न्यायालीय आदेश की अवहेलना और कांके CO की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज। राजधानी रांची जिले के कांके अंचल से जुड़ा अपील वाद संख्या-396/2025-26 अब एक साधारण भूमि विवाद से कहीं आगे बढ़कर न्यायिक आदेशों की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर रहा है। न्यायालय उप समाहर्ता भूमि सुधार सदर रांची द्वारा पारित आदेश में स्पष्ट रूप से संबंधित प्रकरण की जांच कर विधिसम्मत कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

इसके बाद 30 जनवरी 2026 को पुनः अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु लिखित निर्देश जारी हुआ। इसके बावजूद यदि 13 फरवरी 2026 तक राजस्व अभिलेखों या डिजिटल पोर्टल पर कोई स्पष्ट सुधार दृष्टिगोचर नहीं होता तो यह स्थिति प्रशासनिक निष्क्रियता की ओर संकेत करती है। न्यायालय का आदेश केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं होता, वह विधिक दायित्व होता है।

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 25 डिसमिल बनाम 37 डिसमिल की कथित विसंगति है। भूमि रकबा में 12 डिसमिल की वृद्धि कोई मामूली तकनीकी त्रुटि नहीं मानी जा सकती। राजस्व प्रशासन में प्रत्येक डिसमिल का कानूनी महत्व होता है। यदि अभिलेखों और पोर्टल में ऐसा अंतर प्रदर्शित हो रहा है और उसी आधार पर रसीद निर्गमन जारी है तो यह स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और सत्यापन की मांग करता है।

ऐसी स्थिति में स्थल निरीक्षण, अभिलेखीय मिलान और डिजिटल प्रविष्टियों की जांच अपेक्षित होती है। यदि यह प्रक्रिया लंबित है, तो देरी का लाभ किसे मिल रहा है। यह प्रश्न जनमानस में उठना स्वाभाविक है। खासकर उस परिस्थिति में, जब सक्षम भूमि उपसमाहर्ता न्यायालय ने अवैध जमाबंदी निरस्त करने और रिपोर्ट के आदेश दोहरा रहा हो।

इस प्रकरण को उपायुक्त, प्रमंडलीय आयुक्त, मुख्य सचिव, विभागीय सचिव, राज्यपाल और एसीबी तक लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है। यदि इतने उच्च स्तर पर सूचना प्रेषित होने के बाद भी न्यायालयीय आदेश का अनुपालन स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होता तो यह केवल स्थानीय स्तर की देरी नहीं बल्कि प्रशासनिक प्रणाली की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता इसी बात से तय होती है कि आदेशों का पालन कितनी तत्परता और पारदर्शिता से होता है।

शिकायतकर्ता द्वारा यह भी सार्वजनिक रूप से कहा गया है कि संबंधित अंचलाधिकारी अमित भगत द्वारा आदेशों का पालन नहीं किया जा रहा है। यद्यपि इस संबंध में अंचल कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, किंतु मौन स्वयं कई प्रश्न खड़े करता है। यदि आदेश का अनुपालन हो चुका है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि अनुपालन लंबित है तो विलंब का कारण बताया जाना प्रशासनिक दायित्व है।

भूमि संबंधी मामलों में अस्पष्टता अक्सर अवैध खरीद-बिक्री और दलाल तंत्र को सक्रिय कर देती है। न्यायालय के आदेश के बाद भी यदि अभिलेखों में संशोधन नहीं दिखता, तो यह स्थिति अनजाने में ही संदिग्ध गतिविधियों को बल दे सकती है। यही कारण है कि इस प्रकरण को केवल व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

न्याय में विलंब कभी-कभी अन्याय के समतुल्य माना जाता है। यदि एक स्पष्ट न्यायालय आदेश और उसके बाद जारी अनुस्मारक के बावजूद कार्रवाई सार्वजनिक रूप से परिलक्षित नहीं होती, तो यह शासन प्रणाली की गंभीर परीक्षा है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित अधिकारी और उच्च प्रशासन इस मामले में शीघ्र, पारदर्शी और विधिसम्मत कार्रवाई कर स्थिति स्पष्ट करते हैं या यह विवाद और व्यापक रूप लेता है।

समाचार स्रोतः मुकेश भारतीय/मीडिया रिपोर्टस्/उपलब्ध दस्तावेज

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