बिहार में उठते अनेक सवालों पर सन्नाटा है। यही सन्नाटा शायद बिहार की दुर्दशा की असली वजह भी है। यहां योग्य और काबिल नेता नहीं, बल्कि वोट बटोरने वाला मुख्यमंत्री चाहिए और वह भी अपनी जाति का…
एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क / मुकेश भारतीय। करीब एक महीने से बिहार अपने अगले मुख्यमंत्री की खोज में ऐसे जुटा है, जैसे कोई पुरातत्व विभाग प्राचीन खजाने की तलाश कर रहा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां खजाना नहीं, बल्कि सही जातीय समीकरण खोजा जा रहा है।
किसिम-किसिम के समीक्षक और स्वयंभू विशेषज्ञ अपने-अपने पसंदीदा नेता के पक्ष में तर्कों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि फलां नेता आएंगे तो एनडीए का वोट बैंक अक्षुण्ण रहेगा तो कोई दावा कर रहा है कि अमुक चेहरा बनते ही लालू के वोट बैंक में सेंध लग जाएगी। कुछ लोग संघ की पसंद गिनवा रहे हैं तो कुछ यह जोड़-घटाव कर रहे हैं कि नीतीश किसे पसंद करेंगे।
बात यहीं नहीं रुकती। कोई लव-कुश समीकरण की दुहाई दे रहा है, कोई अति पिछड़ा मुख्यमंत्री की मांग कर रहा है तो कोई दलित चेहरे को आगे बढ़ाने की वकालत कर रहा है। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति इस समय जातीय कैलकुलेटर पर चल रही है, जिसमें विकास का बटन शायद खराब हो चुका है।
इसी बीच एक नया नाम भी चर्चा में है निशांत कुमार। परिवारवाद की राजनीति के कट्टर विरोधी रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने ही उनके पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने के नारे लगाए जा रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इन नारों पर मुख्यमंत्री की खामोश मुस्कराहट भी कम चर्चा का विषय नहीं है।
बेमन से राजनीति में आए निशांत की सबसे बड़ी राजनीतिक योग्यता फिलहाल यही बताई जा रही है कि वे मुख्यमंत्री के पुत्र हैं। और अगर राजनीतिक परंपरा यही है कि बिना परीक्षा दिए भी मंत्री पद मिल सकता है तो फिर मुख्यमंत्री पद की परीक्षा देने की जरूरत ही क्या है? उपेन्द्र कुशवाहा का बेटा जब बिना चुनाव लड़े-जीते सीधे मंत्री बन सकता है तो फिर निशांत में क्या बुराई ढूंढी जाए।
दरअसल पूरी बहस जातीय दायरे में सिमट गई है। यह लगभग तय मान लिया गया है कि जब राजनीति जाति के आधार पर होगी तो मुख्यमंत्री भी जातीय गणित के फार्मूले से ही निकलेगा।
हैरानी की बात यह है कि इस बहस में यह सवाल कहीं सुनाई नहीं देता कि कौन नेता बिहार का विकास कर सकता है। किसके पास शासन चलाने की क्षमता है? कौन उद्योग-धंधों का जाल बिछा सकता है? किसके पास बिहार को विकसित राज्य बनाने का कोई ठोस ब्लूप्रिंट है? कौन नेता लुटेरे अफसरों और गोलियां दागते अपराधियों की नकेल कस सकता है?
इन सवालों पर सन्नाटा है। यही सन्नाटा शायद बिहार की दुर्दशा की असली वजह भी है। यहां योग्य और काबिल नेता नहीं, बल्कि वोट बटोरने वाला मुख्यमंत्री चाहिए और वह भी अपनी जाति का।
फिर हैरानी कैसी कि बिहार में रोजगार नहीं है, भ्रष्टाचार चरम पर है और लूट-पाट व अपराध की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बनती हैं? क्योंकि यहां मुख्यमंत्री खोजने से ज्यादा जरूरी समझा जा रहा है जातीय गणित का सही उत्तर निकालना।


