भ्रष्टाचारझारखंडदेशफीचर्डबिग ब्रेकिंग

रांची DCLR आदेश के बाद भी कटी अवैध रसीद! कांके में ‘जमाबंदी का गणित’ बना बड़ा सवाल

“अब सभी निगाहें ACB की जांच पर टिकी हैं। यदि प्रारंभिक जांच में अनियमितता की पुष्टि होती है तो मामला FIR दर्ज होने, विभागीय कार्रवाई  या उच्चस्तरीय जांच  तक जा सकता है। क्योंकि रसीद अगर आदेश से बड़ी हो जाए, तो सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, सिस्टम का होता है..

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। रांची जिले के कांके अंचल अंतर्गत एक भूमि प्रकरण ने एक बार फिर झारखंड के राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला नेवरी मौजा के एक प्लॉट से जुड़ा है, जहाँ दस्तावेज़ों के अनुसार 25 डिसमिल भूमि को राजस्व अभिलेखों में 37 डिसमिल के रूप में दर्शाए जाने का विवाद सामने आया है।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सक्षम प्राधिकारी—उप समाहर्ता भूमि सुधार (DCLR) सदर रांची द्वारा दिनांक 02 दिसंबर 2025 को कथित फर्जी 12 डिसमिल जमाबंदी को निरस्त करने का आदेश दिए जाने के बावजूद, 16 अप्रैल 2026 को उसी विवादित जमाबंदी के आधार पर वर्ष 2026-27 की राजस्व रसीद जारी कर दी गई। यह रसीद अब भी ऑनलाइन अभिलेखों में प्रदर्शित हो रही है।

आदेश बनाम कार्रवाई! कहाँ अटक रही प्रक्रिया? कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो DCLR का आदेश एक अर्ध-न्यायिक आदेश होता है, जिसका अनुपालन संबंधित अंचल अधिकारी के लिए बाध्यकारी होता है। इसके बावजूद आदेश के बाद नई रसीद जारी होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है कि क्या आदेश का पालन जानबूझकर नहीं किया गया? क्या राजस्व अभिलेखों में बदलाव की प्रक्रिया पर नियंत्रण कमजोर है? या फिर यह किसी बड़े स्तर की प्रशासनिक विसंगति का संकेत है?

झारखंड हाईकोर्ट भी पूर्व में इसी तरह के मामलों में आदेशों के अनुपालन में देरी को “गंभीर लापरवाही” मानते हुए कार्रवाई कर चुका है ।

जांच एजेंसियों की एंट्री, ACB ने दर्ज की PE: इस प्रकरण की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) तक पहुंचने के बाद अब इसमें प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry- PE) दर्ज की जा चुकी है।

PE दर्ज होना इस बात का संकेत है कि मामला केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि संभावित अनियमितता या गड़बड़ी की श्रेणी में देखा जा रहा है।

राज्य में इससे पहले भी भूमि से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों की सक्रियता देखी गई है, जहाँ रिकॉर्ड में हेरफेर और अवैध लेनदेन के आरोप सामने आते रहे हैं ।

 ‘25 से 37 डिसमिल’ एक तकनीकी गड़बड़ी या सिस्टम का खेल? राजस्व विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी भूमि का रकबा बिना वैध अभिलेखीय आधार के बढ़ जाना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए रजिस्ट्रेशन दस्तावेज , म्यूटेशन आदेश, फील्ड वेरिफिकेशन, राजस्व रजिस्टर अपडेट जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

ऐसे में एक ही प्लॉट पर दो अलग-अलग रकबा दिखना और दोनों पर रसीद निर्गत होना, “दोहरी जमाबंदी” या “रिकॉर्ड मैनिपुलेशन” जैसी स्थिति की ओर संकेत करता है।

सिर्फ एक मामला नहीं है यह सवालः यह प्रकरण केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि तीन बड़े मुद्दों को उजागर करता है। अदालती, प्रशासनिक आदेश और जमीनी क्रियान्वयन के बीच का अंतर। ऑनलाइन सिस्टम में एंट्री होने के बावजूद गलत डेटा का बने रहना। किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी, यह अब भी स्पष्ट नहीं।

Expert Media News

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लेखन-संपादन करते आ रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button