कांके फर्जी जमाबंदी सिंडिकेट: पूर्व प्रभारी CO शीलवंत भट्ट के भ्ष्टाचार को व्यवस्था का संरक्षण?

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज। हेमंत सरकार की नाके के नीचे राजधानी रांची के कांके अंचल अंतर्गत नेवरी मौजा का एक जमीन विवाद अब साधारण राजस्व त्रुटि से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही, संभावित मिलीभगत और पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।

अपील वाद संख्या 396/2025-26 से जुड़े इस मामले में उप समाहर्ता भूमि सुधार (DCLR) द्वारा स्पष्ट आदेश पारित किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर अनुपालन नहीं होना पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

25 डिसमिल से 37 डिसमिल: विवाद की जड़ क्या है?

मामले का मूल केंद्र नेवरी मौजा के खाता संख्या 17, प्लॉट संख्या 1335 से जुड़ा है। अभिलेखों के अनुसार इस प्लॉट का कुल रकबा मात्र 25 डिसमिल है, जिसका वर्ष 2010 से विधिवत दाखिल-खारिज, जमाबंदी और दखल-कब्जा पीड़ित पक्ष के नाम से कायम है।

इसके बावजूद वर्ष 2021-22 से अचानक अतिरिक्त 12 डिसमिल की जमाबंदी सृजित कर रसीद निर्गत की जाने लगी। इस प्रकार कागज पर कुल रकबा 37 डिसमिल दर्शाया जाने लगा। यह विसंगति न केवल तकनीकी त्रुटि से परे है, बल्कि संभावित अभिलेखीय कूटकरण की ओर संकेत करती है।

DCLR का स्पष्ट आदेश, लेकिन अनुपालन शून्य

उप समाहर्ता भूमि सुधार (DCLR) सदर रांची ने दिनांक 02.12.2025 को राजशेखर के नाम से की गई 12 डिसमिल की जमाबंदी को निरस्त करते हुए अंचल अधिकारी कांके को अभिलेखीय सुधार एवं अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का स्पष्ट निर्देश दिया था।

इसके बावजूद महीनों बीत जाने के बाद भी कोई सुधार नहीं किया गया। DCLR न्यायालय को रिपोर्ट नहीं भेजी गई। ऑनलाइन राजस्व अभिलेख यथावत हैं । यह स्थिति सीधे-सीधे न्यायालयीय आदेश की अवहेलना को दर्शाती है।

जनता दरबार में निर्देश, फिर भी असर नहीं

25 मार्च 2026 को उपायुक्त रांची के जनता दरबार में यह मामला उठाया गया। उपायुक्त ने तत्काल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अंचल अधिकारी से संपर्क कर आदेश के अनुपालन का निर्देश दिया।

अंचल अधिकारी द्वारा उस समय रिपोर्ट भेजे जाने की बात कही गई। इसके ठीक विपरित उसी दिन यानि 25 मार्च 2026 को अपर समाहर्ता कार्यालय से भी ईमेल के माध्यम से रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। जिसकी प्रति प्रार्थी को भी भेजी गई। जहिर है कि कांके सीओ ने डीसी जनता दरबार में अपर समाहर्ता कार्यालय रिपोर्ट भेजे जने की झूठी सूचना दी।

लेकिन 09 अप्रैल 2026 तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं। कोई अनुपालन रिपोर्ट नहीं। कोई डिजिटल सुधार नहीं। यह प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठाता है। आखिर किसे बचाया जा रहा है?

पूर्व प्रभारी CO शीलवंत कुमार भट्ट की भूमिका पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप उस अवधि से जुड़ा है, जब तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी शीलवंत कुमार भट्ट अंचल अधिकारी के प्रभार में कार्यरत थे। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार अतिरिक्त 12 डिसमिल की जमाबंदी उसी अवधि में सृजित हुई। राजस्व अभिलेखों में व्यापक पैमाने पर असामान्य परिवर्तन दर्ज हुआ।

ये तथ्य भी सामने आ रहे हैं कि राजस्व कर्मचारी, सीआई और भूमि दलालों की मिलीभगत रही। व्यवस्थित तरीके से फर्जी जमाबंदी का निर्माण किया गया।  यदि यह जांच में सत्य सिद्ध होता है तो यह मामला एक बड़े संगठित भूमि फर्जीवाड़े का रूप ले सकता है।

वर्तमान CO अमित भगत का लापरवाह संरक्षण

वर्तमान अंचल अधिकारी अमित भगत की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। DCLR आदेश, उपायुक्त के निर्देश, अपर समाहर्ता के पत्र और RTI के माध्यम से बार-बार ध्यान आकृष्ट किए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। किसी आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। रिपोर्ट तक प्रस्तुत नहीं की गई।

यह स्थिति यह संकेत देती है कि या तो गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है या फिर पूर्व में हुए संभावित फर्जीवाड़े को संरक्षण दिया जा रहा है।

क्या अंचल कार्यालय ‘जमीन पैदा’ कर सकता है?

सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यही है कि जब नक्शा और खतियान में 25 डिसमिल दर्ज है, तो 37 डिसमिल कैसे हो गया? राजस्व व्यवस्था में किसी प्लॉट का रकबा बढ़ाया नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति केवल दो कारणों से उत्पन्न होती है। अभिलेखीय त्रुटि (जो यहाँ संदिग्ध है) या जानबूझकर किया गया हेरफेर। यह सवाल अब प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी बन चुका है।

यह मामला केवल एक प्लॉट तक सीमित नहीं है। इससे व्यापक संकेत मिलते हैं कि फर्जी जमाबंदी कभी भी संभव है। रसीद निर्गत हो सकती है और उसे हटाने में वर्षों लग सकते हैं यह स्थिति आम नागरिकों के बीच राजस्व तंत्र के प्रति अविश्वास को जन्म देती है।

सिस्टम की खामियां उजागर

इस पूरे प्रकरण से तीन बड़े निष्कर्ष सामने आते हैं। पहला, राजस्व अभिलेखों में हेरफेर की संभावना वास्तविक है। दूसरा,  न्यायालयीय आदेश भी प्रशासनिक स्तर पर लंबित रह सकते हैं। तीसरा,  जवाबदेही तय न होने से ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलता है।

अब यह मामला तीन संभावित दिशाओं में आगे बढ़ सकता है। जिला प्रशासन द्वारा कठोर कार्रवाई। भ्रष्टाचार निरोधक जांच। न्यायिक हस्तक्षेप (उच्च न्यायालय)। यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं होती है तो मामला न्यायालय की निगरानी में जाने की पूरी संभावना है।

क्योंकि एक प्लॉट नहीं, सिस्टम की परीक्षा

नेवरी मौजा का यह मामला अब केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है। यह पूरे राजस्व तंत्र की पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। जब 25 डिसमिल जमीन कागज पर 37 डिसमिल बन सकती है तो यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं बल्कि व्यवस्था के मूल ढांचे पर सवाल है।

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