
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क)। झारखंड हाईकोर्ट की हालिया सख्ती ने राज्य की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय से निष्क्रिय पड़े राज्य सूचना आयोग को लेकर अदालत के कड़े रुख ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अब नागरिकों के सूचना के अधिकार के साथ लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अदालत ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर आयोग को कार्यशील बनाने का निर्देश देकर शासन-प्रशासन को आईना दिखाया है। यह आदेश केवल एक प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रयास भी है।
एक नागरिक की लड़ाई से उठी बड़ी संवैधानिक बहस
यह पूरा मामला एक साधारण नागरिक, बीरेंद्र सिंह, की सूचना पाने की कोशिश से शुरू हुआ। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत एक विभाग से जानकारी मांगी थी। निर्धारित 30 दिनों की समय सीमा बीत जाने के बावजूद उन्हें सूचना नहीं मिली।
इसके बाद उन्होंने प्रथम अपील दायर की, लेकिन वहां भी सुनवाई नहीं हुई। अंततः उन्होंने दूसरी अपील झारखंड राज्य सूचना आयोग में दाखिल की और यहीं से समस्या उजागर हुई।
आयोग में न तो मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति थी और न ही अन्य आयुक्त कार्यरत थे। परिणामस्वरूप आयोग पूरी तरह निष्क्रिय पड़ा था। यानी नागरिकों के लिए बनाया गया वैधानिक अपीलीय मंच ही अस्तित्वहीन स्थिति में था।
न्यायपालिका ने दिखाई संवेदनशीलता
मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ में शामिल जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय शामिल के समक्ष हुई। अदालत ने इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लिया और राज्य के मुख्य सचिव तथा कार्मिक सचिव को सशरीर उपस्थित होने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि सूचना का अधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मौलिक अधिकार है। यदि नागरिकों को सूचना नहीं मिलेगी तो वे अपनी राय कैसे बना पाएंगे?
महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अदालत को आश्वासन दिया कि चार सप्ताह के भीतर आयोग को कार्यशील बना दिया जाएगा। अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए अगली सुनवाई की तिथि 27 फरवरी निर्धारित की।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
राज्य सूचना आयोग का उद्देश्य ही यह है कि यदि कोई विभाग सूचना देने में विफल रहता है तो नागरिक वहां अपील कर सकें। लेकिन जब आयोग ही काम नहीं कर रहा हो, तो पूरा आरटीआई तंत्र पंगु हो जाता है।
झारखंड में यह स्थिति कई महीनों से बनी हुई थी। हजारों अपीलें लंबित हैं, जिनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं। इससे न केवल नागरिकों का भरोसा टूटता है, बल्कि भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता को भी बढ़ावा मिलता है।
लोकतंत्र का प्रहरी है आरटीआई अधिनियम
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत के लोकतंत्र में पारदर्शिता की क्रांति लेकर आया था। इस कानून ने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार दिया। मनरेगा से लेकर राशन वितरण, सड़क निर्माण से लेकर नियुक्तियों तक आरटीआई ने अनगिनत घोटालों को उजागर किया है।
लेकिन यह कानून तभी प्रभावी है, जब इसकी संस्थाएं जैसे सूचना आयोग, सक्रिय और स्वतंत्र रूप से काम करें। आयोग की निष्क्रियता का मतलब है कानून का निष्प्रभावी हो जाना।
झारखंड में आरटीआई की जमीनी चुनौतियां
झारखंड जैसे संसाधन-संपन्न लेकिन प्रशासनिक चुनौतियों से जूझते राज्य में आरटीआई की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। खनन पट्टों, वन भूमि, विस्थापन, विकास योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।
लेकिन हकीकत यह है कि विभाग समय पर सूचना नहीं देते। सूचना अधिकारियों को दंडित नहीं किया जाता। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता कम है और सबसे बड़ी बात, अपील की व्यवस्था ठप पड़ी रहती है। इसका सीधा असर गरीब, आदिवासी और ग्रामीण नागरिकों पर पड़ता है।
हाईकोर्ट का आदेश कानूनी दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण?
हाईकोर्ट का यह निर्देश आरटीआई अधिनियम की धारा 15 के अनुरूप है, जिसमें राज्य सूचना आयोग के गठन का प्रावधान है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आयोग का गठन करना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है, कोई विकल्प नहीं।
संवैधानिक दृष्टि से यह फैसला अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) से भी जुड़ता है। सूचना के बिना नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते। यह आदेश न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जहां अदालत ने शासन की निष्क्रियता पर हस्तक्षेप किया।
क्या सरकार का आश्वासन भरोसेमंद है?
सरकार ने चार सप्ताह में आयोग को कार्यशील बनाने का वादा किया है। लेकिन झारखंड का पिछला रिकॉर्ड देखें तो कई संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियां वर्षों तक लंबित रही हैं।
चुनौती केवल नियुक्ति करने की नहीं, बल्कि योग्य और स्वतंत्र व्यक्तियों की नियुक्ति की है। यदि चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हुई, तो आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
नागरिकों के लिए इसका क्या मतलब है?
यदि आयोग वास्तव में सक्रिय हो जाता है तो इसका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा। लंबित अपीलों की सुनवाई शुरू होगी। विभागों पर जवाबदेही बढ़ेगी। सूचना न देने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगेगा और पारदर्शिता बढ़ेगी। यह खासकर उन लोगों के लिए राहत होगी, जो सरकारी योजनाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ लड़ रहे हैं।
सामाजिक न्याय और आरटीआई एक मजबूत संबंध
झारखंड में बड़ी आबादी आदिवासी और वंचित समुदायों की है। ये समुदाय अक्सर सरकारी सूचनाओं से दूर रहते हैं। आरटीआई उनके लिए एक सशक्त हथियार है।
भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, वनाधिकार, पेंशन, राशन इन सभी मामलों में सूचना मिलना जीवन बदल सकता है। आयोग की सक्रियता सामाजिक न्याय की दिशा में भी बड़ा कदम साबित हो सकती है।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: क्या यह देशभर के लिए संदेश है?
भारत के कई राज्यों में सूचना आयोगों में रिक्तियां और लंबित मामले बड़ी समस्या हैं। सुप्रीम कोर्ट भी पहले कई बार इस मुद्दे पर टिप्पणी कर चुका है।
झारखंड हाईकोर्ट का यह आदेश अन्य राज्यों के लिए भी एक चेतावनी माना जा सकता है कि सूचना आयोगों की अनदेखी अब न्यायपालिका स्वीकार नहीं करेगी।
प्रशासनिक सुधार की जरूरत
सिर्फ आयुक्तों की नियुक्ति से समस्या हल नहीं होगी। जरूरत है विभागों में आरटीआई नोडल अधिकारियों को प्रशिक्षित करने, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम मजबूत करने, समय पर सुनवाई सुनिश्चित करने और आदेशों के अनुपालन की निगरानी की। सरकार यदि इसे व्यापक प्रशासनिक सुधार के अवसर के रूप में लेती है, तो स्थिति वास्तव में बदल सकती है।
मीडिया और सिविल सोसायटी की भूमिका
आरटीआई को मजबूत करने में मीडिया और सामाजिक संगठनों की बड़ी भूमिका है। जागरूकता अभियान, कानूनी सहायता और जनसुनवाई जैसे प्रयासों से नागरिकों को सशक्त किया जा सकता है। हाईकोर्ट का यह आदेश इस दिशा में नई ऊर्जा भर सकता है।
आगे की उम्मीदें और चुनौतियां
27 फरवरी को अगली सुनवाई में सरकार को अपनी प्रगति बतानी होगी। यदि तब तक आयोग सक्रिय हो जाता है, तो यह एक सकारात्मक मिसाल बनेगा। लेकिन यदि देरी होती है, तो अदालत सख्त रुख अपना सकती है। यह समय सरकार के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करने का है कि क्या वह पारदर्शिता और सुशासन को प्राथमिकता देती है या नहीं।
न्यायपालिका की पहल से सुशासन की किरण
झारखंड हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत करने वाला कदम है। सूचना का अधिकार केवल कागजी कानून नहीं, बल्कि नागरिक सशक्तिकरण का माध्यम है। यदि सूचना आयोग सक्रिय और प्रभावी होता है, तो यह भ्रष्टाचार पर अंकुश, प्रशासन में पारदर्शिता और जनता के विश्वास की बहाली की दिशा में बड़ा बदलाव ला सकता है।
अब निगाहें सरकार पर हैं। क्या वह अदालत के भरोसे पर खरी उतरती है? अगर हां, तो यह फैसला झारखंड में सुशासन की नई शुरुआत माना जाएगा।
रांची से एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क के लिए मुकेश भारतीय का खबर विश्लेषण।










