
पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज / मुकेश भारतीय)। मगध की धरती प्राचीन काल से ही ज्ञान, कृषि और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती रही है। इसी परंपरा की एक अनमोल देन है मगही पान, जो आज सिर्फ शौक या परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि सेहत, विज्ञान और किसानों की आजीविका का मजबूत आधार बनता जा रहा है।
मगही पान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शिवनाथ दास के हालिया शोध और वक्तव्यों ने यह साफ कर दिया है कि मगही पान का पत्ता केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि औषधीय गुणों का खजाना है, जिसकी पहचान अब देश ही नहीं, विदेशों तक फैल चुकी है।
देश-विदेश में मगही पान की बढ़ती पहचानः डॉ. शिवनाथ दास बताते हैं कि मगही पान का पत्ता पहले से ही देश और विदेशों में मशहूर है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस पान में मौजूद अनेक लाभकारी तत्व। वर्ष 2024 में मगही क्षेत्र के कई पान कृषकों से पान के पत्ते एकत्र कर डब्ल्यूयूएयू (WUAU) के वैज्ञानिकों की टीम द्वारा गहन शोध कराया गया। इस शोध में विभिन्न किस्मों के पान के पत्तों की जांच की गई, जिनमें मगही पान को औषधीय गुणों के कारण सबसे उत्तम किस्म माना गया।
शोध के दौरान मगही पान की बेल के ऊपरी और निचले हिस्सों से पत्ते लेकर परीक्षण किया गया। परिणाम चौंकाने वाले थे। हर स्तर पर मगही पान की अलग पहचान और विशिष्ट गुण सामने आए। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे गुणकारी ही नहीं, बल्कि बहुउपयोगी और लाभकारी पत्ता मानते हैं।
सेहत के लिए वरदान है मगही पानः मगही पान का सेवन पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है, लेकिन अब इसके वैज्ञानिक आधार भी सामने आ चुके हैं। डॉ. दास के अनुसार पान के पत्तों का वासी मुंह सेवन करना विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। इससे शरीर के अंदर प्राकृतिक रूप से सफाई की प्रक्रिया शुरू होती है।
इसके अलावा पान के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीना अत्यंत फायदेमंद है। विधि बेहद सरल है। एक गिलास पानी में दो मगही पान के पत्ते डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाए, तो उसे छानकर पी लें।
इस काढ़े के नियमित सेवन से पाचन तंत्र की क्रिया बेहतर होती है, पेट से जुड़ी कई समस्याओं में राहत मिलती है और शरीर धीरे-धीरे विभिन्न रोगों से निजात पाने लगता है।
मुंह, दांत और मसूड़ों के लिए प्राकृतिक इलाजः आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मुंह की दुर्गंध, मसूड़ों की कमजोरी और दांतों की समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में मगही पान एक नेचुरल और असरदार इलाज साबित हो सकता है।
पान के पत्ते का सेवन करने से मुंह की बदबू कम होती है। मुंह के अंदर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट होते हैं। मसूड़े मजबूत होते हैं। दांत स्वस्थ और मजबूत बने रहते हैं। रोजाना सीमित मात्रा में पान का पत्ता उपयोग करने से ओरल हेल्थ में स्पष्ट सुधार देखा जा सकता है।
किसानों के लिए उम्मीद की नई किरणः मगही पान केवल सेहत का साधन नहीं, बल्कि किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का भी बड़ा जरिया है। नालंदा, गया, नवादा और आसपास के क्षेत्रों में पान की खेती वर्षों से होती आ रही है, लेकिन वैज्ञानिक तरीकों के अभाव में कई बार किसानों को नुकसान झेलना पड़ता था।
अब इस्लामपुर पान अनुसंधान केंद्र द्वारा बताए गए आधुनिक और एकीकृत प्रबंधन तरीकों से किसान बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता हासिल कर रहे हैं।
मगही पान की खेती: सही जमीन और तैयारीः मगही पान की सफल खेती के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ भरपूर हों। जल निकासी की व्यवस्था अच्छी हो।
इसके लिए ऊँची जमीन चुनें, जहां बारिश के मौसम में भी पानी का स्तर कम से कम एक फीट नीचे रहे। जलभराव से पान की बेलों को भारी नुकसान हो सकता है।
पान की खेती में ‘बरेजा’ यानी बांस का ढांचा बेहद अहम होता है। इससे बेलों को सहारा मिलता है और छाया भी बनी रहती है, जो पान के नाजुक पत्तों के लिए जरूरी है।
पौध और कलम तैयार करने की प्रक्रियाः पान की खेती के लिए कलम का चयन में सावधानी बरतनी बहुत जरुरी है। हमेशा स्वस्थ और रोग-मुक्त बेलों से ही कलम लें
रोपण से पहले कलमों को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) के घोल में 15 मिनट तक डुबोकर रखें। इससे मानसून के दौरान होने वाले रोगों से बचाव होता है और पौधे स्वस्थ रहते हैं।
रोपण का सही समय और विधिः पान की खेती के लिए रोपण का समय जून–जुलाई (मानसून) और फरवरी–मार्च से अगस्त तक काफी उपर्युक्त मानी गई है। इसकी रोपण की विधि के तहत 2-3 गांठों को मिट्टी में दबाकर लगाएं और हल्की मिट्टी से ढककर सिंचाई करें।
सिंचाई और जल निकासी का महत्वः पान की खेती में पानी की भूमिका बेहद अहम होती है। शुरुआती दिनों में 4 दिन तक दिन में 2–3 बार सिंचाई करनी पड़ सकती है। बाद में मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई करें। अतिरिक्त पानी निकालने के लिए उचित जल निकासी की व्यवस्था अनिवार्य है
पोषण प्रबंधन में जैविक खेती पर दें जोरः मगही पान की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जैविक खाद का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है। गोबर की खाद और कम्पोस्ट से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। रासायनिक उर्वरकों का सीमित और संतुलित उपयोग करें। जैविक और रासायनिक खाद का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
कीट और रोग प्रबंधनः मगही पान कुछ रोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से मध्यम प्रतिरोधी होता है, फिर भी सावधानी जरूरी है। पान की खेती के दौरान फाइटोफ्थोरा यह एक प्रमुख फफूंद जनित रोग है। बचाव के लिए बोर्डो मिश्रण (कॉपर सल्फेट + चूना) का छिड़काव करें। समय-समय पर बेलों की जांच करें
कटाई और प्रसंस्करणः पान की खेती की कटाई बेल लगाने के 180–210 दिन बाद पत्ते तोड़ने योग्य हो जाते हैं। सावधानी से पत्ते तोड़ें ताकि बेल को नुकसान न पहुंचे। पत्तों को 45–50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुखाकर उनकी गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है।
भविष्य की संभावनाएं: मगही पान आज एक बार फिर अपनी पहचान को मजबूत कर रहा है। वैज्ञानिक शोध, बेहतर खेती तकनीक और बढ़ती बाजार मांग ने इसे हरा सोना बना दिया है। अगर सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण, विपणन और निर्यात की बेहतर व्यवस्था की जाए तो मगही पान न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की पहचान बन सकता है।
डॉ. शिवनाथ दास का मानना है कि आने वाले समय में मगही पान प्राकृतिक औषधि, जैविक उत्पाद और निर्यात फसल के रूप में नई ऊंचाइयों को छुएगा। यह न केवल लोगों को स्वस्थ रखेगा, बल्कि किसानों के जीवन में खुशहाली भी लाएगा।
निष्कर्षतः मगही पान स्वाद, सेहत और समृद्धि तीनों का अनूठा संगम है। यह हमारी परंपरा भी है और भविष्य की संभावना भी। अब जरूरत है इसे सही पहचान, सही तकनीक और सही बाजार तक पहुंचाने की।










