एनडीए में मांझी की एंट्री, क्या गुल खिलाएगी लोजपा !

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज). बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों का गठबंधन और नेताओं का पालना बदलने का सिलसिला चल रहा है। कभी महागठबंधन का हिस्सा रहे पूर्व सीएम जीतनराम मांझी फिर से एनडीए का हिस्सा बन गए है।

लेकिन उनके एनडीए में एंट्री से पहले ही एनडीए के घटक लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान की लौ तेज हो गई है। उनके एनडीए मे आने से लोजपा काफी गरम दिख रही है।

वैसे भी देखा जाए तो चिराग पासवान पहले से ही सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। चिराग पासवान 42 सीट चाहते हैं। साथ ही एनडीए में रहते हुए भी 119 सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतारने की घोषणा कर चुके हैं। उनको मनाने के लिए बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने मनुहार की है, लेकिन बात नहीं बनी है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान की नाराजगी इस कदर बढ़ गई है कि वे जदयू के खिलाफ अपने उम्मीदवार भी उतार सकते हैं। इस बात को लेकर पार्टी गंभीरता से मंथन कर रही है।

वैसे भी सोमवार को दिल्ली में लोजपा संसदीय बोर्ड की बैठक होनी है जिसमें जदयू से रिश्ते को लेकर कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है। लोजपा का मानना है कि मांझी को एनडीए में लाना उनका अपना फैसला है।

मांझी की पार्टी को सीट बंटबारे में अलग से कोई फैसला नहीं होगा। जदयू उन्हें अपने कोटे से सीटे दे सकती है। एनडीए में लोजपा तीसरे दल की हैसियत रखना चाहती है। लेकिन मांझी के आने से वह संकट में दिख रही है।

इधर बीजेपी और जदयू अब दोनो लोजपा को ज्यादा महत्व नहीं दे रही है। लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के सामने एनडीए छोड़ने की चुनौती है।

उनके पिता केंद्र में मंत्री है। ऐसे में एनडीए से अलग होना उनके लिए आसान नहीं है। जदयू जीतनराम मांझी को एनडीए में लाकर एक वैकल्पिक दलित चेहरा चाह रही है।

कहा जा रहा है कि मांझी के एनडीए में आने से ज्यादा फर्क भले न पड़े, क्योंकि उनकी पार्टी हम का ज्यादा असर पिछली लोकसभा चुनाव में नहीं पड़ा था। उल्टे महागठबंधन को बुरी फजीहत झेलनी पड़ी थी।

मांझी जिस बिरादरी से आते हैं, उनका मध्य बिहार छोड़कर ज्यादा असर भी नहीं है। यहाँ तक कि उनके ही बिरादरी में उनके पाला बदलने से काफी नाराजगी दिख रही है। मांझी समुदाय इस बार राजद को वोट देने का मन बना चुका है।

कहा जा सकता है कि किसी एक दलित चेहरे पर पूरा दलित समाज किसी खास राजनीतिक दल को वोट देगा, यह सही नहीं है।

चिराग पासवान और जीतनराम मांझी दोनों बिहार के दलित और महादलित चेहरा माने जाते हैं। बिहार में मुसहर (मांझी) समुदाय के 1•8% तो पासवान (दुसाध) लगभग 5 %है।

बिहार में एक समय था जब दलितों का एकमुश्त वोट किसी एक राजनीतिक दल को जाता था। पिछले 15 साल तक लालू प्रसाद यादव दलितों के वोट को भुनाते रहे। इसी बीच धीरे-धीरे दलितों के वोट बैंक में बिखराव होता चला गया।

पूर्व सीएम जीतनराम के महागठबंधन से अलग होने से कितना असर पडे़गा फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता है। राजद में कई ऐसे चेहरे हैं, जो दलितों-पिछड़ो का प्रतिनिधित्व करते आ रहे है।

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