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झारखंड में लोकायुक्त और सूचना आयोग ठप, भ्रष्ट नकारा तंत्र की बल्ले-बल्ले!

No Lokayukta since 2021, all six posts in State Information Commission vacant; over 23,000 RTI appeals awaiting hearing

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्थापित दो प्रमुख संस्थाएं लोकायुक्त कार्यालय और राज्य सूचना आयोग आज खुद प्रशासनिक उदासीनता के शिकार बन चुके हैं। विडंबना यह है कि जहां एक ओर इन संस्थाओं का काम लगभग ठप पड़ा है, वहीं दूसरी ओर इनके संचालन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

लोकायुक्त और सूचना आयोग का उद्देश्य आम नागरिकों को भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितता और सूचना के अधिकार से जुड़े मामलों में न्याय दिलाना है। लेकिन इन संस्थाओं में शीर्ष पद लंबे समय से खाली होने के कारण हजारों मामलों की सुनवाई ठप हो गयी है। परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और सरकार की पारदर्शिता व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लोकायुक्त कार्यालय में तीन हजार से अधिक मामले लंबितः झारखंड में लोकायुक्त का पद 29 जून 2021 से खाली पड़ा है। तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति डी.एन. उपाध्याय के आकस्मिक निधन के बाद से अब तक इस पद पर किसी नए लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की गयी है।

उस समय लोकायुक्त कार्यालय में लगभग 1250 मामले लंबित थे। लेकिन पद खाली रहने के बावजूद सैकड़ों नई शिकायतें दर्ज होती रहीं। आज स्थिति यह है कि लंबित मामलों की संख्या 3000 से अधिक हो चुकी है।

स्थिति और भी गंभीर तब हो गयी, जब फरवरी 2022 से लोकायुक्त कार्यालय में समन जारी करने, रिपोर्ट मांगने और सुनवाई की पूरी प्रक्रिया लगभग बंद हो गयी। यानी शिकायतें दर्ज तो हो रही हैं, लेकिन उन पर किसी प्रकार की सुनवाई नहीं हो पा रही है।

इसके बावजूद लोकायुक्त कार्यालय के संचालन, कर्मचारियों के वेतन और अन्य प्रशासनिक खर्चों पर हर साल लगभग चार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

सूचना आयोग में छह पद खाली, सुनवाई पूरी तरह बंदः झारखंड राज्य सूचना आयोग की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त सहित सूचना आयुक्तों के सभी छह पद खाली हैं।

इसका परिणाम यह हुआ कि 8 मई 2020 से आयोग में अपील और शिकायतों की सुनवाई पूरी तरह बंद है। उस समय आयोग में 7657 अपील और 71 शिकायतें लंबित थीं।

लेकिन इसके बाद भी नागरिक लगातार आरटीआई के तहत अपील और शिकायतें दर्ज करते रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लगभग 15000 नई अपील दर्ज हुईं। 359 नई शिकायतें भी दर्ज की गयीं।

इस प्रकार आयोग में कुल मिलाकर 22657 अपील और 430 शिकायतें लंबित हो चुकी हैं। लेकिन इन मामलों की सुनवाई के लिए आयोग में कोई आयुक्त ही नहीं है।

विडंबना यह भी है कि सुनवाई ठप होने के बावजूद आयोग के प्रशासनिक खर्चों पर हर साल लगभग दो करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

सबसे बड़ा पारदर्शिता का सवालः लोकायुक्त और सूचना आयोग दोनों ही लोकतांत्रिक प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। लोकायुक्त का दायित्व सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करना है। वहीं सूचना आयोग नागरिकों को सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी दिलाने का अंतिम मंच है।

जब इन दोनों संस्थाओं में वर्षों तक शीर्ष पद खाली रह जाएं, तो इससे न केवल शिकायतों का समाधान रुक जाता है बल्कि शासन की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगते हैं।

हेमंत सरकार की प्राथमिकता पर भी उठ रहे सवालः विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन संस्थाओं में समय पर नियुक्ति नहीं होती, तो इसका सीधा असर प्रशासनिक जवाबदेही पर पड़ता है। हजारों मामलों का लंबित होना यह संकेत देता है कि शिकायत निवारण की पूरी व्यवस्था लगभग निष्क्रिय हो चुकी है।

सवाल यह भी उठ रहा है कि जब संस्थाएं काम ही नहीं कर पा रही हैं तो उनके संचालन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने का औचित्य क्या है।

बहरहाल, झारखंड में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने के लिए लोकायुक्त और सूचना आयोग की सक्रियता बेहद जरूरी मानी जाती है। ऐसे में नागरिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों की मांग है कि सरकार जल्द से जल्द इन संस्थाओं में रिक्त पदों पर नियुक्ति करे। ताकि वर्षों से लंबित हजारों मामलों की सुनवाई शुरू हो सके और जनता का भरोसा बहाल हो। स्रोतः एक्सपर्ट मीडिया रिपोर्टस्

मुकेश भारतीय

मुकेश भारतीय वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, प्रशासन और स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर लेखन-संपादन करते हैं। More »

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