयोग की संरचना पूरी होने की तैयारी!
सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, भरोसे का भीः प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे मूल्यवान चीज सिर्फ किताब नहीं होती, बल्कि परीक्षार्थी का समय और भरोसा होता है। एक अभ्यर्थी जब किसी परीक्षा के लिए दो-तीन साल तक तैयारी करता है तो वह केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ता। वह अपनी उम्र, नौकरी, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों को भी उस परीक्षा के हिसाब से व्यवस्थित करता है।
ऐसे में परीक्षा का स्थगन केवल कैलेंडर की तारीख बदलना नहीं होता। और जब परीक्षा रद्द होने की स्थिति पैदा होती है, तो मामला और गंभीर हो जाता है। क्योंकि फिर वही पाठ्यक्रम, वही मेहनत, वही उम्र और वही अनिश्चितता दोबारा सामने खड़ी हो सकती है।
डॉ. अनिमा हांसदा का मामला भी चर्चा में: इस पूरे घटनाक्रम में आयोग की सदस्य पद से इस्तीफा देने वाली डॉ. अनिमा हांसदा का मामला भी चर्चा में है। बताया गया है कि उनकी बेटी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल हो रही हैं। इसी कारण डॉ. हांसदा ने पहले ही अपने आपको सिविल सेवा रेगुलर और बैकलॉग परीक्षा से लिखित रूप से अलग कर लिया था।
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे मामलों में परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर उठने वाले सवालों का समाधान पारदर्शिता और स्पष्ट प्रक्रिया से ही संभव है। यदि संबंधित पदाधिकारी स्वयं को किसी प्रक्रिया से अलग करते हैं, तो यह रिकॉर्ड पर स्पष्ट होना चाहिए कि उन्होंने किस कारण और किस स्तर पर स्वयं को अलग किया।
अब असली परीक्षा किसकी? विडंबना देखिएकि सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों की परीक्षा अभी दूर है, लेकिन आयोग और सरकार के सामने उससे पहले एक दूसरी परीक्षा खड़ी हो गयी है।
क्या आयोग के बिना आयोग परीक्षा रद्द कर सकता है? जवाब नियमों में मौजूद है नहीं। तो फिर अगला सवाल कि आयोग में अध्यक्ष और सदस्य कब होंगे? यही सवाल फिलहाल परीक्षार्थियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि जब तक आयोग में निर्णय लेने की विधिवत व्यवस्था बहाल नहीं होती, तब तक स्थगित परीक्षा और रद्द परीक्षा के बीच का यह प्रशासनिक झूला चलता रह सकता है।
बहरहाल, झारखंड के हजारों प्रतियोगी परीक्षार्थियों की स्थिति इस समय कुछ ऐसी है कि वे किताब खोलते हैं तो परीक्षा की तारीख याद आती है, कैलेंडर देखते हैं तो स्थगन याद आता है और आयोग की ओर देखते हैं तो कुर्सियां दिखाई देती हैं।
कहानी में सरकार तैयार है। परीक्षार्थी तैयार हैं। कागज तैयार हैं। नियम भी तैयार हैं। बस निर्णय लेने के लिए अध्यक्ष और एक सदस्य की तलाश बाकी है। यानी झारखंड में फिलहाल सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षा शायद सिविल सेवा नहीं, बल्कि यह है कि आयोग की कुर्सी पर कौन बैठेगा? और जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तब तक हजारों अभ्यर्थियों के लिए एक ही पाठ्यक्रम चल रहा है कि परीक्षा स्थगित होने के बाद अगली सूचना तक प्रतीक्षा करें।









