
पटना / राजगीर (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। बिहार के नालंदा जिले के प्रसिद्ध धार्मिक नगरी राजगीर स्थित दिगंबर जैन धर्मशाला से सामने आए चार लोगों की संदिग्ध मौत का मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, अपराधबोध, सामाजिक कलंक और धार्मिक आस्था के जटिल ताने-बाने को उजागर करता एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।
शुक्रवार की सुबह जब धर्मशाला के कमरे संख्या 6-AB का दरवाज़ा तोड़ा गया तो अंदर का दृश्य न केवल पुलिस बल्कि वहां मौजूद हर व्यक्ति को झकझोर देने वाला था। एक ही परिवार के चार सदस्य फंदे से लटके हुए पाए गए, जिनमें से तीन के हाथ पीछे बंधे थे और मुंह पर सेलो टेप चिपका हुआ था। यह दृश्य अपने-आप में इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या यह सामूहिक आत्महत्या थी या फिर सुनियोजित हत्या?
बदबू से खुला रहस्य का दरवाज़ाः
राजगीर दिगंबर जैन धर्मशाला में यह परिवार 31 जनवरी 2026 को ठहरा था। धर्मशाला के रजिस्टर के अनुसार उन्होंने तीन दिनों तक बाहर निकलकर भोजन या किसी सेवा का उपयोग नहीं किया।
शुक्रवार सुबह जब कमरे से तेज़ दुर्गंध आने लगी, तब धर्मशाला कर्मियों को अनहोनी की आशंका हुई। कई बार दरवाज़ा खटखटाने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला। अंततः स्थानीय प्रशासन और पुलिस को सूचना दी गई।
दरवाज़ा तोड़ते ही सामने आया दृश्य इतना भयावह था कि कुछ पल के लिए पुलिस भी स्तब्ध रह गई। चारों शव एक ही कमरे में अलग-अलग स्थानों पर फंदे से लटके हुए थे।
एक परिवार का दर्दनाक अंतः
पुलिस जांच में मृतकों की पहचान कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी क्षेत्र के निवासी जी.आर. नागा प्रसाद (50 वर्ष), जी.आर. सुमंगला (78 वर्ष) नागा प्रसाद की मां, शिल्पा जी.आर. (48 वर्ष) बहन, श्रुता जी.बी. (43 वर्ष) बहन के रूप में हुई।
चारों एक ही परिवार से थे और धार्मिक यात्रा पर निकले थे। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार परिवार नेपाल के कुछ तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुका था और राजगीर से आगे पावापुरी जाने की योजना थी।
कमरे के भीतर मिले साक्ष्य: आत्महत्या या साजिश?
कमरे की तलाशी में पुलिस को कई अहम सुराग मिले, जो इस मामले को और अधिक रहस्यमय बनाते हैं। लगभग ₹1,18,000 नकद, चारों के मोबाइल फोन, पहचान से जुड़े दस्तावेज, करीब 25 स्ट्रिप नींद की गोलियां, कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद, कोई जबरन घुसपैठ का स्पष्ट संकेत नहीं।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि तीन शवों के हाथ पीछे बंधे थे। मुंह पर सेलो टेप चिपका हुआ था। यही बिंदु इस पूरे मामले को साधारण सामूहिक आत्महत्या की थ्योरी से अलग करता है।
नागा प्रसाद का अतीत: हत्या का आरोप और अपराधबोधः
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे एक ऐसा तथ्य सामने आया जिसने पूरे केस को नया मोड़ दे दिया। जी.आर. नागा प्रसाद पर वर्ष अगस्त 2025 में अपने 14 वर्षीय भांजे ओमकृति की हत्या का आरोप लगा था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार ओमकृति मोबाइल गेम Free Fire का आदी था। वह लगातार पैसों की मांग करता था। इसी बात पर हुए विवाद में नागा प्रसाद ने उसकी हत्या कर दी। बाद में उन्होंने आत्महत्या का प्रयास भी किया, लेकिन बच गए।
कुछ समय बाद उन्हें जमानत मिल गई। यह घटना पूरे परिवार के लिए सामाजिक और मानसिक रूप से बेहद आघातकारी थी।
क्या अपराधबोध ने ली चार जानें? मनोवैज्ञानिक विश्लेषणः
मनोचिकित्सकों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि हत्या के आरोप के बाद परिवार गंभीर मानसिक तनाव में था। सामाजिक बदनामी और कानूनी प्रक्रिया ने उन्हें अलग-थलग कर दिया। धार्मिक यात्रा अक्सर आत्मशुद्धि और मोक्ष की खोज से जुड़ी होती है। अपराधबोध से ग्रस्त व्यक्ति कभी-कभी पूरे परिवार को साथ लेकर “अंतिम निर्णय” ले लेता है। हालांकि, बंधे हुए हाथ और टेप लगे मुंह इस सिद्धांत को चुनौती देते हैं।
हत्या की आशंका: क्या कोई तीसरा व्यक्ति शामिल?
पुलिस हत्या की संभावना से भी इंकार नहीं कर रही। जांच के प्रमुख बिंदु क्या सभी ने स्वेच्छा से फंदा लगाया? क्या नींद की गोलियां जबरन दी गईं? क्या कोई बाहरी व्यक्ति कमरे में आया? CCTV फुटेज में आखिरी बार कौन आया-गया?
हालांकि अब तक जबरन घुसपैठ का कोई ठोस सबूत पुलिस को नहीं मिला है।
SIT और फॉरेंसिक जांच: सच्चाई की परतें खुलेंगीः
नालंदा पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है। जांच के मुख्य बिंदु पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की जांच, मोबाइल कॉल डिटेल और चैट, नींद की गोलियों की मात्रा, CCTV फुटेज का फ्रेम-टू-फ्रेम विश्लेषण आदि शामिल हैं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार पोस्टमार्टम रिपोर्ट इस केस की दिशा तय करेगी।
धार्मिक स्थल पर सुरक्षा पर सवालः
राजगीर जैसे अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्थल पर इस तरह की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। धर्मशालाओं में निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? लंबे समय तक कमरा बंद रहने पर कोई अलर्ट सिस्टम क्यों नहीं? तीर्थयात्रियों के मानसिक स्वास्थ्य की कोई निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं?
जैन समुदाय और स्थानीय नागरिकों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश और दुख है।
मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने की कीमतः
यह मामला हमें एक कड़वा सच याद दिलाता है कि अपराध केवल अदालत में नहीं, मन में भी सजा देता है। अगर समय रहते मानसिक स्वास्थ्य सहायता, काउंसलिंग और सामाजिक समर्थन मिला होता तो शायद यह त्रासदी टल सकती थी।
अभी बाकी है सच्चाई का खुलासाः
राजगीर दिगंबर जैन धर्मशाला की यह घटना अभी भी हत्या और सामूहिक आत्महत्या के बीच झूलती एक रहस्यमय पहेली है। क्या यह अपराधबोध से उपजा अंतिम निर्णय था? या किसी ने विश्वास का फायदा उठाकर चार जिंदगियां छीन लीं? इन सवालों के जवाब पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट के बाद ही मिलेंगे।
✍️ स्रोतः एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क के लिए मुकेश भारतीय का विश्लेषण





