
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने पद संभालते ही यह संकेत दे दिया था कि राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी। मंचों से बड़े-बड़े ऐलान हुए सख्त निर्देश जारी किए गए और यह भरोसा दिलाया गया कि मरीजों को राहत मिलेगी तथा लापरवाही पर अब कोई समझौता नहीं होगा।
लेकिन आठ से नौ महीने बाद जब इन घोषणाओं की ज़मीनी पड़ताल की जाती है तो तस्वीर मिली-जुली नज़र आती है। कुछ योजनाएं अनंत पड़ाव पर हैं तो कई अब भी सादे फाइलों और कागजी प्रक्रियाओं के जाल में उलझी हुई हैं।
मई 2025 में स्वास्थ्य मंत्री ने रांची, दुमका, जमशेदपुर और पलामू में ड्रग एंड फूड टेस्टिंग लैब स्थापित करने की घोषणा की थी। उद्देश्य साफ था नकली और घटिया दवाओं व खाद्य पदार्थों पर वैज्ञानिक तरीके से लगाम।
हकीकत यह है कि आठ महीने बीत जाने के बावजूद न भवन का निर्माण शुरू हुआ, न मशीनों की खरीद, और न ही स्टाफ नियुक्ति की कोई ठोस योजना सामने आई। फाइलें अब भी शुरुआती प्रक्रिया में अटकी हैं।
इस पर मंत्री का कहना है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के साथ प्रस्तावित बैठक के बाद इंप्लीमेंटेशन तेज होगा। सवाल यह है कि क्या यह इंतज़ार भी मरीजों की सेहत की कीमत पर ही होगा?
नकली दवाओं पर रोक के लिए बिना क्यूआर कोड दवा बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध का निर्देश दिया गया था। आदेश लागू हुए आठ महीने से अधिक हो चुके हैं, लेकिन अधिकांश मेडिकल दुकानों में आज भी बिना क्यूआर कोड वाली दवाएं बेखौफ बिक रही हैं।
मंत्री का दावा है कि ज़्यादातर दवाएं क्यूआर कोड के साथ बिक रही हैं और जहां उल्लंघन हो रहा है, वहां सूचना मिलने पर कार्रवाई होगी। मगर ज़मीनी सच यह है कि निगरानी तंत्र अब भी कमजोर दिख रहा है।
ग्रामीण और दुर्गम इलाकों के लिए 200 बाइक एंबुलेंस की घोषणा को स्वास्थ्य सेवा में क्रांतिकारी कदम बताया गया था। इससे दूर-दराज़ के मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की बात कही गई थी।
स्थिति यह है कि न टेंडर निकला, न खरीद हुई और न ही एक भी बाइक एंबुलेंस सड़कों पर उतरी। ग्रामीण इलाकों में आपात सेवाएं आज भी पुराने साधनों के सहारे चल रही हैं।
मंत्री का तर्क है कि कुछ जगहों पर डीटीओ की सहमति न मिलने से अड़चन आई, हालांकि वैद्यनाथ धाम जैसे क्षेत्रों में आंशिक पहल की गई है।
रिम्स में इलाज के दौरान मरीज की मौत होने पर परिजनों को तत्काल 5 हजार रुपये सहायता राशि देने का निर्देश दिया गया था। इसे संवेदनशील और मानवीय कदम माना गया।
छह महीने बीत जाने के बावजूद न कोई स्पष्ट गाइडलाइन बनी, न ही किसी परिजन को यह राशि मिली। मंत्री का कहना है कि रिम्स स्तर पर गाइडलाइन तैयार की जा रही है और जल्द प्रक्रिया पूरी होगी।
सभी घोषणाएं अधर में ही नहीं हैं। सदर अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट के लिए 7 करोड़ रुपये स्वीकृत हो चुके हैं। वहीं सभी जिलों में ब्लड कंपोनेंट एंड सेपरेशन यूनिट के लिए 19 करोड़ की मंजूरी दी गई है, जिससे दो-तीन माह में यह सुविधा शुरू होने की उम्मीद है।
इसके अलावा थैलेसिमिया पीड़ितों के लिए आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज की सीमा बढ़ाकर 15 लाख रुपये करना भी एक सकारात्मक पहल मानी जा रही है।
निजी अस्पतालों द्वारा बकाया बिल के नाम पर शव रोकने की शिकायतों पर मंत्री ने सख्त आदेश दिया था कि किसी भी हाल में शव बंधक नहीं बनाया जाएगा। हालांकि आदेश जारी होने के बाद भी जमीनी हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा। आज भी ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां परिजन अस्पताल के बाहर असहाय खड़े नज़र आते हैं।
डॉ. इरफान अंसारी की मंशा और घोषणाओं पर सवाल नहीं, लेकिन अमल की रफ्तार पर ज़रूर सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ योजनाएं अनंत चरण में हैं, पर कई अहम निर्देश अब भी फाइलों में कैद हैं। झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए यह समय केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि तेज़, पारदर्शी और ज़मीनी क्रियान्वयन का है। क्योंकि देरी की कीमत अंततः आम गरीब मरीज ही चुकाते हैं।










