नई दिल्ली/रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड (Jharkhand) की राजनीति इन दिनों एक अहम मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है, जहां सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बढ़ती असहजता अब खुलकर सामने आने लगी है। झामुमो के नेतृत्व वाली हेमंत सोरेन सरकार, जो अब तक कांग्रेस के समर्थन के सहारे स्थिर बनी हुई थी, अब उसी सहयोगी दल की नाराजगी से जूझती दिख रही है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान, विशेष रूप से राहुल गांधी झामुमो की कार्यशैली और राजनीतिक फैसलों से संतुष्ट नहीं हैं। यह असंतोष केवल रणनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे गठबंधन धर्म के उल्लंघन के रूप में भी देखा जा रहा है, जिससे दोनों दलों के बीच भरोसे की खाई और चौड़ी हो गई है।
दरअसल असम विधानसभा चुनाव में झामुमो द्वारा अपने प्रत्याशी उतारने और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में प्रचार करने को कांग्रेस ने गंभीरता से लिया है।
कांग्रेस का मानना है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एकजुटता की जरूरत थी, तब सहयोगी दल का अलग रुख अपनाना राजनीतिक समन्वय की कमी को दर्शाता है। इससे यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या झारखंड में गठबंधन केवल सत्ता तक सीमित रह गया है या उसके पीछे कोई साझा वैचारिक आधार भी बचा है।
इधर झारखंड प्रदेश कांग्रेस के भीतर भी असंतोष अब संगठित रूप लेता जा रहा है। बीते दिन प्रदेश प्रभारी के. राजू की मौजूदगी में हुई बैठक में जिलाध्यक्षों ने सरकार के कामकाज पर तीखे सवाल उठाए।
उनका कहना था कि सरकार में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही है और न ही उनके जरिए जनता के मुद्दों का समाधान हो पा रहा है। कई नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा है और सरकार उस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रही है।
कार्यकारी अध्यक्ष जलेश्वर महतो ने तो यहां तक कहा कि राज्य में लूट की स्थिति है, जहां भाजपा से जुड़े लोग लाभ उठा रहे हैं और सरकार मौन बनी हुई है। यह बयान न केवल सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि गठबंधन के भीतर अविश्वास की गहराई को भी उजागर करता है।
बैठक के दौरान सबसे अहम संकेत उस समय मिला, जब कुछ जिलाध्यक्षों और नेताओं ने सुझाव दिया कि कांग्रेस को मौजूदा हालात में सरकार को बाहर से समर्थन देने के विकल्प पर विचार करना चाहिए।
हालांकि यह कोई आधिकारिक फैसला नहीं है, लेकिन इस तरह की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है। यदि ऐसा होता है तो यह न केवल गठबंधन की संरचना को बदल सकता है, बल्कि सरकार की स्थिरता पर भी असर डाल सकता है।
सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर भी कांग्रेस का असंतोष लगातार बढ़ रहा है। बोर्ड और निगमों में प्रतिनिधित्व की मांग लंबे समय से लंबित है, जिससे संगठन के भीतर निराशा का माहौल है।
इसके अलावा राज्यसभा सीट को लेकर भी कांग्रेस अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती है और इसे गठबंधन के भीतर अपनी राजनीतिक स्थिति के प्रतीक के रूप में देख रही है। संगठन विस्तार में हो रही देरी ने भी कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ा दी है।
प्रदेश प्रभारी के. राजू ने इसे सोशल इंजीनियरिंग से जोड़ते हुए संतुलन साधने की कोशिश बताई, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लेकर असंतोष कम नहीं हुआ है।
कांग्रेस ने अब यह भी संकेत दिया है कि वह केवल सत्ता में भागीदार बनकर नहीं रहेगी, बल्कि जनमुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाएगी। प्रखंड और जिला स्तर पर प्रशासन के खिलाफ आंदोलन की तैयारी की जा रही है।
यह रणनीति एक ओर संगठन को सक्रिय करने का प्रयास है तो दूसरी ओर सरकार पर दबाव बनाने का भी माध्यम बन सकती है। इससे यह भी साफ है कि कांग्रेस आने वाले समय में सत्ता और संघर्ष दोनों की राजनीति साथ-साथ चलाना चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा हालात को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला कांग्रेस अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव बढ़ाने के लिए दबाव की रणनीति अपना रही है। दूसरा बाहर से समर्थन जैसे विकल्प की चर्चा यह संकेत देती है कि पार्टी भविष्य में संभावित एंटी-इंकंबेंसी से खुद को अलग रखने की तैयारी कर रही है। और तीसरा यह पूरी स्थिति गठबंधन के पुनर्संतुलन की ओर भी इशारा करती है, जहां दोनों दल नई शर्तों और समीकरणों के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
कुल मिलाकर झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर उभर रहा यह तनाव आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। यदि कांग्रेस की नाराजगी दूर नहीं होती तो इसका सीधा असर सरकार की स्थिरता और नीतिगत फैसलों पर पड़ सकता है।
फिलहाल, सभी की नजर कांग्रेस आलाकमान और झामुमो नेतृत्व के अगले कदम पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि यह टकराव केवल दबाव की राजनीति है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका तैयार हो रही है।

