-: मुकेश भारतीय :-
रांची में इन दिनों एक नया गणित जन्म ले चुका है। ऐसा गणित कि जिससे 25 डिसमिल की जमीन बिना पसीना बहाए, बिना मिट्टी हिले, सीधे कागजों पर 37 डिसमिल हो जाती है। अगर यह फॉर्मूला स्कूलों में पढ़ा दिया जाए तो बच्चों को जोड़-घटाव की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और गणित के शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे।
फर्क बस इतना है कि यह कोई वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि राजस्व तंत्र के एक जिम्मेदार अंचल अधिकारी की कला का नमूना है। अब जनता उलझन में है कि साहब को भोला कहे या बेहद चालाक, क्योंकि इतनी बड़ी गणितीय उपलब्धि या तो अनजाने में हो सकती है या फिर बहुत सोच-समझकर।
मामला एक 25 डिसमिल प्लॉट का है। जिसकी वर्ष 2010 में पूरी 25 डिसमिल जमीन की विधिवत रजिस्ट्री हुई, दाखिल-खारिज हुआ, जमाबंदी बनी और तीन लोगों के नाम से 2020-27 तक रसीद अद्दतन है। जमीन पर बाउंड्री बनी है, कब्जा है, सब कुछ दुरुस्त चलता आ रहा रहा है। लेकिन फिर वर्ष 2022 आया और अचानक उसी प्लॉट में 12 डिसमिल अतिरिक्त जमीन उग आई। न खेत बढ़ा, न सीमा खिसकी, लेकिन कागजों में रकबा 25 से 37 हो गया। इसे चमत्कार कहें या सिस्टम की ऐसी मेहरबानी, जिसमें जमीन नहीं, सिर्फ कागज उपजाऊ होते हैं।
पीड़ित पक्ष ने जब इस चमत्कार को समझने की कोशिश की तो उसने प्रशासन के हर दरवाजे पर दस्तक दी। सीओ से लेकर डीसी तक, जन शिकायत कोषांग से लेकर आरटीआई और प्रथम अपील तक। नोटिस जारी हुए, रिपोर्ट तलब हुई, फाइलें चलीं, लेकिन नतीजा वही पुराना जांच जारी है वाला सुकून देने वाला जवाब। ऐसा लगा जैसे सिस्टम ने तय कर लिया हो कि समस्या का समाधान नहीं, उसकी परिक्रमा करनी है।
आखिरकार मामला डीसीएलआर कोर्ट पहुंचा। लंबी सुनवाई के बाद आदेश दिया गया कि 12 डिसमिल की फर्जी जमाबंदी रद्द की जाए और रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। लेकिन यह आदेश शायद दफ्तर पहुंचते-पहुंचते अपनी गंभीरता खो बैठा, क्योंकि पांच महीने बाद भी न कोई जमाबंदी रद्द हुई, न कोई रिपोर्ट आई। आदेश का सम्मान हुआ या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन उसकी नियति फाइलों के ढेर में आराम करना जरूर बन गई।
जब मामला एंटी क्रप्शन ब्यूरो तक पहुंचा तो सीओ साहब को अचानक सब कुछ बहुत गलत लगने लगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सब ठीक कर दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और दिलचस्प है। दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर दिए गए कि वे कागजात प्रस्तुत करें। अब सवाल यह है कि जिस कार्यालय में पूरी फाइलें मौजूद हैं, जहाँ 2010 से लेकर 2022 तक की हर एंट्री दर्ज है, वही दफ्तर जनता से पूछ रहा है कि कागज दिखाइए। इसे प्रक्रिया कहें या समय काटने की परंपरा, यह समझना अब जनता के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह मामला अब प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन चुका है। न निगलते बन रहा है, न उगलते। अगर कार्रवाई होती है तो कई परतें खुल सकती हैं और अगर नहीं होती तो सवाल और गहरे होते जाएंगे। ऐसे में नोटिस, जांच, प्रतीक्षा- ये सब मिलकर एक ऐसा चक्र बना देते हैं, जिसमें समाधान सबसे आखिरी चीज बन जाती है।
अब आम आदमी सिर्फ इतना जानना चाहता है कि रांची में जमीन का यह नया गणित आखिर सिखाया कहां जा रहा है। जहाँ 25 डिसमिल जमीन से 37 डिसमिल की रसीद निकलती है और जिम्मेदारी उसी अनुपात में घटती चली जाती है। अगर यही प्रशासनिक नवाचार है तो निश्चित ही इसे संरक्षित किया जाना चाहिए कम से कम व्यंग्य के इतिहास में एक अनोखे उदाहरण के रूप में।

