झारखंड हाइकोर्ट ने 26 जनवरी तक चना दाल वितरण करने का दिया आदेश

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मिलनेवाली अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पिछले एक साल से ठप पड़ी हुई है। इसका सीधा असर राज्य के 68 लाख से अधिक गरीब परिवारों पर पड़ा है। इन परिवारों को पिछले वर्ष से दाल और चीनी न तो नियमित रूप से मिली और न ही धोती-साड़ी योजना का लाभ पूरी तरह मिल पाया।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि राज्य की सबसे कमजोर वर्ग की आबादी, जो सरकार की इन योजनाओं पर निर्भर है, एक साल से बुनियादी खाद्य सुरक्षा से वंचित रही है। दाल, चीनी और कपड़ों की आपूर्ति में विलंब की मुख्य वजह टेंडर प्रक्रिया की तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताएं बताई जा रही हैं।

दाल वितरण में देरी: प्रक्रिया और कारणः राज्य सरकार की ओर से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) और झारखंड राज्य खाद्य सुरक्षा योजना के तहत प्रत्येक गरीब परिवार को प्रति माह एक किलो चना दाल मुफ्त देने का प्रावधान है। इस योजना के अंतर्गत 68 लाख परिवार लाभान्वित होते हैं। लेकिन पिछले एक साल में केवल मई महीने में ही दाल वितरण संभव हो सका, और वह भी केवल एक महीने के लिए।

दरअसल, पहले केंद्र सरकार की ओर से सब्सिडी पर चना खरीदा जाता था और नाफेड के माध्यम से राज्य को प्रोसेसिंग के बाद आपूर्ति दी जाती थी। जब केंद्र की ओर से चना उपलब्ध कराने से इनकार किया गया तो राज्य सरकार ने टेंडर प्रक्रिया अपनाई।

शुरुआत में एल-वन, एल-टू और एल-श्री कंपनियों के बीच वितरण का प्रतिशत 50:30:20 तय किया गया था। बाद में संशोधन कर एल-वन कंपनी को पूरा कार्यादेश देने का निर्णय लिया गया। इस बदलाव और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण दाल वितरण में लंबा अंतराल पैदा हुआ।

चीनी की आपूर्ति में अड़चनें: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना से जुड़े 8.92 लाख परिवारों को प्रति माह एक किलो चीनी अनुदानित दर पर देने का प्रावधान है। लेकिन चीनी की आपूर्ति एक साल तक शुरू ही नहीं हो सकी।

इसमें मुख्य बाधा रही सिंगल टेंडर प्रक्रिया। निविदा के अनुसार, चीनी को ब्लॉक स्तर तक पहुंचाना अनिवार्य है, जबकि दूरदराज के क्षेत्रों में लाभुकों की संख्या कम होने के कारण ट्रांसपोर्टेशन लागत अधिक होती है। इसके अलावा बाजार में चीनी की खरीद नगद होती है, और सरकार को आपूर्ति पूरी होने के 60 दिन बाद भुगतान मिलता है।

हाल ही में छह कंपनियों ने निविदा में भाग लिया, लेकिन जांच में केवल एक कंपनी के दस्तावेज सही पाए गए। इसके चलते टेंडर फिर सिंगल टेंडर की पेंच में फंस गया।

धोती-साड़ी योजना की हकीकतः सोना सोबरन योजना के तहत प्रत्येक गरीब परिवार को साल में दो बार मात्र 10 रुपये में एक धोती-लुंगी और एक साड़ी मिलती है। लेकिन पिछले वर्ष सरकार ने केवल एक बार वितरण किया, जिसमें 56.23 लाख लाभुकों को ही लाभ मिला। इसके अलावा 11.79 लाख परिवार ऐसे थे, जिन्हें वर्षभर धोती-साड़ी नहीं मिल पाई।

धोती-साड़ी वितरण में भी टेंडर प्रक्रिया, तकनीकी खामियां और छोटी कंपनियों का हिस्सा न ले पाना मुख्य वजह रही। अब दूसरी छमाही के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है और वितरण जल्द ही शुरू होगा।

अधिकारियों के बयानः झारखंड राज्य खाद्य एवं असैनिक आपूर्ति निगम लिमिटेड के निदेशक दिलीप तिर्की  के अनुसार कि दाल वितरण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और चयनित कंपनी को आपूर्ति का आदेश जारी किया गया है। फरवरी से दाल का वितरण शुरू हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि धोती-साड़ी वितरण की प्रक्रिया भी अंतिम चरण में है। पिछले वर्ष की दूसरी छमाही के लिए जो लाभुक वंचित रह गए थे, उनका वितरण फरवरी से शुरू होगा। वितरण से पहले गुणवत्ता की जांच की जाएगी ताकि लाभुकों को मानक के अनुरूप सामग्री मिले।

चीनी की आपूर्ति अभी भी सिंगल टेंडर में उलझी है। निदेशक ने बताया कि इस बार छह कंपनियों ने निविदा में भाग लिया, लेकिन केवल एक कंपनी के दस्तावेज सही पाए गए। इसलिए विभाग इस मामले में मंतव्य लेकर आगे कार्रवाई करेगा।

झारखंड हाइकोर्ट की सक्रियताः पीडीएस में चना दाल की कमी को लेकर प्रकाशित खबर को झारखंड हाइकोर्ट ने गंभीरता से लिया और इसे जनहित याचिका (PIL) में तब्दील कर दिया।

16 जनवरी को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह चना दाल का वितरण 26 जनवरी तक शुरू कराए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वितरण प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि खाद्य सामग्री उन जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके जो इसे बाजार दरों पर खरीदने की स्थिति में नहीं हैं। साथ ही अदालत ने सरकार से कहा कि ऐसी स्थिति भविष्य में कभी दोहराई न जाए।

गरीबों की पीड़ा और समाज पर असरः झारखंड में पीडीएस से वंचित गरीब परिवारों की संख्या इतनी अधिक है कि इसका सामाजिक और आर्थिक असर भी व्यापक है। दाल और चीनी जैसे बुनियादी खाद्य पदार्थों की कमी से पोषण स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वहीं धोती-साड़ी योजना का ठप होना भी सामाजिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंता का विषय है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आपूर्ति में देरी केवल प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से नहीं है, बल्कि आपूर्तिकर्ताओं की गुणवत्ता जांच और टेंडर में नियमों की जटिलताएं भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।

हाईकोर्ट ने जगाई उम्मीद की किरणः हालांकि अधिकारियों ने कहा है कि फरवरी से दाल और धोती-साड़ी वितरण शुरू हो जाएगा, लेकिन चीनी की आपूर्ति अभी भी अटका हुआ मामला है। हाइकोर्ट के निर्देशों के बाद सरकार पर दबाव बढ़ गया है और राज्य प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि वितरण प्रणाली अब नियमित और पारदर्शी बने।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह योजनाएं नियमित रूप से लागू हो जाएं तो झारखंड के गरीब परिवारों को बुनियादी खाद्य और वस्त्र सुरक्षा मिलेगी, जिससे उनकी जीवन-स्तर में सुधार संभव होगा।

झारखंड में गरीब परिवारों के लिए पीडीएस की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना अब प्रशासन और सरकार की प्राथमिकता बन गई है। दाल, चीनी और धोती-साड़ी वितरण में पिछले साल की बाधाओं को देखते हुए यह स्पष्ट है कि टेंडर प्रक्रिया में सुधार, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और गुणवत्ता नियंत्रण बेहद जरूरी हैं।

26 जनवरी तक दाल वितरण शुरू करने के हाइकोर्ट के निर्देश ने सरकार को सतर्क कर दिया है। अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन गरीबों की बुनियादी जरूरतों को समय पर पूरा करने में कितनी गंभीरता दिखाता है।

गरीब परिवारों के लिए यह इंतजार केवल महीनों का नहीं, बल्कि एक साल से अधिक का संघर्ष रहा है। इस बार दाल, चीनी और धोती-साड़ी की आपूर्ति का नियमित होना उनके जीवन में राहत की उम्मीद लेकर आएगा।

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