दुलारचंद यादव की हत्या, जातीय अपराध की आग और नकारा सरकार

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। बिहार की राजनीति में मोकामा, बाढ़ और पंडारक का इलाका हमेशा से एक ‘ज्वालामुखी’ की तरह रहा है। शांत दिखता है, लेकिन अंदर से उबाल मारता रहता है। गंगा के किनारे बसा यह क्षेत्र खेती की उपजाऊ जमीन, अपराध की काली छाया और राजनीति की जटिल गुत्थियों का अनोखा मिश्रण है। यहां की सामाजिक बनावट इतनी उलझी हुई है कि हर छोटी-बड़ी घटना में जाति का गणित और राजनीतिक रंजिश अपना रंग दिखाती है

ताजा मामला दुलारचंद यादव की निर्मम हत्या का है, जो इस इलाके की पुरानी दुश्मनियों को फिर से जिंदा कर दिया है। यह हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि यादव-भूमिहार वर्चस्व की जंग का नया अध्याय बन गई है, जो आगामी विधानसभा चुनावों को और रोमांचक बना रही है।

जातीय समीकरण: यादवों का गढ़, भूमिहारों का दबदबा

मोकामा विधानसभा क्षेत्र में यादव समुदाय की आबादी सबसे बड़ी है। अनुमानित 27 से 30 प्रतिशत तक। यह वोट बैंक यहां की राजनीति की रीढ़ माना जाता है। इसके बाद भूमिहार जाति का नंबर आता है, जो करीब 20 प्रतिशत है और बाढ़ व पंडारक के कई पंचायतों में गहरा प्रभाव रखती है।

कुर्मी, धानुक, पासवान, राजपूत और मुस्लिम समुदाय मिलकर बाकी समीकरण को पूरा करते हैं। बाढ़ के उत्तरी हिस्से और पंडारक के दक्षिणी इलाकों में भूमिहारों का परंपरागत दबदबा रहा है, जबकि मोकामा और हाथीदह बेल्ट में यादव मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

यादव समुदाय वर्षों से इस क्षेत्र के नेतृत्व की मुख्य धुरी रहा है। यहां की राजनीति दबंग नेताओं की पहचान से जुड़ी हुई है। हथियारबंद गुट पंचायत से विधानसभा तक जातीय वर्चस्व की लड़ाई,  यह सब यहां की ‘परंपरा’ बन चुकी है। 2000 के दशक में भूमिहार बनाम यादव संघर्ष खुलकर सामने आया था। गोलीबारी की घटनाएं, अपहरण और राजनीतिक हत्याएं इसी वर्चस्व की जंग का हिस्सा थीं। विकास के मुद्दे यहां पीछे छूट जाते हैं। असल मुद्दा यह रहता है कि किस जाति का नेता ‘ऊंचा बोलेगा’।

दुलारचंद यादव: यादव चेहरा और धानुक समाज का ‘कमान’

दुलारचंद यादव इसी यादव राजनीति का चमकता सितारा थे। वे सिर्फ एक स्थानीय नेता नहीं, बल्कि पूरे धानुक समाज के ‘इशारे’ पर चलने वाले प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते थे। पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा प्रचार तक उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही थी।

हाल के दिनों में वे अपने इलाके में बेहद सक्रिय हो गए थे। रैलियां, बैठकें और जनसंपर्क अभियान चलाते नजर आते थे। यह उभरता प्रभाव दूसरे गुटों को खटक रहा था। विरोधी खेमे में चर्चा थी कि दुलारचंद यादव अगर ऐसे ही आगे बढ़े तो यादव वोट बैंक को एकजुट कर चुनावी वैतरणी पार करा देंगे।

हत्या की घटना ने सबकुछ बदल दिया। गोलीबारी में उनकी मौत ने इलाके में हड़कंप मचा दिया। पुलिस जांच अभी प्रारंभिक चरण में है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह धारणा मजबूत हो रही है कि यह व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश है।

हत्या के बाद ध्रुवीकरण: ‘वोट जाति देखकर पड़ेगा’

हत्या के बाद इलाके में जातीय ध्रुवीकरण तेज हो गया है। यादव समुदाय इसे ‘साजिशन हत्या’ मान रहा है। गांव-गांव में बैठकें हो रही हैं, जहां लोग कह रहे हैं कि इस बार वोट जाति की लकीर पर ही पड़ेगा। हर बार चुनाव से पहले ऐसी हिंसा होती है, ताकि एक खास वोट बैंक को एकजुट किया जा सके। बाढ़-पंडारक बेल्ट में भूमिहार समुदाय के बीच भी बेचैनी है। वे इसे ‘पुरानी रंजिश’ का हिस्सा बता रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर चुनावी नुकसान की चिंता सता रही है।

यहां की राजनीति में एक पुरानी कहावत प्रचलित है। यहां कोई मरता नहीं, मारा जाता है। दुलारचंद की हत्या ने इसी कहावत को साबित कर दिया। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि हत्या सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश है। मोकामा में यादव वोटों का बिखराव रोकने के लिए या भूमिहार प्रभाव को कम करने के लिए दोनों तरफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है।

चुनावी रोमांच: कौन मारेगा बाजी?

आगामी विधानसभा चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प हो गए हैं। किसी को कुछ पता नहीं कि बाजी कौन मारेगा। यादव खेमे में एकता की कोशिशें तेज हो गई हैं, जबकि भूमिहार और अन्य समुदाय सतर्क हो गए हैं। कुर्मी, धानुक और पासवान वोटरों की भूमिका अब और निर्णायक हो गई है। पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है। अतिरिक्त फोर्स तैनात की गई है, लेकिन इलाके की जटिल सामाजिक संरचना में शांति बनाए रखना चुनौती बनी हुई है।

बहरहाल यह घटना बिहार की ‘अपराध-राजनीति’ की पुरानी कहानी को दोहरा रही है। गंगा किनारे की यह आग कब शांत होगी, कोई नहीं जानता। लेकिन एक बात साफ है कि दुलारचंद यादव की हत्या ने मोकामा की राजनीति को नई धार दे दी है।

चुनावी जंग अब जातीय वर्चस्व की जंग बन चुकी है। क्या यह हिंसा विकास के एजेंडे को पीछे धकेल देगी? या फिर मतदाता इस बार कुछ नया सोचेंगे? समय बताएगा। फिलहाल इलाका तनाव की चपेट में है और हर आंख चुनावी नतीजों पर टिकी हुई है।

(रिपोर्ट: एक्सपर्ट मीडिया न्यूज टीम, मोकामा से विशेष संवाददाता। सभी तथ्य स्थानीय स्रोतों पर आधारित।)

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