झारभूमि पोर्टल में सेंध या सिस्टम का खेल? कांके अंचल कार्यालय कागज पर उगाती है जमीन, DCLR कोर्ट आदेश भी बेअसर

“दैनिक प्रभात खबर के डिजिटल घोटाले के खुलासे के बीच कांके नेवरी केस ने बढ़ाई चिंता। डिजिटल इंडिया के दौर में अगर जमीन कागज पर उगने लगे तो यह सिर्फ गड़बड़ी नहीं, व्यवस्था के भीतर छिपी बड़ी कहानी का संकेत है…”

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क)। झारखंड के राजस्व तंत्र में डिजिटल पारदर्शिता के दावों के बीच झारभूमि पोर्टल में छेड़छाड़ का मामला अब गंभीर संस्थागत संकट का रूप लेता दिख रहा है। दैनिक प्रभात खबर द्वारा उजागर किए गए पोर्टल सेंधमारी के खुलासे के समानांतर रांची के कांके अंचल स्थित नेवरी मौजा का एक मामला सामने आया है, जो इस पूरे तंत्र पर कई असहज सवाल खड़े कर रहा है।

डिजिटल पोर्टल में ‘एक क्लिक’ का खेल? प्रभात खबर की पड़ताल में सामने आया कि अगस्त 2025 से फरवरी 2026 के बीच झारभूमि पोर्टल में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ हुई । पहले से खारिज दाखिल-खारिज मामलों को सिस्टम में कायम दिखा दिया गया। 1990-91 के पुराने मामलों को आधार बनाकर नई जमाबंदी सृजित की गई  और वर्षों की लगान रसीद एक साथ काट दी गई। इन तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि पोर्टल के भीतर से ही सुनियोजित तरीके से रिकॉर्ड बदले गए।

नेवरी मौजा केस खुलासे से मेल खाता पैटर्नः इसी पैटर्न से मिलता-जुलता एक मामला नेवरी मौजा (कांके अंचल) में सामने आया है, जहां वर्ष 2010-11 में विधिवत 25 डिसमिल जमीन की खरीदगी, दाखिल-खारिज और जमाबंदी हुई , लेकिन वर्ष 2021-22 में अचानक 12 डिसमिल अतिरिक्त जमाबंदी सृजित हो गई। परिणाम स्वरुप 25 डिसमिल जमान रिकॉर्ड में 37 डिसमिल हो गई। यह वही डिजिटल हेरफेर का संकेत देता है, जिसकी चर्चा प्रभात खबर की रिपोर्ट में भी की गई है।

DCLR आदेश के बावजूद जारी अवैध रसीदः मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब DCLR,सदर रांची ने 02.12.2025 को 12 डिसमिल की संदिग्ध जमाबंदी को निरस्त करने का आदेश दिया। लेकिन 16.04.2026 को उसी कथित अवैध जमाबंदी के आधार पर 2026-27 की लगान रसीद जारी कर दी गई और यह प्रविष्टि ऑनलाइन पोर्टल पर प्रदर्शित भी हो रही है। यह स्थिति सीधे तौर पर आदेश के अनुपालन पर सवाल खड़े करती है।

अधूरी रिपोर्ट या चयनात्मक प्रस्तुति? अपर समाहर्ता के निर्देश पर अंचल स्तर से भेजी गई रिपोर्ट में वर्ष 2022 की 12 डिसमिल जमाबंदी का उल्लेख किया गया। लेकिन वर्ष 2010-11 में उसी प्लॉट से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जमाबंदी (12 और 8 डिसमिल) का जिक्र नहीं किया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या रिपोर्ट में सभी तथ्यों को समग्र रूप से प्रस्तुत किया गया था, या कुछ पहलुओं को छोड़ दिया गया?

प्रभात खबर के उदाहरण और जमीनी हकीकतः प्रभात खबर की रिपोर्ट में जिन गड़बड़ियों का जिक्र है, वे इस केस में भी परिलक्षित होती दिख रही हैं। पोर्टल से नाम हटाकर फिर जोड़ना। रिकॉर्ड में नए नाम चढ़ाना। ऑनलाइन जमाबंदी में बदलाव। वर्षों की लगान रसीद एक साथ जारी करना। नेवरी, पतरातू, बोड़या और सुकुरहुटू जैसे इलाकों में सामने आए मामलों से यह संकेत मिलता है कि यह समस्या किसी एक फाइल तक सीमित नहीं है।

ACB की जांच और Continuing Issue:  इस प्रकरण में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा PE (Preliminary Enquiry) दर्ज की जा चुकी है। हालांकि, DCLR आदेश के बाद भी नई रसीद जारी होने से यह मामला अब continuing issue के रूप में देखा जा रहा है। यानी गड़बड़ी केवल पुराने रिकॉर्ड तक सीमित नहीं, बल्कि वर्तमान में भी प्रभाव डाल रही है।

बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैंः क्या झारभूमि पोर्टल की सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है?  क्या बिना आंतरिक एक्सेस के ऐसे बदलाव संभव हैं? क्या आदेशों के अनुपालन की प्रभावी निगरानी हो रही है?  क्या रिपोर्टिंग सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है?

प्रशासनिक भरोसे की परीक्षाः जब न्यायिक/अर्ध-न्यायिक आदेश के बाद भी प्रविष्टि बनी रहे और डिजिटल रिकॉर्ड वास्तविकता से अलग दिखे तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का मुद्दा बन जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

संबंधित खबरें

ताजा खबरें

सर्वजन खबरें