Home चुनाव डेस्क घाटशिला उपचुनाव: मुद्दों की अनदेखी में सहानुभूति और प्रतिष्ठा की अनोखी जंग

घाटशिला उपचुनाव: मुद्दों की अनदेखी में सहानुभूति और प्रतिष्ठा की अनोखी जंग

Ghatsila by-election A unique battle for sympathy and prestige while issues are ignored

घाटशिला (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज/मुकेश भारतीय)। झारखंड की राजनीतिक धरती पर घाटशिला विधानसभा सीट का उपचुनाव एक अनोखी पटकथा रच रहा है। जहां एक ओर बेरोजगारी की चरम स्थिति, पर्यटन की सोई हुई संभावनाएं, शिक्षा का संकट और जल संकट जैसे ज्वलंत मुद्दे जनता को चैन नहीं लेने दे रहे, वहीं चुनावी मैदान में ये सब गौण हो चुके हैं। यहां की सियासी बिसात पर सहानुभूति, आदिवासी अस्मिता और राष्ट्रवाद जैसे भावनात्मक मोहरे चल रहे हैं।

पूर्व मंत्री दिवंगत रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश सोरेन (झामुमो) सहानुभूति की लहर पर सवार हैं तो भाजपा के बाबूलाल सोरेन की उम्मीदें पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की प्रतिष्ठा से जुड़ी हैं। बीच में जेएलकेएम के रामदास मुर्मू त्रिकोणीय मुकाबले को तीखा बनाने की कोशिश में लगे हैं। 13 प्रत्याशियों के बीच यह जंग न सिर्फ स्थानीय राजनीति की दिशा तय करेगी, बल्कि झारखंड-ओडिशा की सीमावर्ती सियासत को नया रंग भी देगी।

चुनावी हवा में मुद्दों की जगह भावनाओं का राज क्यों? पूर्वी सिंहभूम जिले का हरा-भरा इलाका घाटशिला सुंदरवन जैसी वादियां पर्यटकों को लुभाती हैं, आज बेरोजगारी के बोझ तले दबा है। स्थानीय युवा रोजगार के नाम पर दिल्ली-मुंबई की ओर पलायन कर रहे हैं। पांच खदानों में से सिर्फ सुरदा ही चालू है, बाकी बंद पड़ीं।

एकमात्र डिग्री कॉलेज में छात्रों की संख्या शिक्षकों से कहीं ज्यादा, जिससे पढ़ाई का स्तर लुढ़क गया है। और सबसे बड़ा संकट स्वच्छ पेयजल का। सौ करोड़ की कुलियाना बड़ी जलापूर्ति योजना का प्रस्ताव वर्षों से कागजों पर धूल खा रहा है। सिर्फ कुछ जगहों पर पाइप बिछे हैं, बाकी कुछ नहीं। इन 22 पंचायतों और शहर की लाखों आबादी को नल का पानी तो सपना ही लगता है।

फिर भी मतदाता इन मुद्दों पर सवाल नहीं उठा रहे। प्रत्याशी भी चुप्पी साधे हैं। क्यों? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां वोटरों का मन भावनाओं से जल्दी पिघलता है। चुनाव से ठीक पहले जिनकी झोली ज्यादा खुलेगी, वही जीत की दौड़ में आगे होगा।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह उपचुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक है। पहली बार दो मौजूदा मुख्यमंत्री झारखंड के हेमंत सोरेन और ओडिशा के मोहन चरण मांझी, चार पूर्व मुख्यमंत्रियों बाबूलाल मरांडी, रघुवर दास, मधु कोड़ा और चंपई सोरेन के साथ दर्जन भर सांसद-विधायक प्रचार के लिए मैदान में उतर आए हैं। लेकिन जनता उनकी बातें सुन तो रही है, पर वोट का फैसला आखिरी घड़ी में होगा।

घाटशिला की सियासत में सोरेन परिवार का नाम गूंजता रहा है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। 2024 के आम चुनाव में झामुमो के राम दास सोरेन ने 98,356 वोटों के साथ जीत हासिल की, जबकि भाजपा के बाबूलाल सोरेन 75,910 वोटों पर सिमट गए।

2019 में भी झामुमो का जलवा बरकरार रहा। राम दास सोरेन ने 63,531 वोट लाकर भाजपा के लखन चंद्र मार्डी (56,807 वोट) को हराया। लेकिन 2014 में भाजपा ने कमबैक किया। लक्ष्मण टुडू ने 52,506 वोटों से जीत दर्ज की, जबकि झामुमो के राम दास सोरेन 46,103 वोटों पर रह गए।

अब उपचुनाव में राम दास सोरेन के निधन से खाली सीट पर उनके पुत्र सोमेश सोरेन मैदान में हैं। सोमेश की सबसे बड़ी पूंजी पिता की विरासत और सहानुभूति। झामुमो कार्यकर्ता कहते हैं कि राम दास दा की कमी तो पूरी नहीं हो सकती, लेकिन सोमेश उनके सपनों को साकार करेंगे।

दूसरी ओर, भाजपा के बाबूलाल सोरेन के लिए यह जंग पिता चंपई सोरेन की इज्जत की है। चंपई सोरेन ने पार्टी हाईकमान से आग्रह किया था कि बेटे को टिकट मिले। 2024 में हार के बावजूद भाजपा ने पुराने दावेदारों को दरकिनार कर फिर बाबूलाल पर दांव लगाया। राष्ट्रीय नेताओं ने आदिवासी वोटरों में पैठ बनाने के लिए चंपई की हर बात मानी।

जेएलकेएम के रामदास मुर्मू तीसरा पहलू हैं। वे आरक्षण मुद्दे को हवा देकर झामुमो-भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं। उनकी नजर में यह चुनाव आदिवासी अस्मिता का है, न कि सत्ता का।  जानकारों का अनुमान है कि उनका वोट शेयर 10-15 फीसदी रह सकता है, जो मुकाबले को रोमांचक बना देगा।

फिलहाल प्रचार का ग्राफ चढ़ता जा रहा है। हेमंत सोरेन झामुमो के लिए घर-घर पहुंच रहे हैं तो ओडिशा के सीएम मोहन चरण मांझी सीमावर्ती इलाकों में भाजपा का पक्ष मजबूत कर रहे। पूर्व सीएम रघुवर दास और बाबूलाल मरांडी राष्ट्रवाद का राग अलाप रहे हैं। मधु कोड़ा और चंपई सोरेन स्थानीय मुद्दों को छूते हुए भावनाओं को जगाने में जुटे हैं। हालांकि यहां का वोटिंग ट्रेंड दिखाता है कि अंतिम समय में ‘झोली खोलने’ वाला ही बाजी मारता है।

कुल मिलाकर यह उपचुनाव झारखंड की राजनीति का आईना है, जहां विकास के वादे कागजों पर रह जाते हैं और भावनाएं वोट चुरा लेती हैं। रुझान बताते हैं कि मार्जिन बेहद करीबी रहेगा। क्या सोमेश की सहानुभूति जीतेगी, बाबूलाल की प्रतिष्ठा बचेगी या मुर्मू सेंध लगा देंगे? घाटशिला की सड़कों पर सवाल गूंज रहे हैं, लेकिन जवाब मतपेटी ही देगी।

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