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सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेशः बार एसोसिएशनों में महिलाओं को 30% आरक्षण अनिवार्य

देशभर की बार संस्थाओं पर अदालत की नजर पालन नहीं हुआ तो चुनाव रद्द, नए सिरे से गठन; न्यायिक व्यवस्था में लैंगिक संतुलन की दिशा में बड़ा कदम

Supreme Court India order Women reservation bar associations
30% Women Quota Mandatory in Bar Associations, Non-Compliance May Lead to Suspension: Supreme Court

“सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि अब न्यायिक संस्थाओं में लैंगिक समानता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि बाध्यकारी व्यवस्था बनने जा रही है। यदि यह आदेश प्रभावी ढंग से लागू होता है तो आने वाले समय में बार एसोसिएशनों का चेहरा और चरित्र दोनों बदल सकते हैं…

नई दिल्ली (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। देश की न्यायिक प्रणाली में लैंगिक संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि देशभर के बार एसोसिएशनों में महिलाओं को न्यूनतम 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इस निर्देश का पालन नहीं करने वाले बार एसोसिएशनों को न केवल निलंबित किया जा सकता है, बल्कि वहां नए सिरे से चुनाव भी कराए जाएंगे।

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने विशेष अनुमति याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की। इन याचिकाओं में देशभर के बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत पद आरक्षित करने की मांग उठाई गई है।

आदेश नहीं माना तो कार्रवाई तयः खंडपीठ ने 13 मार्च 2026 को दिए गए अपने पूर्व आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कई बार एसोसिएशनों ने अब तक इस निर्देश का पालन नहीं किया है। इसे न्यायिक आदेश की अवहेलना मानते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अदालत ने सभी हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश को अपने-अपने क्षेत्राधिकार के सभी बार एसोसिएशनों तक तत्काल पहुंचाएं और यह रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि किन-किन संस्थाओं ने इसका अनुपालन नहीं किया है। इससे स्पष्ट है कि अब यह महज सलाह नहीं, बल्कि एक सख्त निगरानी वाली प्रक्रिया बन चुकी है।

चुनाव से न हो तो नामांकन से पूरी होगी हिस्सेदारीः सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था भी तय की है। यदि चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं हो पाता तो शेष पदों को नामांकन के जरिए भरा जाएगा।

यह नामांकन संबंधित हाईकोर्ट के पोर्टफोलियो जज द्वारा किया जाएगा, जिसमें जिला एवं सत्र न्यायाधीश, निर्वाचित पदाधिकारी और बार एसोसिएशन की वरिष्ठ महिला वकीलों से परामर्श लिया जाएगा। खास बात यह है कि नामांकित महिला सदस्यों का कार्यकाल भी निर्वाचित सदस्यों के समान ही होगा, जिससे उन्हें वास्तविक अधिकार और प्रभाव मिल सके।

न्यायिक ढांचे में बदलाव की निर्णायक पहलः यह आदेश केवल एक प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में गहरे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। बार एसोसिएशन लंबे समय से पुरुष-प्रधान संस्थाएं रही हैं, जहां निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है।

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में विविध दृष्टिकोणों को भी शामिल करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे महिला वकीलों के लिए नेतृत्व के अवसर बढ़ेंगे और न्यायपालिका के प्रति आम महिलाओं का विश्वास भी मजबूत होगा।

चुनौतियां भी कम नहीं: हालांकि, इस फैसले के क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। छोटे शहरों और जिलों में महिला वकीलों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जिससे 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है। इसके अलावा पारंपरिक मानसिकता और संस्थागत प्रतिरोध भी इस बदलाव की राह में बाधा बन सकते हैं।

12 मई को होगी अगली सुनवाईः खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 मई की तिथि निर्धारित की है। इस दौरान अदालत यह समीक्षा करेगी कि उसके आदेश का कितना अनुपालन हुआ है और किन संस्थाओं पर कार्रवाई की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि अब न्यायिक संस्थाओं में लैंगिक समानता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि बाध्यकारी व्यवस्था बनने जा रही है। यदि यह आदेश प्रभावी ढंग से लागू होता है तो आने वाले समय में बार एसोसिएशनों का चेहरा और चरित्र दोनों बदल सकते हैं।

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