झारखंड में सूचना आयुक्त नियुक्ति पर घमासान, इन 3 सियासी चेहरों पर उठे कानूनी सवाल

यदि  सूचना आयुक्त नियुक्ति के लिए चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका वर्तमान और सक्रिय है तो यह आरटीआई अधिनियम की मूल भावना और वैधानिक प्रावधानों का प्रत्यक्ष उल्लंघन माना जा सकता है। विशेष रूप से भाजपा, कांग्रेस और झामुमो से जुड़े तीन नामों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या चयन के समय उन्होंने किसी दल से औपचारिक दूरी बनाई है या नहीं।

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में लंबे समय से ठप पड़े राज्य सूचना आयोग को फिर से सक्रिय करने की दिशा में सरकार की ओर से तेज़ी दिखी है, लेकिन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति द्वारा तय किए गए नाम अब नए विवाद का केंद्र बन गए हैं।

चयनित पांच नामों में तीन ऐसे चेहरे शामिल होने की बात सामने आई है, जिनकी सक्रिय राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता और कानूनी हलकों में गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

राज्य सरकार की हाई पावर चयन समिति ने जिन नामों पर मुहर लगाई है, उनमें भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, कांग्रेस महासचिव अमूल्य नीरज खलखो, झामुमो नेता तनुज खत्री, वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा और धर्मवीर सिन्हा शामिल बताए जा रहे हैं। अब इन नामों पर राज्यपाल की अंतिम सहमति का इंतजार है।

इस बीच आरटीआई कार्यकर्ता सुनील महतो ने नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देते हुए राज्यपाल से औपचारिक शिकायत की है और स्पष्ट कहा है कि यदि अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ तो मामला न्यायालय तक ले जाया जाएगा।

हालिया न्यायिक कार्यवाही में झारखंड हाईकोर्ट ने भी लंबित संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की स्थिति रिपोर्ट मांगी है और अगली सुनवाई 13 अप्रैल को निर्धारित की है। सरकार ने अदालत को बताया है कि चयन समिति की बैठक पूरी हो चुकी है और अधिसूचना शीघ्र जारी हो सकती है।

राजनीतिक संबद्धता बनाम वैधानिक पात्रता विवाद की मूल जड़: पूरा विवाद सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(6) के उस प्रावधान के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होगा। यही वह बिंदु है जिस पर चयन समिति के निर्णय पर सवाल उठ रहे हैं।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि चयनित व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका वर्तमान और सक्रिय है तो यह आरटीआई अधिनियम की मूल भावना और वैधानिक प्रावधानों का प्रत्यक्ष उल्लंघन माना जा सकता है।

विशेष रूप से भाजपा, कांग्रेस और झामुमो से जुड़े तीन नामों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या चयन के समय उन्होंने किसी दल से औपचारिक दूरी बनाई है या नहीं।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार केवल “पूर्व संबद्धता” और “सक्रिय राजनीतिक भूमिका” के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। यदि व्यक्ति अभी भी किसी दल में पदधारी हैं, तो नियुक्ति न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।

चार वर्षों से ठप आयोग, हजारों मामलों का बोझः  झारखंड राज्य सूचना आयोग की स्थिति पिछले कई वर्षों से बेहद चिंताजनक बनी हुई है। 8 मई 2020 से आयोग में अपील और शिकायतों की नियमित सुनवाई प्रभावी रूप से ठप पड़ी है। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के सभी स्वीकृत पद लंबे समय से रिक्त हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 22,657 अपीलें और 430 शिकायतें लंबित हैं। कई मामलों में सुनवाई की तारीख तक तय नहीं है। इस कारण नीचे से उपर तक के जन सूचना अधिकारी एवं अपीलीय पदाधिकारी बेलगाम घोड़े की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले महीने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी और कहा था कि जब आयोग निष्क्रिय हो जाता है तो आरटीआई का पूरा तंत्र कमजोर पड़ जाता है। न्यायालय ने झारखंड में सभी पद रिक्त होने और आयोग के 2020 से लगभग निष्क्रिय रहने पर तीखी टिप्पणी की थी।

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नियुक्ति प्रक्रियाः यह मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि न्यायिक निगरानी का विषय बन चुका है। झारखंड हाईकोर्ट में वर्ष 2020 से इस संबंध में अवमानना और जनहित याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में भी सूचना आयोग की रिक्तियों को लेकर मामला लंबित है।

सूत्रों के अनुसार पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के लिए समयबद्ध निर्देश दिए थे। अब यदि चयन प्रक्रिया में राजनीतिक पक्षपात या अधिनियम उल्लंघन का कोई ठोस आधार सामने आता है तो यह नियुक्ति अधिसूचना जारी होने से पहले ही कानूनी चुनौती का कारण बन सकती है।

पारदर्शिता पर भी सीधा सवालः आरटीआई कार्यकर्ता सुनील महतो ने सुप्रीम कोर्ट के अंजलि भारद्वाज बनाम भारत सरकार मामले का हवाला देते हुए कहा है कि चयनित उम्मीदवारों की पात्रता, अनुभव और आवेदन संबंधी सूचनाएं सार्वजनिक मंच पर रखी जानी चाहिए।

यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि सूचना आयोग स्वयं पारदर्शिता और जवाबदेही की संस्था है। ऐसे में उसके सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पर गोपनीयता सवालों को और गहरा कर रही है।

राजनीतिक नियुक्ति या संस्थागत मजबूरी? बड़ा सवालः राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय से रिक्त पड़े आयोग को शीघ्र सक्रिय करना सरकार की प्रशासनिक मजबूरी है, लेकिन यदि चयन में योग्यता से अधिक राजनीतिक समीकरण हावी दिखे, तो इससे आयोग की निष्पक्षता पर स्थायी प्रश्नचिह्न लग सकता है।

सूचना आयोग का काम सरकार और प्रशासन से जवाबदेही सुनिश्चित करना है। ऐसे में आयोग में राजनीतिक रूप से सक्रिय चेहरों की नियुक्ति से हितों के टकराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

नियुक्ति से पहले पारदर्शिता जरूरीः बहरहाल झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति लंबे इंतजार के बाद अंतिम चरण में पहुंची है, लेकिन जिस तरह चयनित नामों पर राजनीतिक संबद्धता को लेकर विवाद उभर रहा है, उससे यह प्रक्रिया और संवेदनशील हो गई है।

अब सबकी निगाहें राज्यपाल की स्वीकृति, अदालत की अगली सुनवाई और सरकार की आधिकारिक अधिसूचना पर टिकी हैं। क्योंकि यह नियुक्ति केवल पद भरने का मामला नहीं, बल्कि राज्य में सूचना के अधिकार और संस्थागत लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।

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