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1857 की क्रांति की अमर गाथा का साक्षी है ओरमांझी का यह बरगद

This banyan tree in Ormanjhi is a witness to the immortal saga of the 1857 revolution.

ओरमांझी (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड की राजधानी रांची जिले के ओरमांझी की धरती पर खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़ केवल प्रकृति का अद्भुत उपहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम और बलिदानी इतिहास का मूक साक्षी भी है।

इस बरगद की जड़ों में वह कहानी छिपी है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी और छोटानागपुर क्षेत्र को आजादी की ज्वाला से आंदोलित कर दिया था। यही वह स्थान है, जहां 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महान अग्रदूत शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।

देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी जब उत्तर भारत में भड़की, तब छोटानागपुर क्षेत्र भी उससे अछूता नहीं रहा। रांची और आसपास के इलाकों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को संगठित और दिशा देने का कार्य टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी ने किया।

साधारण परिवार में जन्मे शेख भिखारी असाधारण साहस, नेतृत्व और दूरदर्शी सोच के धनी थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के खिलाफ ग्रामीणों और आदिवासी समाज को एकजुट किया।

वहीं बंदगांव राजपरिवार से जुड़े टिकैत उमराव सिंह आदिवासी समाज के महान नायक थे, जिन्होंने खुलकर अंग्रेजी नीतियों का विरोध किया और जनआंदोलन का नेतृत्व संभाला।

वर्ष 1857 में चुटूपालू घाटी से अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का उद्घोष किया गया। इस विद्रोह का असर इतना व्यापक था कि अंग्रेजी सेना में शामिल कई भारतीय सिपाहियों ने भी बगावत कर दी।

टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी ने इन विद्रोहियों का पूरा समर्थन किया, जिसके चलते अंग्रेजों को कुछ समय के लिए रांची से भागना पड़ा। यह वह दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत को पहली बार छोटानागपुर में अपनी सत्ता डगमगाती नजर आई।

हालांकि, सितंबर 1857 तक अंग्रेजों ने पुनः अपनी शक्ति को संगठित किया। कई जमींदारों और छोटे राजाओं के सहयोग से उन्होंने क्षेत्र में फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया और विद्रोहियों की तलाश तेज कर दी।

छल-कपट के जरिए टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में लोग एकत्र होने लगे, जिससे अंग्रेज और भी भयभीत हो उठे।

अंग्रेजों के मन में इन दोनों क्रांतिवीरों का ऐसा आतंक था कि उन्होंने किसी भी प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया अपनाने की जरूरत नहीं समझी। 8 जनवरी 1858 को ओरमांझी के समीप इसी ऐतिहासिक बरगद के पेड़ पर दोनों वीर सपूतों को फांसी दे दी गई।

यह फांसी केवल दो व्यक्तियों को नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की उस चेतना को दबाने का प्रयास थी, जो गांव-गांव में फैल चुकी थी।

इस दमनकारी कार्रवाई के दौरान टिकैत उमराव सिंह के भाई टिकैत घांसी सिंह को भी गिरफ्तार कर लोहरदगा जेल भेज दिया गया, जहां जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। इसके बावजूद अंग्रेज विद्रोह की भावना को पूरी तरह कुचल नहीं सके।

आज भी ओरमांझी का यह बरगद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह के अद्वितीय बलिदान की गवाही देता है। प्रत्येक वर्ष 8 जनवरी को शहीद स्थल पर श्रद्धा और सम्मान के साथ दोनों अमर शहीदों को नमन किया जाता है।

यह दिन नई पीढ़ी को यह संदेश देता है कि आजादी की नींव साधारण दिखने वाले लेकिन असाधारण साहस वाले नायकों के बलिदान से रखी गई थी। ओरमांझी की यह धरती और यह बरगद का पेड़ हमें बार-बार याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और बलिदान की अमर कहानी है।

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