Home दो टूक संदर्भ भूमि फर्जीवाड़ाः ‘जब तलक तोड़ो नहीं, तब तलक छोड़ो नहीं’

संदर्भ भूमि फर्जीवाड़ाः ‘जब तलक तोड़ो नहीं, तब तलक छोड़ो नहीं’

A major land record manipulation case in Ranchi’s Kanke area
A major land record manipulation case in Ranchi’s Kanke area shows how 25 decimals turned into 37. Despite DCLR orders, illegal entries persist, triggering ACB probe.

✍️ मुकेश भारतीय

खंड-खंड तंत्र का पर्याय दिख रहा झारखंड की राजधानी रांची की शासन व्यवस्था में ‘बाबू लोगन’ भूमि फर्जीवाड़ा में गोता लगाके गजबे का मजमा लगाया हुआ है। हिंया बागड़ खेत खाय रहा है या खेत खुद बागड़ को चबाय रहा है, सच को सभे दिख रहा है, लेकिन झूठ की धुंध हटे तब न? कांके अंचल कार्यालय से जुड़े एक अजीबोगरीब प्रकरण को अब साधारण प्रशासनिक गड़बड़ी कह देना खुद सच के साथ अन्याय होगा।

यहाँ कहानी सीधी है, पर सिस्टम ने इसे टेढ़ा बना दिया है। एक तरफ कागज़ पर स्पष्ट आदेश जमाबंदी निरस्त करो। दूसरी तरफ उसी निरस्त प्रविष्टि पर रसीद जारी करो। और बीच में खड़ा है वह विचित्र गणित, जहाँ 25 कब 37 बन गया, किसी को ठीक से याद नहीं, लेकिन सब अपच भ्रम पाल बैठे हैं कि रिकॉर्ड में है तो सही ही होगा!

यही वह बिंदु है, जहाँ मामला फाइलों से निकलकर जिद में बदल जाता है। कहते हैं कि  हर व्यवस्था में कुछ लोग मठ्ठा डालते  हैं  यानी गड़बड़ी को ठीक करते हैं, व्यवस्था को संतुलित करते हैं। लेकिन यहाँ तस्वीर उलटी है।

यहाँ मठ्ठा डालने की जगह मामले को और गाढ़ा किया जा रहा है। गलत प्रविष्टि हटाने की बजाय नोटिसों का जाल, जवाबों का चक्र और प्रक्रियाओं की ऐसी धुंध तैयार की गई है कि मूल सवाल ही पीछे छूट जाए आखिर निरस्त जमाबंदी पर रसीद कैसे कट गई?

अब इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प पात्र है सच। सच बार-बार दस्तावेज लेकर आता है, आदेश दिखाता है, विसंगति बताता है। लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिलता है-पहले नोटिस का जवाब दीजिए। जबकि वह खुद जानता कि गुल्ली-डंडा खेल का बचपना किया किसने हैं।

यहीं से सच ने अपना रूप बदल लिया है। अब वह सिर्फ तथ्य नहीं रहा। वह जिद बन गया है। और यह कोई साधारण जिद नहीं है। यह वही जिद है, जो एक समय एक आदमी को पहाड़ काटने पर मजबूर कर देती है। दशरथ मांझी की जिद। यह जिद कहती है- जब तक यह ‘पहाड़’ नहीं टूटेगा, तब तक हम छोड़ेगा नहीं।

अब रास्ता साफ है। पहले आवेदन, फिर शिकायत, फिर साक्ष्य, फिर जांच और अगर फिर भी रास्ता नहीं बना तो अगला पड़ाव तय है। हाई कोर्ट… सुप्रीम कोर्ट… और जरूरत पड़ी तो देश के प्रथम नागरिक तक। क्योंकि अब यह मामला केवल एक प्लॉट या जमाबंदी का नहीं रहा। सवाल यह है कि क्या इस व्यवस्था में जमीर की कोई कीमत है या नहीं?

और व्यंग्य की पराकाष्ठा देखिए। कांके, जो पागलखाना के लिए मशहूर रहा है, वह नए-नए अनेक उलझनों का केंद्र बन गया है। यहाँ सामान्य तर्क भी असामान्य लगने लगता है। यहाँ 25 का 37 हो जाना चमत्कार नहीं, बल्कि रिकॉर्ड अपडेट कहलाता है और निरस्त प्रविष्टि पर रसीद कटना प्रक्रिया का हिस्सा। गजबे धंधा बना लिया है काली चमड़ी वालों ने।

पुरानी कहावत है कि हमाम में हर कोई नंगा होता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है,  जब यह हमाम बाहर आकर व्यवस्था बन जाए। और जब व्यवस्था ही धुंधली हो जाए तो कोई न कोई तो होगा, जो साफ आईना लेकर खड़ा होगा।

यहाँ वही आईना सच है और अब वह ठान चुका है कि तोड़ेंगे नहीं तो छोड़ेंगे नहीं। अंजाम कुछ भी हो। रास्ता कितना भी लंबा हो, दीवार कितनी भी ऊँची क्यों न हो। यह लड़ाई अब जमीन की नहीं, जमीर की है।

और इतिहास गवाह है कि जब जिद दशरथ मांझी वाली हो, तो आखिर पहाड़ कितना भी ऊंचा हो, उसे झुकना ही पड़ता है। उसे टूटना ही पड़ता है। उसे फटकर रास्ता देना ही होता है। यहां बना पहाड़ तो व्यवस्था के दीमकों के बनाया शक्ल है,। बस इंतजार है महज हल्की बारिश की। जो कहीं न कहीं से निकली फुहार उसे भरभराएगा ही।

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