योगेंद्र साव ने हद कर दी! माइंस क्षेत्र में स्कूली बच्चों को उतारा, ‘सेंदरा’ बयान से मचा बवाल
पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के नेतृत्व में खनन क्षेत्र में स्कूली बच्चों के साथ प्रदर्शन, सुरक्षा को लेकर सवालों का भारी दबाव

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड की बहुचर्चित चट्टी बरियातू कोल माइनिंग परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है। आरोप है कि पूर्व विधायक और पूर्व कृषि मंत्री योगेंद्र साव ने 10 फरवरी को 100 से अधिक स्कूली बच्चों को सक्रिय खनन क्षेत्र में ले जाकर प्रदर्शन और नारेबाजी करवाई। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें बच्चों को प्रतिबंधित खनन जोन के भीतर देखा जा सकता है।
लगातार दो दिनों में दो घटनाः सूत्रों के मुताबिक 9 फरवरी को भी 60–70 स्कूली बच्चों को उसी खदान क्षेत्र में ले जाकर नारे लगवाए गए थे। इसके अगले ही दिन 10 फरवरी को बड़ी संख्या में बच्चों के साथ दोबारा प्रदर्शन किया गया। बताया जा रहा है कि यह पूरा घटनाक्रम चट्टी बरियातू कोल माइनिंग परियोजना के सक्रिय खनन क्षेत्र में हुआ, जो सुरक्षा मानकों के तहत प्रतिबंधित इलाका माना जाता है।
कोयला खदानों में भारी मशीनरी, ब्लास्टिंग, डंपर मूवमेंट और धूल-धुएं के बीच बच्चों की मौजूदगी को गंभीर लापरवाही बताया जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे क्षेत्रों में बिना अनुमति प्रवेश न केवल गैरकानूनी है, बल्कि जानलेवा भी हो सकता है।
‘तीर चलेगा, सेंदरा निश्चित है’ बयान से बढ़ा विवादः इसी बीच केरेडारी प्रखंड के बसरिया में आयोजित धरना को संबोधित करते हुए योगेंद्र साव ने कंपनी प्रबंधन को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि “कंपनी के लोग चट्टी बरियातू और बसरिया कार्यालय आते हैं, तो संभलकर आएं, नहीं तो तीर चलेगा, सेंदरा निश्चित है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी लगातार ‘लेटर’ भेजकर रैयतों को डराने का काम कर रही है और फर्जी केस दर्ज कर उत्पीड़न कर रही है। साव ने कहा कि वे प्रशासन से डरने वाले नहीं हैं और कंपनी प्रशासन के साथ मिलकर गुंडागर्दी कर रही है।
बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवालः सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि स्कूली बच्चों को किस अनुमति से सक्रिय खनन क्षेत्र में ले जाया गया? क्या विद्यालय प्रबंधन या अभिभावकों की सहमति ली गई थी? क्या जिला प्रशासन को इसकी जानकारी थी?
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बच्चों को राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा बनाना और वह भी जोखिमपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र में ले जाना, नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से चिंताजनक है।
प्रशासन की भूमिका पर भी निगाहः मामला तूल पकड़ता जा रहा है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं कि प्रतिबंधित क्षेत्र में इतने बड़े समूह का प्रवेश कैसे संभव हुआ। यदि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
फिलहाल कंपनी प्रबंधन की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन वायरल तस्वीरों ने पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है।
झारखंड की राजनीति में यह घटनाक्रम नया विवाद खड़ा कर सकता है। जहां एक ओर रैयतों के अधिकारों की लड़ाई का दावा है, वहीं दूसरी ओर बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं भी उठ रही हैं।
समाचार स्रोत: मुकेश भारतीय / मीडिया रिपोर्ट्स





