एक ‘बेकार’ पत्रकार की जिदः ‘पागलों का कांके’ ने विछिप्त बना दिया

-: मुकेश भारतीय :-

मैं जहां रह रहा हूं वह रांची सिर्फ एक राजधानी नहीं रहा, यह एक ऐसा प्रयोगशाला बन चुका है, जहाँ सच को टेस्ट किया जाता है और हर बार फेल घोषित कर दिया जाता है। कांके 25 डिसमिल जमीन का 37 बन जाना कोई गलती नहीं, बल्कि प्रक्रिया है। और अगर कोई यह पूछ ले कि भाई, ये 12 डिसमिल अतिरिक्त कहाँ से आ गए?” तो जवाब मिलता है कि पहले नोटिस का जवाब दीजिए। मतलब साफ है कि यहाँ सवाल पूछना अपराध है और चुप रहना ही सबसे बड़ा प्रमाण है कि आप सिस्टम को समझते हैं।

इस पूरे खेल में सबसे हास्यास्पद किरदार एक पत्रकार है। हाँ, वही, जो अभी भी कागज पर लिखे आदेश को सच मान बैठा है। उसके पास DCLR का आदेश है, तारीख है, दस्तावेज हैं, यहाँ तक कि सब रिकॉर्ड भी है। लेकिन सिस्टम के पास एक चीज है जो उससे बड़ी है प्रक्रिया। और इस प्रक्रिया का कमाल देखिए कि निरस्त जमाबंदी भी जिंदा है, रसीद भी कट रही है, और अधिकारी पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं कि सब ठीक है। अब इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा कि यहाँ मृत चीजें भी जीवित हैं और जीवित सवालों को मृत मान लिया गया है।

जांच एजेंसी आती है तो उम्मीद होती है कि अब सच सामने आएगा। लेकिन यहाँ भी कहानी में ट्विस्ट है। जांच के नाम पर संतुलन ऐसा बनाया जाता है कि हर कोई सही दिखे। अंचल अधिकारी भी, प्रक्रिया भी और शायद गड़बड़ी भी। बस जो गलत है, वह है आपका सवाल, आपका आग्रह और आपका अहम। आपको समझाया जाता है कि आप पत्रकार हैं, इसलिए आपका अहम बोलता है। यानी अब सच बोलना भी एक मानसिक समस्या की श्रेणी में आ चुका है।

घर में स्थिति और दिलचस्प है। परिवार को लगता है कि यह आदमी किसी बेकार जंग में पड़ा है। रिश्तेदार सलाह देते हैं कि व्यवस्था से मत उलझो। जीवन साथी सोचता है कि कब खत्म होगी यह कहानी? और बच्चे तो सीधे निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि पापा दुनिया का सबसे बेकार काम कर रहे हैं। और सच कहें तो वे गलत भी नहीं हैं। क्योंकि इस देश में समझदार वही है जो 25 को 37 मानकर आगे बढ़ जाए और बेवकूफ वह है, जो 25 को 25 साबित करने पर अड़ा रहे।

अब हालत यह है कि यह पत्रकार खुद को उस कुत्ते जैसा महसूस करता है, जो हड्डी चबा रहा है और अपने ही खून को उसका स्वाद समझ रहा है। दर्द उसका अपना है, जिद उसकी अपनी है और जो संतोष है वह भी शायद एक भ्रम है। बाहर से लोग इसे पागलपन कहते हैं, अंदर से यह मजबूरी लगती है। और कांके, जो कभी पागलखाने के लिए जाना जाता था, आज इस कहानी में एक प्रतीक बन गया है कि जहाँ तर्क पागल है और विसंगति सामान्य।

सबसे बड़ा खेल यह है कि यहाँ कोई गलत नहीं है, फिर भी सब कुछ गलत है। आदेश है, लेकिन लागू नहीं होता। रसीद है, लेकिन वैध नहीं है। जांच है, लेकिन निष्कर्ष नहीं है। और इस पूरे संतुलन में एक आदमी खड़ा है- अकेला, जिद्दी और शायद सिस्टम की नजर में समस्या। क्योंकि सिस्टम को ऐसे लोग पसंद नहीं, जो सवाल पूछते हैं, उसे ऐसे लोग पसंद हैं जो फाइलों के साथ बहते रहते हैं।

लेकिन इस कहानी का असली मोड़ यही है- यह आदमी अब भी खड़ा है। वह कह रहा है कि तोड़ेंगे नहीं, तो छोड़ेंगे नहीं। चाहे यह रास्ता अंचल कार्यालय से निकलकर देश के प्रथम नागरिक तक क्यों न जाए।

क्योंकि अब यह जमीन की लड़ाई नहीं रही। यह उस आखिरी जिद की लड़ाई है, जो कहती है कि अगर 25 को 37 बना दिया गया, तो कम से कम कोई तो होगा जो कहे कि यह गलत है।

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