जी हां, मैं 150 साल पुराना ऐतिहासिक चंडी मैदान बोल रहा हूँ !

मैनें अंग्रेजी हुकूमत में गुलामी की बर्बरता भी देखी है और आजादी की रौनक भी। वोट का युग भी देखा हूँ। हर पांच वर्ष पर नेताओं की धमाचौकड़ी, नूराकुश्ती भी देखी है 

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क/ जयप्रकाश नवीन। ‘सूना पड़ा है मेरी आंचल, सुना है एक मोबाइल बच्चों की गेंद चुरा ले गया…’ जी हां, मैं चंडी की ह्दयस्थली हूँ, मैं एक ऐतिहासिक खेल मैदान हूँ। कहने को मेरा डेढ़ सौ वर्ष पुराना इतिहास है।

लेकिन मैं आज हताश और उदास हूँ। मेरे साथ ईश्वर ने अन्याय किया है। अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य की तरह हमेशा के लिए अतीत हो गया हूँ। सियासत की विरासत की।

उस राजनीति की फरेब का  शिकार हो गया, जिस राजनीति को मैंने अपनी छाती पर सींचा। अगर मैं बोल सकता तो हर सियासी संघर्ष की मूक गवाही नहीं देता। आएं दिन बेरंग होते जा रहा हूँ। मुझे सियासत ने बेनूर कर दिया।

मैं वक्त के माथे लिखी एक बदकिस्मत इबारत हूँ। मैं चंडी के फने तामीर की मुहं बोलती बानगी हूँ। उंची-उंची इमारतों के बीच अतीत को अपने दामन में लपेटें दस्तार की मानिंद नजर आता रहा हूँ। वक्त के हाथों लाचार हूँ, कैसे कह दूं कि ये दिन अच्छे है। न कोई पक्ष नजर आता है न विपक्ष।

मुझे पहले खेल मैदान के रूप में जाना जाता था। वे भी क्या दिन थें जब सुबह-शाम मुझे बच्चों, जवानों की किलकारियां, हंसी-ठिठोली और चहलकदमी सुनाई देती थी। कभी क्रिकेट  खिलाड़ियों और दर्शकों से गुलजार रहता था।

कभी फुटबॉल को कब्जे में लेने को बेताब खिलाड़ियों की एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ मुझे रोमांचित करता था।उनके बूटो की धमक मेरे दिल की धड़कन लगती थी। लेकिन अब तो मेरा दिल रोता है। मेरे सीने पर आयोजन के नाम पर मेरे साथ फरेब होता है।

आएं दिन कभी स्कूलों के कार्यक्रम तो कभी झूले तो कभी कुछ के आयोजन करने वालों की आहट से थर्राता हूँ। मेरे सीने पर जहाँ-तहाँ गड्ढे किये जाते है। मेरा कलेजा रोने को आ जाता है।

आयोजन के नाम पर बेपरवाह होकर मुझ पर तमाम तरह की गंदगी, कूड़े ही कूड़े यानी सर्वत्र गंदगी का अबांर। लघु-शंका, दीर्घ शंका के अलावा मैं सूअरो का चारागाह भी हूँ। मेरी छाती पर सूअर भांगडा करते है। इसके अलावा तबेला भी हूँ मैं।

इन आयोजनों के बाद जब दौड़ने के लिए छात्रों की टोली आती है तो मैं खाली जरूर दिखता हूँ, तो उन्हें यह गंदगी और गड्ढे परेशान करती है। क्योंकि आयोजक गंदगी करना या करवाना अपना हक समझते हैं,परंतु साफ करना- करवाना शान के खिलाफ। हम उन छात्रों से सिपाही, दारोगा बनने की उम्मीद करते हैं। जिन्हें हम दौड़ के लिए एक साफ-सुथरा मैदान भी मयस्सर नहीं करा सकते है।

कहने को मेरा 150 साल का इतिहास है। मेरा महत्व सिर्फ इतना नहीं है कि यह एक मैदान है। मैं वह मैदान हूँ। जहाँ से जंगे आजादी की शुरुआत हुई थी।

इसी मैदान पर आजादी के मतवालों ने 16,अगस्त,1942 को चंडी थाना पर तिरंगा फहराया था।

अंग्रेजी पुलिस की गोली लगने से एक क्रांतिकारी बिंदेश्वरी सिंह शहीद हो गये थे। मैं गवाह हूँ। मेरे ही हिस्से को बांटकर 1905 में चंडी थाना का अधूरा भवन बना था। मैं गवाह हूँ अंग्रेज दारोगा के अस्तबल का। उन घोड़ो की टाप, जो मेरी छाती को रौंद देती थी। मैदान में भूरे साहब और अभिजात्य वर्ग के लोग हवाखोरी करते थे।

देश आजाद हुआ उसके बाद महात्मा गांधी की हत्या के बाद मेरे पास ही उनके नाम पर 1948 में बापू हाईस्कूल की नींव रखी गई। तबसे मैं भी बापू हाईस्कूल मैदान के नाम से जाने लगा।

कभी मैं आसपास के इलाके का फुटबॉल मैदान के रूप में बेताज बादशाह हुआ करता था। समय के साथ लोगों में क्रिकेट को लेकर रूचि बढ़ी तो मैं क्रिकेट प्रेमियों का प्रेमिका हो गया।

बिहार के पूर्व शिक्षामंत्री डाँ रामराज सिंह के निधन के बाद दो दशक तक उनके नाम पर डाँ रामराज सिंह क्रिकेट टूर्नामेंट का गवाह रहा हूँ। क्रिकेट के कई रणजी खिलाड़ी मेरी शोभा में चार चांद लगा चुके हैं। शाम को महिलाएं, बच्चे सभी चहलकदमी के लिए आया करती थी।

1995 में किसी की नजर लग गई। कुछ लोगों ने मेरे एक हिस्से पर कब्जा शुरू कर दिया। एक कोने में मकान बनने लगा।

मैं शुक्र गुजार हूँ, अपने प्रेमियों का जिन्होंने मुझे आजाद करने के लिए आगे आएं। सभी ने मिलकर मुझे अतिक्रमण मुक्त किया।

शहर कई दिनों तक बंद रहा। केस मुकदमे हुए, लेकिन मेरे चाहने वाले पीछे नहीं हटे। मेरी घेराबंदी की गई, ताकि भविष्य में कोई मेरी ओर फिर से आंख उठाकर न देख सकें।

जी,हां मैं खेल मैदान बोल रहा हूँ। मेरा इतिहास इतना ही नहीं है। मेरे दामन में कितने किस्से -कहानियां समटी हुई है। मैं राजनीतिक दलो,राजनीतिक रैलियों का भी गवाह रहा हूँ।

मैं गवाह हूँ! चंडी के पहले विधायक धनराज शर्मा की जीत का। मैं गवाह हूं, देवगण प्रसाद की जीत का, मै गवाह हूँ! डाँ रामराज सिंह की सियासत का, मैं गवाह हूँ! आपातकाल का! मैं गवाह हूँ!

1977 में एक नये चेहरे हरिनारायण सिंह की जीत का जो आज भी मेरे हमसफर है। मैं गवाह हूँ,1977 से 2015 तक डाँ रामराज सिंह, उनके पुत्र अनिल सिंह और हरिनारायण सिंह के बीच की राजनीतिक लड़ाई का।

मैं गवाह हूँ ! देश की कई जानी-मानी राजनीतिक हस्तियों के चुनावी भाषण और रैलियों का। 1962 में पहली बार हमने जनता को नजदीक से हेलीकॉप्टर का दर्शन कराया था।

मैंनें सियासत के रंग भी देखा है। मैंने देखा है कि किस नेता में कितना दम खम है। सैकड़ों नेताओं को देखा, उनके भाषण सुने। नेताओं की कथनी और करनी के भेद भी मुझे मालूम है। मैं हर राजनीतिक और जातीय रैली का स्थल और गवाह रहा हूँ।

मैनें देखा है पूर्व सीएम महामाया सिन्हा की दहाड़ को। ‘लख्ते जिगर’ संबोधन पर उत्साही युवकों की जोश को देखा है। मैने देखा है उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल को किसानों से बात करते हुए।

मैनें देखा है दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अंधेरे में कविता से सनी हुई ओजपूर्ण और लच्छेदार भाषण। मैंने पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की भी दिल खोलकर स्वागत किया है। उनकी सरलता, सौम्यता और मृदुभाषी व्यक्तित्व भी देखा है।

मैनें लालू प्रसाद यादव की वाक पटूता और उनका गवई अंदाज भी कई बार  देखा है। जनता को मंच पर बुलाकर हालचाल जानने वाले ऐसा मुख्यमंत्री  कभी नहीं देखा। कर्पूरी ठाकुर से लेकर दिवंगत जगन्नाथ मिश्रा तक को मैने देखा और सुना है।

मेरी छाती पर खड़े होकर रामविलास पासवान और चिराग पासवान भी दहाड़ चुके हैं। मैं कई पीढियों का गवाह रहा हूँ। मैं गवाह हूं! वर्तमान सीएम नीतीश कुमार की राजनीतिक उतार-चढ़ाव का।

मैंने उन्हे बहुत प्रेम और स्नेह दिया, जितना शायद ही किसी अन्य को दिया होगा। मेरे आंगन में सिर्फ़ राजनेता ही नहीं आएं, फिल्मी सितारों ने भी मेरी शोभा बढ़ाई है। दिवंगत आभिनेता फिरोज खान हो या फिर आदित्य पंचोली।

जिन नेताओं का मैंने मंच दिया, वह मंच इतिहास बन गया। उस मंच को तोड़ दिया गया। मुझे आधुनिक बनाने का प्रयास किया गया। लाखों रूपये स्टेडियम के नाम पर मुझ पर फूंक दिया गया। वो स्टेडियम आधा अधूरा बनकर खंडहर हो गया।

कहाँ तो मुझमें चार चांद लगाने की तैयारी थी। लेकिन उल्टे मुझे बदरंग बना दिया गया। अब मेरे आंगन में असमाजिक तत्वों का जमावड़ा है। गंदगी है,पेशाबखाना है। अब कोई भी अच्छे लोग मेरे पास आना नहीं चाहते हैं। मेरे सौंदर्य के लिए मिट्टी भराई होना था, लेकिन यहाँ की टांग अड़ाई नेताओं की प्रवृति की वजह से मुझे गंदगी का सामना करना पड़ रहा है।

आज की युवा पीढ़ी तो मेरे इतिहास से बेखबर है। ब्रांडेड मोबाइल फोन, पिज्जा-बर्गर का स्वाद चखने और टिकटाक वाली युवा क्या समझेगी पांच रुपये की मूंगफली लेकर मैदान में दोस्तों के साथ मजा लेने की  आनंद की अनुभूति  को।

मैं कभी लोगों के लिये मनोरंजन का समाजवाद हुआ करता था। कौन नहीं आता था। मैं सबका रास्ता रहा, दोस्तों का अड्डा था। मैं कभी लोगों का पता हुआ करता था कि आना तो चंडी फील्ड में। कल मैच है। मैं एक धड़कन हुआ करता था, एक रास्ता हुआ करता था।

मैं सिर्फ़ एक मैदान नहीं हूँ कि यहाँ खेला समय बिताया और निकल गये। 150 सालों की अनंत यादों में पीढ़ियों की  मोहब्बत ने खेल के संस्कार दिखायें। जिसमें खेल धड़कता था लेकिन, वो धड़कन खो चुकी है। उन यादों का क्या होगा, उन चाहतों का क्या होगा, जो बिसार दी गई है। मेरे लिए वह सब छूट गया है। एक पता, एक बहाना आना तो चंडी फील्ड आना!

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