चर्चित कांके अंचल में भूमि सुधार: अमल की प्रतीक्षा में दरकता न्यायालय का आदेश !

रांची (एक्सपर्ट मीडया न्यूज / मुकेश भारतीय)। झारखंड की राजधानी रांची जिले के कांके अंचल में भूमि सुधार से जुड़ा एक विवाद प्रशासनिक प्रक्रिया की धीमी गति और सिस्टम के बीच फ़ैक्टरी फ़र्क को उजागर कर रहा है। यह मामला यह दिखाता है कि कैसे न्यायालय का आदेश, वरिष्ठ प्रशासनिक पत्राचार और राजस्व पोर्टल पर अपडेट की प्रक्रिया तीनों एक साथ चलते हुए भी अलग-अलग दिशा में दिख रहे हैं।
भूमि से जुड़े इस प्रकरण में सक्षम न्यायालय ने दिसंबर माह में एक अंतरिम आदेश पारित किया था, जिसमें अंचल कार्यालय को आदेश का अनुपालन करते हुए अवैध जमाबंदी रद्द करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। आदेश के बाद आवेदक द्वारा दस्तावेज, शपथ-पत्र और साक्ष्य समयबद्ध रूप से प्रस्तुत किए गए, लेकिन अभी तक राजस्व पोर्टल पर दाखिल-खारिज की स्थिति यथावत बनी हुई है।
विशिष्ट रूप से दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जिला प्रशासन के वरिष्ठ स्तर से अंचल अधिकारी को एक पत्र निर्गत किया गया, जिसमें प्रकरण की स्थिति स्पष्ट करने और प्रतिवेदन उपलब्ध कराने को कहा गया। यह पत्र दिसंबर 2025 के अंत में हस्ताक्षरित होने के बावजूद जनवरी के मध्य तक भी राजस्व पोर्टल पर कोई परिवर्तन दर्ज नहीं हुआ है, जिससे प्रक्रिया के बीच वास्तविकता और औपचारिकता में अंतर स्पष्ट हो रहा है।
राजस्व पोर्टल पर निरंतर वही पुराना रिकॉर्ड दिखने और आदेशों के अनुपालन का स्पष्ट प्रभाव न दिखने से यह प्रश्न उठता है कि क्या प्रशासनिक प्रक्रिया तकनीकी अभिलेख तक पुनः सही मायने में पहुँच पा रही है? विशेषज्ञों का मानना है कि आदेशों का प्रभाव तभी पूर्ण रूप से दर्शाया जा सकता है जब प्रचलित प्रणाली में उसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति ऑनलाइन रिकॉर्ड में भी परिलक्षित हो।
भूमि सुधार जैसे संवेदनशील विषय में प्रक्रिया की धीमी गति न केवल आर्थिक गतिविधियों पर असर डालती है, बल्कि इससे सामाजिक तनाव, विवादों की जटिलता और स्थानीय स्तर पर अप्रत्याशित जोखिम भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसीलिए यह मामला केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि व्यापक रूप से यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रशासनिक आदेश और तकनीकी रिकॉर्ड के बीच तालमेल स्थापित है?
जानकारों के अनुसार यह स्थिति प्रक्रिया के ठहराव को उजागर करती है। आदेश तो अस्तित्व में हैं, पत्राचार भी दर्ज किया गया है, लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड और जमीन तक आदेश का असर नहीं दिख रहा है।
यह प्रकरण यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि न्यायालयीन आदेश का मूल उद्देश्य केवल आदेश जारी करना नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव वास्तविक अभिलेखों और जन-स्तर पर दिखना भी है। जब तक प्रशासन, आदेश और तकनीकी रिकॉर्डिंग में तालमेल नहीं बैठता, तब तक इस तरह के विवाद आम नागरिक के लिए प्रक्रिया में फंसने का एक उदाहरण बने रहेंगे।
यह रिपोर्ट किसी भी व्यक्ति विशेष या पदाधिकारी के खिलाफ आरोप नहीं लगाती, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की प्रक्रिया और तकनीकी अभिलेखों की समकालीन स्थिति को उजागर करती है। यह मामला यह दिखाता है कि न्यायालय, प्रशासन और डिजिटल रिकॉर्ड के बीच तालमेल कितना आवश्यक है। खासकर तब जब आदेश जारी हो चुके हों और संबंधित पक्ष समयबद्ध रूप से अभिलेख प्रस्तुत कर चुका हो।







