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आयरन लेडी इंदिरा गांधी की राह पर राहुल गांधी, कांग्रेस के कब बहुरेगें दिन?

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क। लगभग आधी सदी पहले कांग्रेस ने जब महज 154 सीटों पर परचम लहराया था, उस वक्त इंदिरा गांधी जिन्हें आयरन लेडी कहा जाता था, वे कांग्रेस को टूटने ने नहीं बचा पाईं थीं, उससे उलट 2014 में सिर्फ 44 और 2019 के आम चुनावों में 52 सीटों पर परचम लहराने के बाद भी कांग्रेस जर्जर जरूर महसूस हो रही है, किन्तु कांग्रेस टूटने से बच चुकी है।

आज कांग्रस के नेताओं में भले ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने की होड़ सी मच चुकी है, पर कांग्रेस में विभाजन की स्थिति दिखाई नहीं दे रही है, जो राहुल गांधी के लिए सुखद संकेत मानी जा सकती है।

इतिहास पर अगर गौर फरमाया जाए तो सन 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन सूरत में हुआ जिसमें कांग्रेस गरम दल और नरम दल नामक दो दलों में बंट गयी। इसी को सूरत विभाजन कहते हैं। 1907 के अधिवेशन की अध्यक्षता रास बिहारी घोष ने की थी।

देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस में सबसे ज्यादा फूट पड़ी। आजादी के उपरांत से 2016 तक कांग्रेस छोड़ने वाले नेता 61 नई राजनीतिक पार्टी शुरू कर चुके हैं। आजादी के बाद कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं ने 1951 में तीन नई पार्टी खड़ी की। इसमें जीवटराम कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी, तंगुतूरी प्रकाशम और एनजी रंगा ने हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी और नरसिंह भाई ने सौराष्ट्र खेदूत संघ नाम से अलग राजनीतक दल शुरू की।

इसमें हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी का विलय किसान मजदूर प्रजा पार्टी में हो गया। बाद में किसान मजदूर प्रजा पार्टी का विलय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और सौराष्ट्र खेदूर संघ का विलय स्वतंत्र पार्टी में हो गया।

इतिहास खंगालने पर आप पाएंगे कि आजादी के आठ सालों के उपरांत 1956 से 1970 तक 12 नए दलों का गठन हुआ। इसमें कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे सी. राजगोपालाचारी ने 1956 में पार्टी छोड़ दी थी। राजगोपालाचारी ने पार्टी छोड़ने के बाद इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स कांग्रेस पार्टी की स्थापना की।

यह अलहदा बात है कि उनकी यह पार्टी मद्रास तक ही सीमित रही। हालांकि, बाद में राजगोपालाचारी ने एनसी रंगा के साथ 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना कर ली और इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक्स पार्टी का इसमें विलय कर दिया।

वहीं, स्वतंत्र पार्टी का फोकस बिहार, राजस्थान, गुजरात, ओडिशा और मद्रास पर ज्यादा केंद्रित था। 1974 में स्वतंत्र पार्टी का विलय भी भारतीय क्रांति दल में हो गया था। इसके अलावा 1964 में केएम जॉर्ज ने केरल कांग्रेस नाम से नई पार्टी का गठन कर दिया।

हालांकि, बाद में इस पार्टी से निकले नेताओं ने अपनी सात अलग-अलग पार्टी खड़ी कर ली। 1966 में कांग्रेस छोड़ने वाले हरेकृष्णा मेहताब ने ओडिशा जन कांग्रेस की स्थापना की। बाद में इसका विलय जनता पार्टी में हो गया।

कांग्रेस में एक समय ऐसा भी आया जब कांग्रेस की आयरन लेडी मानी जाने वाली इंदिरा गांधी को ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। यह बात 12 नवंबर 1969 की है। उस वक्त कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा गांधी पर अनुशासन भंग करने का संगीन आरोप लगा था।

इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने नई कांग्रेस पार्टी की नींव रखी और इस नई पार्टी को कांग्रेस आर नाम दिया। इंदिरा गांधी से मतभिन्नता और विवाद के चलते ही के. कामराज और मोरारजी देसाई ने इंडियन नेशनल कांग्रेस ऑर्गेनाइजेशन नाम से अलग पार्टी बनाई थी। बाद में इसका विलय जनता पार्टी में हो गया।

इसके अलावा 1969 में ही बीजू पटनायक ने ओडिशा में उत्कल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में मैरी चेना रेड्डी ने तेलंगाना प्रजा समिति का गठन किया। इसी तरह 1978 में इंदिरा ने कांग्रेस आर छोड़कर एक नई पार्टी का गठन किया।

इसे कांग्रेस आई (उस वक्त इसे इंदिरा कहा जाता था) नाम दिया। एक साल बाद यानी 1979 में डी देवराज अर्स ने इंडियन नेशनल कांग्रेस यूआरएस नाम से पार्टी का गठन किया। देवराज की पार्टी अब अस्तित्व में नहीं है।

कांग्रेस पार्टी में फूट इसके बाद भी थम नहीं सकी। 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। इसके एक साल बाद ही 1999 में कांग्रेस के क्षत्रप शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन कर लिया था। अब इसे एनसीपी या हिंदी में राकांपा के नाम से जाना जाता है। कांग्रेस में अंतिम बार फूट 2016 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े नेता रहे अजीत जोगी ने पार्टी छोड़कर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस नाम से नया दल बना लिया था।

2016 के बाद भले ही कांग्रेस को जनाधार वाली पार्टी कहा जाता है, किन्तु उसे केंद्र में बहुमत हासिल नहीं हुआ, एक के बाद एक कांग्रेस के हाथ से राज्य भी फिसलते गए पर कांग्रेस में स्थिरता कायम रही। राहुल गांधी के खाते में कम से कम एक उपलब्धि तो जाती है कि पिछले आठ सालों में कांग्रेस में दो फाड नहीं हुए हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी बार बार यह कहते हैं कि जिसे जाना है वह जाए, जिसे रहना है वह रहे, उसके बाद कांग्रेस के नेताओं का कांग्रेस से पलायन तो आरंभ हुआ किन्तु कांग्रेस टूटी नहीं। राहुल गांधी के द्वारा कांग्रेस की कमान प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर संभालने के बाद भी कांग्रेस का आम कार्यकर्ता उनके साथ शिद्दत के साथ खड़ा दिखाई देता है, जो बहुत बड़ी उपलब्धि से कम नहीं माना जा सकता है।

पिछले दो दशकों में राहुल गांधी के द्वारा किए गए तमाम प्रयोगों के बाद भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की आस्था आज भी कांग्रेस, सोनिया गांधी और राहुल गांधी में वैसे ही दिखाई दे रही है जैसी कि पहले थी।

2014 के आम चुनावों के पहले तक कांग्रेस का जलजला केंद्र और राज्यों में देखते ही बनता था। दस सालों में कांग्रेस के नेताओं की चुप्पी बहुत ही रहस्यमय मानी जा सकती है। कांग्रेस के नेता आम जनता के हितों की बातें सड़कों पर करते नजर आते हैं।

किन्तु सक्षम मंच लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा आदि में विरोध के नाम पर सबसे आसान अस्त्र बर्हिगमन को अपनाकर नेता उन्हें मिले जनादेश के उजाले को अंधकार की काल कोठरी में दफन कर देते हैं। होना यह चाहिए कि बजाए बर्हिगमन के नेताओं को सदन में अपनी बात वजनदारी के साथ रखना चाहिए।

सियासी पण्डित इस बात पर भी आश्चर्य करते हैं कि आखिर वे क्या वजहें हैं जिनके चलते 2014 में सिर्फ 44 और 2019 में महज 52 सीटों पर परचम लहराने वाली कांग्रेस के अनेक धुरी थामे नेताओं के बाद भी यह टूटने से कैसे बच गई!

आखिर कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ उस तरह का ज्वार क्यों नहीं उठा जो चार दशकों पहले इंदिरा गांधी के खिलाफ उठा था। जाहिर है कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का भरोसा राहुल गांधी पर आज भी उसी तरह कायम है जिस तरह पहले था।

जब इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता पार्टी ने सख्त रवैया अपनाया था, उस वक्त इंदिरा गांधी के करीबी लोग उन्हें छोड़कर चले गए थे। कमोबेश आज यही आलम राहुल गांधी के साथ दिखाई दे रहा है। अनेक विश्वस्त और नजदीकी लोग राहुल गांधी के इर्द गिर्द दिखाई भी नहीं पड़ते।

सोशल मीडिया का दौर है, सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के वक्तव्यों को जिस तरह कथित तौर पर एडिट कर दिखाया जाता रहा है उसकी काट के रूप में कांग्रेस की आईटी सेल आक्रमक रूख अख्तियार क्यों नहीं कर पाई।

आखिर क्या वजह है कि जिला स्तर के पदाधिकारियों के द्वारा अपने क्षेत्र के सत्ताधारी सांसद और विधायकों को घेरने के बजाए सीधे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्रियों पर निशाना साधा जाता है। इन सारी बातों पर कांग्रेस के नेतृत्व को गौर करने की महती जरूरत महसूस हो रही है।

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