सरकारझारखंडदेशफीचर्ड

झारखंड सूचना आयुक्त नियुक्ति पर टकराव जारी, गवर्नर ने दूसरी बार लौटाई फाइल, जानें बड़ी वजह

“सूचना आयुक्त नियुक्ति नियमों के अनुसार तीसरी बार भेजी गई फाइल को राज्यपाल मंजूरी दे सकते हैं, लेकिन यदि आपत्तियां गंभीर बनी रहती हैं तो न्यायिक हस्तक्षेप तय माना जा रहा है…

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर चल रहा विवाद अब गंभीर संवैधानिक और नैतिक बहस का रूप ले चुका है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार द्वारा दूसरी बार फाइल लौटाए जाने से सरकार और राजभवन के बीच टकराव और स्पष्ट हो गया है।

राज्यपाल ने साफ तौर पर यह सवाल उठाया है कि जिन व्यक्तियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हों, वे सूचना आयुक्त जैसे संवेदनशील और जवाबदेह पद पर कैसे नियुक्त किए जा सकते हैं। यह आपत्ति केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सूचना आयोग की साख और पारदर्शिता से सीधे जुड़ी हुई है।

राज्य सरकार का पक्ष है कि जिन नामों की अनुशंसा की गई है, वे अब किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। लेकिन राज्यपाल इस तर्क से सहमत नहीं दिख रहे हैं।

उनका मानना है कि केवल राजनीतिक दल से इस्तीफा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उम्मीदवार की समग्र पृष्ठभूमि और सार्वजनिक छवि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इस पूरे मामले में अमूल्य नीरज खलखो और तनुज खत्री के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर विशेष आपत्ति जताई गई है, जिसने विवाद को और गहरा कर दिया है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने इन नामों को मंजूरी दी थी, जिसमें नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और मंत्री हफीजुल हसन भी शामिल थे। इसके बावजूद राजभवन द्वारा लगातार आपत्ति जताना इस बात का संकेत है कि नियुक्ति प्रक्रिया में सहमति का अभाव है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक असमंजस पैदा कर रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर मतभेद हैं।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सूचना आयोग जैसी संस्था, जो आम नागरिकों को सूचना का अधिकार दिलाने के लिए बनाई गई है, उसी की नियुक्ति प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति योग्यता, निष्पक्षता और स्वच्छ छवि के आधार पर होनी चाहिए। ऐसे में यदि विवादित पृष्ठभूमि वाले नामों पर जोर दिया जाता है तो यह न केवल कानून की भावना के खिलाफ होगा, बल्कि संस्था की विश्वसनीयता पर भी असर डालेगा।

वर्तमान स्थिति में यह मामला तीन संभावित दिशाओं में आगे बढ़ सकता है। या तो सरकार नए नामों पर विचार करे, या फिर पुराने नामों को मजबूत कानूनी तर्क के साथ तीसरी बार भेजे, या फिर मामला न्यायालय तक पहुंच जाए। नियमों के अनुसार तीसरी बार भेजी गई फाइल को राज्यपाल मंजूरी दे सकते हैं, लेकिन यदि आपत्तियां गंभीर बनी रहती हैं तो न्यायिक हस्तक्षेप तय माना जा रहा है।

कुल मिलाकर झारखंड में सूचना आयुक्त की नियुक्ति का यह विवाद अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार और राजभवन के बीच यह गतिरोध समाधान की ओर बढ़ता है या फिर एक बड़े कानूनी संघर्ष का रूप लेता है।

Expert Media News

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लेखन-संपादन करते आ रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button