“झारखंड (Jharkhand) की कहानी केवल घोटालों की सूची नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी की है। पारदर्शी ऑडिट, समयबद्ध सजा, स्वतंत्र जांच एजेंसियां और डिजिटल निगरानी जरूरी हैं। जब तक राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ पर सख्ती नहीं होगी, तब तक घोटाले बदलेंगे, सिस्टम नहीं…
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज/मुकेश भारतीय)। प्रकृति ने इस झारखंड (Jharkhand) को कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम और घने जंगलों से नवाजा, लेकिन शासन की विफलता ने इसे घोटालों का दस्तावेज बना दिया। 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य बनने के 26 वर्ष बाद भी यहां की आबादी का बड़ा हिस्सा सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और रोजगार की बुनियादी जरूरतों से जूझ रहा है। जहां खनिज राजस्व से अरबों रुपये आते हैं, वहां घोटालों की सूची लंबी होती जा रही है।
ताजा उदाहरण अप्रैल 2026 का कोषागार घोटाला है, जिसमें हजारीबाग, बोकारो और रांची में फर्जी वेतन बिलों से 33 करोड़ रुपये से ज्यादा की अवैध निकासी सामने आई। विपक्षी भाजपा ने सीबीआई जांच की मांग की, जबकि सत्ता पक्ष इसे पुरानी विरासत बता रहा है। यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक नीयत दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
संसाधन प्रचुर, लेकिन प्रबंधन कमजोरः राज्य गठन के समय झारखंड को “खनिजों की राजधानी” कहा गया था। यहां देश का 40 प्रतिशत खनिज उत्पादन होता है, लेकिन विकास के आंकड़े कड़वे सच बयां करते हैं। 2025-26 आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की जीएसडीपी वृद्धि 6.17 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि राष्ट्रीय औसत इससे ऊंचा है।
प्रति व्यक्ति आय 2024-25 में पहली बार एक लाख रुपये पार कर 1,16,663 रुपये पहुंची, लेकिन यह राष्ट्रीय औसत का मात्र 60 प्रतिशत है। बहुआयामी गरीबी 2015-16 में 42.10 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 28.81 प्रतिशत हुई, फिर भी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में यह 39.9 प्रतिशत तक है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में सुधार हुए हैं। सड़कें बनीं, बिजली पहुंची, स्कूल-कॉलेज बढ़े, लेकिन रोजगार की कमी, पलायन और भ्रष्टाचार ने इन उपलब्धियों को धुंधला कर दिया। खनन प्रभावित जिलों में डीएमएफ फंड के बावजूद सड़कें खस्ताहाल, पानी की समस्या और बेरोजगारी बरकरार है। 26 वर्षों में बजट 20 गुना बढ़ा (2001-02 में 6,067 करोड़ से 2024-25 में 1,16,892 करोड़), लेकिन जमीन पर असर सीमित।
सेवा क्षेत्र अब जीएसवीए का 45.56 प्रतिशत योगदान दे रहा है, जबकि कृषि मात्र 6 प्रतिशत। यह असंतुलन विकास की असमानता को दर्शाता है। जहां शहरों (रांची, धनबाद, जमशेदपुर) में निर्माण बूम है, वहीं चतरा, पाकुड़, पश्चिम सिंहभूम जैसे जिले बहुआयामी गरीबी में डूबे हैं।
घोटालों का सिलसिला, गरीबों के हक की सुनियोजित लूटः 2022 में उजागर यह घोटाला आज भी ईडी की जांच में है। तत्कालीन खूंटी डीसी और खनन सचिव आइएएस पूजा सिंघल मुख्य आरोपी रहीं। ईडी ने मई 2022 में 36 करोड़ से अधिक नकदी बरामद की। मार्च 2026 में ईडी ने पांचवां चार्जशीट दाखिल किया, जिसमें सिंघल की मां कमलेश सिंघल, भाई सिद्धार्थ सिंघल और सास अमिता झा समेत पांच नए नाम शामिल। आरोप: मनरेगा फंड की अनियमितता के साथ अवैध खनन से मनी लॉन्ड्रिंग। ईडी ने 82 करोड़ की संपत्ति कुर्क की।
पूजा सिंघल को दिसंबर 2024 में बेल मिली और जनवरी 2025 में सस्पेंशन रद्द कर उन्हें कर्मचारी विभाग में बहाल कर दिया गया। यह मामला साबित करता है कि विकास योजनाओं का फंड कैसे सुनियोजित लूट का माध्यम बन जाता है। गरीबों के रोजगार से जुड़े मनरेगा फंड का दुरुपयोग न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, बल्कि सामाजिक विश्वास को भी तोड़ता है। खूंटी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में यह घोटाला स्थानीय लोगों की उम्मीदों को चूर-चूर कर गया।
रांची सेना भूमि घोटाला, रक्षा जमीन पर भी फर्जीवाड़ाः 2023 में सामने आए इस मामले में पूर्व रांची डीसी आइएएस छवि रंजन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेजों से बारीयातू में सेना की लगभग 4.5 एकड़ भूमि निजी हाथों में ट्रांसफर करने में मदद की। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया। अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 30 महीने जेल के बाद शर्तों के साथ बेल दी। नवंबर 2025 में सरकार ने सस्पेंशन रद्द कर दिया।
यह घोटाला केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेट-जमीन माफिया के गठजोड़ का उदाहरण है। रक्षा भूमि जैसी संवेदनशील संपत्ति पर फर्जीवाड़ा पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़ा करता है। ईडी की जांच में 21 जगहों पर छापे मारे गए, जिसमें झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल थे। इससे पता चलता है कि घोटाले अब सीमाओं पार कर चुके हैं।
शराब के जरिए राजस्व बढ़ाने का दावा और सातवां आइएएस गया जेलः 2023-2025 के बीच उजागर यह घोटाला झारखंड के प्रशासनिक इतिहास का काला अध्याय बन गया। मई 2025 में एसीबी ने तत्कालीन उत्पाद सचिव आइएएस विनय कुमार चौबे को गिरफ्तार किया। जून 2025 में पूर्व उत्पाद आयुक्त आइएएस अमित प्रकाश भी जेल गए। आरोप: फर्जी बैंक गारंटी और अनुचित लाभ देकर राज्य को 38 करोड़ का घाटा। ईडी ने भी PMLA के तहत केस दर्ज किया।
इस घोटाले में अब तक सात सर्विंग आइएएस अधिकारी जेल जा चुके हैं। एसीबी ने कमर्शियल टैक्स कमिश्नर आइएएस अमित कुमार, पूर्व सचिव आइएएस मनोज कुमार और मुकेश कुमार से पूछताछ की। फर्जी गारंटी, पेमेंट एजेंसी चयन में अनियमितता और नीति निर्माण में पारदर्शिता की कमी ने इसे भ्रष्टाचार का नेटवर्क बना दिया। राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से बनी नीति खुद राज्य को नुकसान पहुंचा रही है।
कोषागार घोटाला वर्ष 2026 का ताजा झटकाः अप्रैल 2026 में हजारीबाग, बोकारो और रांची ट्रेजरी में फर्जी वेतन बिलों से 33 करोड़ रुपये निकाले गए। हजारीबाग में 15.41 करोड़, बोकारो में 6 करोड़ और रांची में 3 करोड़। तीन कांस्टेबल और ट्रेजरी कर्मचारी गिरफ्तार। ‘कुबेर पोर्टल’ जैसी डिजिटल व्यवस्था के बावजूद फर्जीवाड़ा हुआ। भाजपा ने सीबीआई या न्यायिक जांच की मांग की, जबकि वित्त विभाग ने सभी 33 ट्रेजरी का ऑडिट शुरू किया।
यह घोटाला साबित करता है कि सरकारी खजाना भी अब सुरक्षित नहीं। पुलिस वेतन जैसे संवेदनशील मद में अनियमितता से न केवल वित्तीय नुकसान, बल्कि सुरक्षा तंत्र पर भी सवाल उठते हैं। यदि सीनियर अधिकारियों की भूमिका साबित हुई तो यह चारा घोटाले का नया संस्करण बन सकता है।
खनन और डीएमएफ फंड संसाधन शोषण का सबसे बड़ा उदाहरणः डीएमएफ फंड खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाया गया था, लेकिन 2025 में भाजपा ने 1,500-2,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया। बोकारो में 631 करोड़ आवंटित, लेकिन 500 करोड़ अनअकाउंटेड। फुलाए गए टेंडर, महंगे जनरेटर, डिजिटल मैट और स्कूल उपकरणों में अनियमितता। झारखंड हाईकोर्ट ने मामले पर राज्य सरकार से जवाब मांगा।
खनन पट्टों में अनियमितता और डीएमएफ के दुरुपयोग ने “संसाधन अभिशाप” को हकीकत बना दिया। जिन क्षेत्रों के लिए फंड था, वे आज भी पिछड़े हैं। आदिवासी समुदायों का कथित शोषण राजनीतिक और प्रशासनिक मिलीभगत का परिणाम है।
आखिर ब्यूरोक्रेट्स क्यों फंस रहे हैं? 2000 से अब तक सात सर्विंग आइएएस अधिकारी भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जा चुके हैं। पूजा सिंघल, छवि रंजन, विनय चौबे, अमित प्रकाश जैसे सभी प्रमुख नाम। कारण अत्यधिक शक्ति का केंद्रीकरण, राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़, निगरानी की कमी, समय पर ऑडिट का अभाव और धीमी न्याय प्रक्रिया स्पष्ट हैं।
बेल मिलने के बाद सस्पेंशन रद्द और बहाली आसान हो जाना दंड के भय को कम करता है। यह पैटर्न अन्य राज्यों से अलग है। झारखंड में ब्यूरोक्रेट्स की मिलीभगत घोटालों को संस्थागत बना रही है।
26 वर्षों का निष्कर्ष और आम झारखंडी पर असरः 26 वर्षों में संसाधन प्रचुर रहे, लेकिन प्रबंधन कमजोर। नीतियां बनीं, लेकिन नीयत पर सवाल। योजनाएं आईं, लेकिन जमीन पर असर सीमित। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पलायन बढ़ा, युवा बेरोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा की कमी बरकरार। घोटालों ने सार्वजनिक धन को निजी जेब में पहुंचाया, जिससे विकास योजनाएं प्रभावित हुईं।
जनता में आक्रोश बढ़ रहा है। विपक्ष सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, जबकि सरकार बचाव में जुटी है। यह सिस्टम की विफलता है जहां निर्णय ऊपर होते हैं, क्रियान्वयन नीचे और लाभ बीच में खो जाता है।
जवाबदेही तय करो, वरना घोटाले बदलते रहेंगे: झारखंड की कहानी केवल घोटालों की सूची नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी की है। पारदर्शी ऑडिट, समयबद्ध सजा, स्वतंत्र जांच एजेंसियां और डिजिटल निगरानी जरूरी हैं। जब तक राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ पर सख्ती नहीं होगी, तब तक घोटाले बदलेंगे, सिस्टम नहीं। विकास की उम्मीदें तभी पूरी होंगी, जब संसाधनों का राज्य वाकई विकास का राज्य बने।

