विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और मोबाइल जैसे तकनीक का संतुलित उपयोग ही सफलता की कुंजी है। शांभवी का उदाहरण इस संतुलन का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है…
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड ने एक बार फिर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस वर्ष आईएससी (12वीं) और आईसीएसई (10वीं) परीक्षा परिणामों में राज्य के विद्यार्थियों ने न केवल उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
सबसे बड़ी उपलब्धि जमशेदपुर की शांभवी तिवारी के नाम रही, जिन्होंने 12वीं (आईएससी) परीक्षा में 100 प्रतिशत अंक हासिल कर नेशनल टॉपर बनने का गौरव प्राप्त किया। यह उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि उस सोच का भी प्रमाण है जो आज के डिजिटल युग में अलग राह चुनने का साहस रखती है।
जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित सेक्रेड हार्ट कॉन्वेंट स्कूल की छात्रा शांभवी तिवारी की सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने आधुनिक डिजिटल विचलनों से खुद को पूरी तरह दूर रखा।
शांभवी न तो किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं और न ही उनके पास अपना निजी मोबाइल फोन है। जरूरत पड़ने पर वह अपने परिवार के सदस्यों का फोन उपयोग करती हैं। यूट्यूब का इस्तेमाल भी उन्होंने केवल पढ़ाई से जुड़े लेक्चर सुनने के लिए किया।
उनके शब्दों में, “मेरी दुनिया मेरे परिवार, मेरी किताबें, संगीत और फिल्में हैं।” यह बयान आज के उस दौर में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां अधिकांश छात्र डिजिटल माध्यमों में उलझकर अपनी एकाग्रता खो देते हैं।
शांभवी ने अपनी सफलता का श्रेय शिक्षकों के मार्गदर्शन और नियमित अध्ययन को दिया। उनका मानना है कि जो पढ़ाया जाए, उसे उसी दिन पूरा करना चाहिए। मॉक टेस्ट में कम अंक आने पर निराश नहीं होना चाहिए। खुद पर विश्वास बनाए रखना सबसे जरूरी है। उनकी यह सोच पारंपरिक लेकिन प्रभावी अध्ययन पद्धति को फिर से प्रासंगिक बनाती है।
इस वर्ष झारखंड के छात्रों ने सभी प्रमुख स्ट्रीम में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। आर्ट्स (12वीं) में जमशेदपुर की स्नेहा दत्ता ने 98.25% अंक लाकर स्टेट टॉपर बनीं। कॉमर्स (12वीं) में धनबाद के प्रतीक कुमार अग्रवाल ने 99% अंक प्राप्त कर शीर्ष स्थान हासिल किया। 10वीं (आईसीएसई) में गोड्डा के माउंट एसीसी स्कूल के छात्र अंकित कुमार ने 99.4% अंक लाकर स्टेट टॉपर बने।
अंकित कुमार की पृष्ठभूमि भी प्रेरणादायक है। उनके पिता रमेश चंद्र मंडल एक किसान हैं, जो यह दर्शाता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद भी कड़ी मेहनत और लगन से बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
शांभवी तिवारी की सफलता केवल अंकों की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक संकेत भी देती है। आज जब शिक्षा और तकनीक का गहरा संबंध बन चुका है, ऐसे में बिना सोशल मीडिया और निजी मोबाइल के नेशनल टॉपर बनना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या डिजिटल माध्यम वास्तव में जरूरी हैं या सिर्फ सहायक? क्या पारंपरिक अध्ययन पद्धति आज भी सबसे प्रभावी है?
झारखंड के इन छात्रों की उपलब्धियां यह स्पष्ट करती हैं कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। शांभवी तिवारी की कहानी यह सिखाती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और ध्यान भटकाने वाले कारकों से दूरी बनी रहे तो कोई भी छात्र राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है। यह उपलब्धि न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

