
एक्सपर्ट मीडिया न्यूज/मुकेश भारतीय। झारखंड को बने करीब ढाई दशक हो चुके हैं। इन वर्षों में राज्य ने कई सरकारें देखीं, कई घोटालों की जांच देखी और जांच एजेंसियों की कई कार्रवाई भी देखी। लेकिन प्रशासनिक इतिहास का एक ऐसा आंकड़ा भी है, जो किसी उपलब्धि सूची से कम चर्चा में रहते हुए भी खासा चौंकाता है। राज्य गठन के बाद अब तक सात IAS अधिकारी विभिन्न मामलों में गिरफ्तार होकर जेल जा चुके हैं।
यानी झारखंड की नौकरशाही की कुछ फाइलों ने सचिवालय की अलमारियों से निकलकर सीधे जेल की बैरक तक का सफर तय किया। फर्क बस इतना रहा कि किसी मामले में घोटाला चारा का था, किसी में दवा का, किसी में मनरेगा और खनन का, तो किसी में जमीन और शराब घोटाले का।
सजल चक्रवर्ती (1980 बैच) झारखंड के उन वरिष्ठ IAS अधिकारियों में रहे, जिनका नाम चारा घोटाला मामले से जुड़ा। मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्हें जेल जाना पड़ा। हिरासत के दौरान ही उनका निधन हो गया।
डॉ. प्रदीप कुमार (1991 बैच) का नाम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) से जुड़े कथित घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
सियाराम प्रसाद सिन्हा दवा घोटाला मामले में वर्ष 2011 में गिरफ्तार हुए और उन्हें जेल भेजा गया। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं से जुड़ी कथित अनियमितताओं ने उस दौर में खूब सुर्खियां बटोरीं।
इसके बाद आया पूजा सिंघल (2000 बैच) का मामला, जिसने झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। मनरेगा और अवैध खनन से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED ने उन्हें वर्ष 2022 में गिरफ्तार किया। करीब 28 महीने जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिली।
छवि रंजन (2011 बैच) का नाम सेना की जमीन समेत अन्य भूमि घोटाले से जुड़े मामले में सामने आया। वर्ष 2023 में उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा।
इसके बाद विनय कुमार चौबे (1999 बैच) शराब (एक्साइज) घोटाले से जुड़े मामले में जांच के घेरे में आए। एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा।
और अब इस सूची में एल. खियांग्ते (1988 बैच) का नाम भी शामिल है। 14वीं JPSC परीक्षा में कथित गड़बड़ी के आरोप में CID की कार्रवाई के बाद उन्हें जेल भेजा गया।
जाहिर है कि सवाल सिर्फ सात का नहीं, सिस्टम का है। इन मामलों को केवल सात अधिकारियों की व्यक्तिगत कानूनी मुश्किलों के तौर पर देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
बड़ा सवाल यह है कि जिन अधिकारियों के हाथ में शासन-प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं, उनके कार्यकाल में ऐसी कथित अनियमितताएं आखिर कैसे जन्म लेती हैं?
सच पुछिए तो झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था ने एक अजीब करियर पाथ भी देख लिया है। पोस्टिंग से प्रमोशन, प्रमोशन से जांच और जांच से जेल तक। हालांकि यह बात पूरी नौकरशाही पर लागू नहीं होती और किसी भी अधिकारी के मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले से ही तय होता है।
चारा घोटाला हो या दवा घोटाला, मनरेगा, भुमि से जुड़ा मामला हो या शराब घोटाला। मामले अलग-अलग हैं, विभाग अलग-अलग हैं और समय भी अलग-अलग है। लेकिन एक सवाल बार-बार सामने आता है कि क्या सरकारी तंत्र में निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था इतनी कमजोर है कि अनियमितताओं का पता अक्सर कार्रवाई और गिरफ्तारी के बाद ही चलता है?
झारखंड की जनता के लिए यह आंकड़ा महज सात नामों की सूची नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है, जहां सरकारी फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाले शीर्ष अधिकारियों को कभी-कभी उन्हीं फाइलों के कथित खेल की कीमत अदालत और जेल में चुकानी पड़ती है।
फाइलों में नियम-कायदे भले मोटे अक्षरों में लिखे हों, लेकिन इतिहास का व्यंग्य यही है कि कभी-कभी सबसे बड़ी कहानी फाइल के आखिरी पन्ने पर नहीं, जेल की हाजिरी रजिस्टर में लिखी मिलती है।
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