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Sunday, September 26, 2021
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    राष्ट्रीय क्षितिज पर सितारा बन उभरे हेमंत सोरेन

    कोरोना कालखंड अगर मजदूरों के लिए अभिशाप बना, तो अब वरदान भी साबित हो रहा है। कल तक जिन मजदूरों का मोल कौड़ियों बराबर नहीं था, लेकिन अब हाकिम से लेकर हुक्काम तक को बदलने पर मजबूर कर दिया है। सरकारों को नये सिरे से सोचना के लिए मजबूर कर दिया है

    नारायण विश्वकर्मा / एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क 

    अगर हम बात करें अपने झारखंड की तो, मजदूरों की विभिन्न समस्याओं को लेकर हेमंत सरकार चंद दिनों में मुल्क में अमिट छाप छोड़ने में सफल रही है। फिलवक्त तो देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उन्होंने काफी पीछे छोड़ दिया है।

    झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने छोटे से अंतराल में राजनीतिक क्षितिज पर एक सितारे की तरह चमके हैं। कल तक जिन्हें एक अपरिपक्व राजनीतिज्ञ समझा जा रहा था, वह अब भारतीय राजनीति के सुरमाओं की आंखों की किरकिरी बन गए हैं।

    रांची से लेकर दिल्ली तक के सत्ता के गलियारों में उनकी चर्चा है। विपक्ष के तो होश उड़े हुए हैं। खासकर मजदूरों के मामले में हेमंत सोरेन की आलोचना के लिए विपक्ष के पास शब्द कम पड़ रहे हैं।

    भाजपा के धूर प्रशंसक पत्रकारों की टीम को हेमंत सोरेन की कार्यशैली का विश्लेषण करने में अब सोचना पड़ रहा है। भाजपा की वर्चुअल रैली झारखंड में बेअसर है।

    कोर्ट ने सराहा, विपक्ष ने नाकाफी बतायाः  देश के अन्य राज्यों के हाईकोर्ट राज्य और केंद्र सरकारों की कार्यशैली पर फटकार लगा चुके हैं, लेकिन झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के कामकाज की तारीफ कर दी तो, विपक्ष नाकाफी बता रहा है। हालांकि उसके पास कोई ठोस तर्क नहीं है, लेकिन थेथरोलॉजी जरूर है।

    हमने विपक्ष से फेसबुक पर सवाल किया था कि विपक्ष बताये कि वो कौन सा पहला राज्य है, जहां पहली बार मजदूरों को लेकर श्रमिक स्पेशल ट्रेन चली? वह कौन सा पहला राज्य है, जहां मजदूरों को एयरलिफ्ट किया गया?

    रांची से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक दिग्गजों से मेरा सवाल है कि वो बताये, मजदूरों के लिए भाजपा का क्या योगदान है? उसके कितने सांसद-विधायक सड़कों पर उतरे?  आखिर झारखंड आनेवाले मजदूरों का वोट तो विपक्ष को भी मिला था।

    नोएडा की 12 साल की किशोरी को झारखंड के मजदूरों से क्या मतलब था? विपक्ष की हृदयहीनता देखिये, नोएडा की किशोरी को शुक्रिया अदा करने तक में कंजूसी दिखाई।

    मजदूरों से रू-ब-रू हुए हेमंतः हाल ही में झारखंड सरकार ने लद्दाख जाकर काम करनेवाले झारखंडी मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के साथ जो ऐतिहासिक फैसला किया है, वह अन्य राज्यों के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के मजदूरों के लिए यह अचूक हथियार साबित हो सकता है।

    चूंकि हेमंत सोरेन ने अपने मजदूरों से रू-ब-रू होकर उनकी आपबीती सुनी। राज्य के अधिकतर मुख्यमंत्री तो अपने मजदूरों को लाने या उनसे मिलने तक में कोताही बरती। इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम सबसे ऊपर है।

    लद्दाख में झारखंडी मजदूरों के शोषण की कहानियां सुनने के बाद हेमंत सोरेन को पता चला कि किस तरह से मजदूरों का अन्य राज्यों में शोषण होता है।

    झारखंड सरकार ने बीआरओ को यह साफ-साफ बता दिया कि अगर उन्हें लद्दाख में काम के लिए मजदूर चाहिए तो उनके बीच से ठेकेदारों को हटाना होगा और बीआरओ को झुकना पड़ा। 

    हेमंत सोरेन ने 1979 में बने अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक नियोजन कानून को प्रभावी ढंग से लागू कर देश के सामने मिसाल पेश की।

    अब मानव तस्करी के बिचौलियों पर प्रहार की जरुरतः अब हेमंत सोरेन को झारखंड में लंबे समय से जारी मानव तस्करी और मजदूरों के पलायन को लेकर बिचैलियों-दलालों के नेक्सेस पर प्रहार करना चाहिए। जो झारखंड में विषबेल बने हुए हैं।

    आदिवासी बालाओं का शारीरिक शोषण करनेवाली महानगरों में संचालित प्लेसमेंट एजेंसियों पर नकेल कसना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

    वेशक हेमंत सरकार के बेहतर कामों की प्रशंसा होनी चाहिए। लेकिन हमें सरकार को आईना भी दिखाते रहना चाहिए। गुड गवर्नेंस की ओर कदम बढ़ाने पर सरकार का इस्तकबाल करना चाहिए।

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