बीआईटी मेसरा छात्र मौत मामला: सुप्रीम कोर्ट में 20 लाख मुआवजा देने का आदेश बरकरार

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मेसरा (बीआईटी मेसरा) में छात्र राजा पासवान की मौत से जुड़े मामले में गुरुवार को भारत का सर्वोच्च न्यायालय में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने मृतक छात्र के परिजनों को मुआवजा देने संबंधी झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन के लिए संस्थान को दो सप्ताह का समय प्रदान किया है।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने मामले की सुनवाई करते हुए यह राहत दी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआः सुनवाई के दौरान बीआईटी मेसरा की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि संस्थान झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए कुछ समय की आवश्यकता है।

अधिवक्ता ने कहा कि यदि अदालत थोड़ी मोहलत दे, तो संस्थान मृतक छात्र के माता-पिता को 20 लाख रुपये का मुआवजा अदा कर देगा।

इस पर सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने संस्थान के आग्रह को स्वीकार करते हुए दो सप्ताह का समय दे दिया। अदालत ने साथ ही यह निर्देश दिया कि मामले को अगली सुनवाई के लिए 23 मार्च को सूचीबद्ध किया जाए।

हाईकोर्ट ने दिया था मुआवजा और सुरक्षा व्यवस्था का निर्देशः इससे पहले झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की अदालत ने 12 अगस्त 2025 को सुनवाई करते हुए बीआईटी मेसरा को मृतक छात्र के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था।

अदालत ने केवल मुआवजे तक ही अपने आदेश को सीमित नहीं रखा, बल्कि राज्य में छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने झारखंड पुलिस के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए सुरक्षा और अनुशासन सुनिश्चित करने हेतु एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जाए।

हाईकोर्ट ने कहा था कि शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व केवल शिक्षा देना ही नहीं, बल्कि छात्रों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करना भी है।

फ्रेशर पार्टी में विवाद के बाद हुई थी हिंसाः मामले की जड़ 14 नवंबर 2024 की एक घटना से जुड़ी है। उस दिन बीआईटी मेसरा परिसर स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज में फ्रेशर पार्टी आयोजित की गई थी। इसी दौरान कुछ छात्रों के बीच विवाद हो गया। आरोप है कि विवाद के दौरान कुछ छात्रों ने राजा पासवान के साथ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया और उसके साथ मारपीट की।

मृतक छात्र के पिता चंदन पासवान ने पुलिस को दी शिकायत में कहा था कि उनके पुत्र के शरीर पर लाठी, डंडे और बेल्ट से मारपीट के गंभीर निशान थे। घटना के बाद घायल छात्र को इलाज के लिए रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में भर्ती कराया गया, जहां अगले दिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे राज्य में आक्रोश पैदा कर दिया था और कैंपस में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।

सामाजिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण मामलाः कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि कैंपस हिंसा, रैगिंग और सामाजिक भेदभाव से जुड़े व्यापक मुद्दों को सामने लाता है।

यदि सर्वोच्च न्यायालय अंततः हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखता है, तो यह निर्णय देशभर के विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। इससे संस्थानों की जवाबदेही और छात्रों की सुरक्षा के लिए कड़े मानक तय होने की संभावना है।

अब सबकी नजर अगली सुनवाई परः फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने बीआईटी मेसरा को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 23 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत इस मामले पर क्या अंतिम रुख अपनाती है।

राजा पासवान की मौत से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा, समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। स्रोतः एक्सपर्ट मीडिया रिपोर्टस्

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