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धरती आबा फिल्म महोत्सव 2025: रांची में आदिवासी सिनेमा का ऐतिहासिक उत्सव

रांची, 17 अक्टूबर 2025 (रांची दर्पण)। झारखंड की राजधानी रांची के मोराबादी स्थित डॉ. राम दयाल मुंडा आदिवासी कल्याण शोध संस्थान में तीन दिवसीय धरती आबा आदिवासी फिल्म महोत्सव (DAFF 2025) 16 अक्टूबर को शानदार समापन के साथ संपन्न हुआ। 14 से 16 अक्टूबर तक आयोजित इस पहले संस्करण ने भारत में आदिवासी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया।

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय और झारखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में देश भर से 52 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया, जो आदिवासी जीवन, पहचान और सामाजिक परिवर्तन पर केंद्रित थीं। यह आयोजन संस्कृति, कला और गहन विचार-विमर्श का एक जीवंत संगम बन गया, जिसने आदिवासी आवाजों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर उभारा।

महोत्सव का उद्घाटन कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने किया, जिन्होंने सिनेमा को आदिवासी जीवनशैली, कला और संस्कृति को संरक्षित करने का एक शक्तिशाली माध्यम बताया। उनके उद्घाटन भाषण ने इस आयोजन के महत्व को रेखांकित किया, जो न केवल सांस्कृतिक संरक्षण का मंच बना, बल्कि आदिवासी समुदायों की कहानियों को विश्व पटल तक पहुंचाने का एक जरिया भी साबित हुआ। डॉ. राम दयाल मुंडा आदिवासी कल्याण शोध संस्थान (TRI) ने इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन को सफलतापूर्वक संचालित कर अपनी संगठनात्मक क्षमता का परिचय दिया।

15 अक्टूबर को महोत्सव का दूसरा दिन उत्साह से भरा रहा। नगपुरी फीचर फिल्म सेलेस्टिना एंड लॉरेंस के प्रदर्शन के दौरान सभागार खचाखच भरा रहा। फिल्म के निर्देशक विक्रम कुमार के साथ हुई जीवंत बातचीत ने दर्शकों के क्षेत्रीय कहानियों के प्रति गहरे लगाव को दर्शाया। इसके बाद, स्नेहा मुंडारी द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण पैनल चर्चा,  ‘आदिवासी सिनेमा पर केंद्रित: संरचनात्मक शिक्षा और पुनर्जनन की कला ‘ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस चर्चा में फिल्म निर्माता श्यामा कर्मकार और कृष्णा सोरेन ने हिस्सा लिया। सोरेन ने तकनीकी विशेषज्ञता के महत्व पर जोर दिया, जबकि कर्मकार ने स्क्रिप्ट में लचीलापन बरतने की सलाह दी। दोनों ने इस बात पर सहमति जताई कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक उपकरण तो हो सकता है, लेकिन यह मानवीय रचनात्मकता का स्थान नहीं ले सकता।

पैनल ने झारखंड में सिनेमा के विकास में तीन प्रमुख बाधाओं की पहचान की:

  • भाषाई बाधा: मुख्यधारा सिनेमा में आदिवासी भाषाओं की सीमित पहुंच।
  • ऐतिहासिक अल्प-प्रतिनिधित्व: मुख्य भूमिकाओं में आदिवासी समुदायों का अभाव।
  • दर्शक पहुंच: विविध दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचने में चुनौतियां।

महोत्सव का अंतिम दिन आदिवासी सिनेमा को सांस्कृतिक संग्रह के रूप में स्थापित करने पर केंद्रित रहा। निर्देशक उमुल जुनो सोरेन ने अपनी फिल्म सकम ओरेस (तलाक) पर चर्चा की, जिसमें अभिनेता और जूरी सदस्य महादेव टोप्पो भी शामिल हुए, जिनकी फिल्म जादूगोड़ा का प्रदर्शन हुआ। सेमिनारों में आदिवासी सिनेमा की भूमिका पर जोर दिया गया, जो पारंपरिक भाषाओं, लोककथाओं और जीवनशैली को संरक्षित करने के साथ-साथ गलत चित्रण को चुनौती देता है।

समापन समारोह एक भावपूर्ण उत्सव रहा, जिसमें कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने पूर्व आईएएस अधिकारी रणेंद्र कुमार, उप निदेशक सुश्री मोनिका रानी तुटी और फिल्म निर्माता मेघनाथ के साथ धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

मंत्री लिंडा ने अपने भावुक संबोधन में कहा कि यह आयोजन फिल्म निर्माताओं से उनकी रचनात्मकता सीखने की प्रेरणा देता है और यह भी दर्शाता है कि सिनेमा ही वह एकमात्र माध्यम है, जो विश्व को आदिवासी संस्कृति से परिचित करा सकता है। उनके शब्दों ने महोत्सव के सार को समेटा और आदिवासी कहानियों को वैश्विक मंच पर ले जाने के इसके मिशन को रेखांकित किया।

DAFF 2025 ने एक प्रतिष्ठित पुरस्कार समारोह के साथ समापन किया, जिसमें विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित किया गया:

फीचर फिल्म पुरस्कार

  • प्रथम पुरस्कार: येक्सिक्स डॉटर – ₹1,00,000, साहस और प्रामाणिक सांस्कृतिक चित्रण के लिए।
  • द्वितीय पुरस्कार: सेलेस्टिना एंड लॉरेंस – ₹60,000, आकर्षक क्षेत्रीय कथा के लिए।
  • तृतीय पुरस्कार: सकम ओरेस (तलाक) – ₹40,000, पहचान और सामाजिक गतिशीलता की खोज के लिए।

लघु फिल्म पुरस्कार

  • प्रथम पुरस्कार: क्रॉस रोड – ₹50,000, मासूमियत और नैतिक चिंतन की कहानी।
  • द्वितीय पुरस्कार: पुइसा डारे – ₹30,000, सामुदायिक विकास पर केंद्रित।
  • तृतीय पुरस्कार: पपीता – ₹20,000, सादगी और भावनात्मक गहराई के लिए।

लंबी वृत्तचित्र पुरस्कार

  • प्रथम पुरस्कार: बॉन्डेड – ₹80,000, शक्तिशाली सामाजिक टिप्पणी के लिए।
  • द्वितीय पुरस्कार: द बर्ड, द प्रीस्ट – ₹50,000, आदिवासी अर्थव्यवस्था की खोज के लिए।
  • विशेष उल्लेख: 16 मिलेट थीव्स, इसकी गहन कथा के लिए।

लघु वृत्तचित्र पुरस्कार

  • प्रथम पुरस्कार: रुखु माटिर दुखु माझी (बंजर भूमि का पुत्र) ₹50,000, प्रेरणादायक जमीनी प्रयासों के लिए।
  • द्वितीय पुरस्कार: जमीन मा का फूल ₹30,000, सांस्कृतिक गहराई के लिए।
  • तृतीय पुरस्कार: मैन, मेलोडी एंड डॉल्स ₹20,000, अद्वितीय कहानी कहने के लिए।
  • विशेष जूरी उल्लेख: इनविजिबल (फीचर) और न्गुल गे सेब (लघु वृत्तचित्र), अलेय्या हसन अलेया हक, जो अद्वितीय दृष्टिकोण, मानव-पशु बंधन और संरक्षण दुविधाओं पर साहसी कहानियों के लिए सम्मानित किए गए।

धरती आबा आदिवासी फिल्म महोत्सव 2025 की अपार सफलता ने इसे भारत के सांस्कृतिक कैलेंडर में एक अनिवार्य वार्षिक आयोजन के रूप में स्थापित कर दिया है। आदिवासी फिल्म निर्माताओं को अपनी कहानियां साझा करने का मंच प्रदान करके इस महोत्सव ने झारखंड के आदिवासी सिनेमा को राष्ट्रीय और वैश्विक सिनेमा में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित किया है। सांस्कृतिक संरक्षण, कलात्मक नवाचार और सामाजिक परिवर्तन पर केंद्रित इस आयोजन ने भविष्य के संस्करणों के लिए एक उच्च मानक स्थापित किया है, जो आदिवासी आवाजों को वैश्विक मंच पर और अधिक उभारने का वादा करता है।

Expert Media News

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लेखन-संपादन करते आ रहे हैं।

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