मिलीभगतः कैमूर अभयारण्य की जमीन की रजिस्ट्रारी और दाखिल-खारिज तक हो गई!

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। बिहार के कैमूर जिले में सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही और संभावित मिलीभगत को उजागर करता एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भगवानपुर अंचल अंतर्गत कैमूर वन्यजीव अभयारण्य (सेंचुरी) क्षेत्र की 62.5 डिसमिल सुरक्षित वन भूमि को न केवल निजी व्यक्तियों के बीच बेच दिया गया, बल्कि निबंधन कार्यालय में उसकी विधिवत रजिस्ट्री कर अंचल स्तर से दाखिल–खारिज भी कर दिया गया।
हैरानी की बात यह है कि मामला उजागर होने और वन विभाग द्वारा नोटिस भेजे जाने के बावजूद जिला अवर निबंधन पदाधिकारी और अंचलाधिकारी भगवानपुर ने अब तक चुप्पी साध रखी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवानपुर अंचल के चुआं मौजा में स्थित थाना संख्या 912, खाता संख्या 19 और खेसरा प्लॉट संख्या 289 की यह भूमि पहले से ही सुरक्षित वन एवं आश्रयणी क्षेत्र घोषित है। इसके बावजूद 5 जनवरी 2022 को भभुआ निबंधन कार्यालय में विक्रम पत्र संख्या 61/2022 के तहत इस जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई।
जमीन बेचने वाले अखलासपुर गांव निवासी स्वर्गीय लोचन पाल के पुत्र शिवनाथ पाल, श्रीराम दाहिनपाल और श्रीराम भजन पाल बताए गए हैं। जबकि खरीदार भगवानपुर थाना क्षेत्र के उमापुर गांव के सतीश कुमार और सुनील कुमार सिंह हैं।
इस अवैध सौदे का खुलासा चार महीने पहले तब हुआ, जब भगवानपुर थाना क्षेत्र के अवसान गांव निवासी धीरेंद्र पाल ने 8 सितंबर 2025 को जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी को शिकायत पत्र सौंपा। शिकायत के बाद कराई गई जांच में आरोप सही पाए गए। जांच में स्पष्ट हुआ कि वन विभाग की जमीन न केवल बेची गई, बल्कि अंचल कार्यालय से उसका दाखिल-खारिज भी कर दिया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी ने 20 सितंबर 2025 को जिला अवर निबंधन पदाधिकारी भभुआ और अंचलाधिकारी भगवानपुर को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने और आवश्यक कार्रवाई की जानकारी मांगी। लेकिन दोनों अधिकारियों ने न तो जवाब दिया और न ही किसी तरह की कार्रवाई की सूचना दी। इसके बाद वन विभाग ने पूरे मामले में दोषी कर्मियों पर कार्रवाई, अवैध निबंधन और दाखिल–खारिज को रद्द कराने के लिए जिला पदाधिकारी को पत्र भेजा है।
जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी संजीव रंजन ने बताया कि वन विभाग की जमीन की बिक्री की जानकारी मिलते ही संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखा गया था, लेकिन अब तक न कोई जवाब मिला और न ही कार्रवाई की सूचना दी गई। इसलिए पूरे प्रकरण को लेकर जिला पदाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
अब सवाल यह है कि अभयारण्य जैसी संवेदनशील भूमि की रजिस्ट्री और दाखिल–खारिज बिना किसी आपत्ति के कैसे हो गई। क्या यह महज प्रशासनिक चूक है या इसके पीछे सुनियोजित खेल? इस प्रकरण ने न केवल वन संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि निबंधन और अंचल कार्यालयों की भूमिका को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।










