“आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मंत्री इरफान अंसारी के बिगड़े बोल को सरकार इस विवाद को कैसे संभालती है। सफाई देकर या संवाद बढ़ाकर? क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सवाल पूछना ही पत्रकारिता की असली ताकत है और उसी से सत्ता की जवाबदेही तय होती है…
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड की सियासत में मीडिया और सत्ता के रिश्तों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। खुद को झामुमो के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का हनुमान घोषित करने वाले कांग्रेस के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी के एक बयान ने न सिर्फ राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, खासतौर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हजारीबाग की घटना से शुरू हुआ विवादः मामला हजारीबाग में एक पत्रकार के साथ कथित मारपीट से शुरू हुआ, जहां एक न्यूज चैनल के पत्रकार ने सवाल पूछा तो उसके साथ बदसलूकी और पिटाई की खबर सामने आई। इस घटना ने पहले ही सरकार की छवि पर सवाल खड़े कर दिए थे।
लेकिन विवाद तब और गहरा गया जब झारखंड कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने पूरे प्रकरण को राजनीतिक तूफान में बदल दिया।
मेरे कारण चलती है आपकी दुकानदारीः पत्रकारों के सवालों के जवाब में अंसारी ने कहा कि मीडिया वाले लाख विरोध करें, लेकिन मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है। पत्रकार हमारे अपने हैं। मेरे कारण आपकी दुकानदारी चलती है, मेरे चलते आपकी टीआरपी बढ़ती है।
यह बयान कई मायनों में विवादास्पद है। एक ओर वे पत्रकारों को भाई और अपने अंग बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मीडिया की भूमिका को अपने प्रभाव से जोड़कर उसे कमतर आंकने का संकेत भी दे रहे हैं।
मंत्री ने हजारीबाग की घटना पर झूठी सफाई देते हुए कहा कि वहां कोई मारपीट नहीं हुई। उनके मुताबिक वे पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे । उसी दौरान एक युवक अपनी बहन की मृत्यु को लेकर भावुक होकर उनसे बात करना चाहता था। लेकिन मीडिया चतरा से जुड़े सवाल पूछ रही थी। इस पूरे मुद्दे को विपक्ष, खासकर भाजपा डायवर्ट कर रही है।
अहंकार का प्रदर्शन इस बयान के बाद भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि यह बयान सत्ता के अहंकार को दर्शाता है। पत्रकारों को दुकानदार कहना लोकतंत्र का अपमान है। सरकार आलोचना से बचने के लिए मीडिया को दबाने की कोशिश कर रही है।
मीडिया-सत्ता संबंध किस दिशा में? यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि क्या सत्ता और मीडिया के बीच का संतुलन बिगड़ रहा है?
विश्लेषकों के मुताबिक लोकतंत्र में मीडिया चौथा स्तंभ माना जाता है। उसका काम सत्ता से सवाल पूछना है, न कि उसकी टीआरपी मशीन बनना। जब कोई मंत्री मीडिया की भूमिका को अपने प्रभाव से जोड़ता है तो यह स्वतंत्र पत्रकारिता की आत्मा पर चोट मानी जाती है ।
झारखंड की राजनीति में संभावित असरः यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब झारखंड में राजनीतिक माहौल पहले से ही संवेदनशील है। सरकार पर प्रशासनिक पारदर्शिता के सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष लगातार हमलावर है। और अब मीडिया के साथ टकराव ने एक नया मोर्चा खोल दिया है ।
बहरहाल, इरफान अंसारी का बयान सिर्फ एक स्लिप ऑफ टंग नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सत्ता की सोच का प्रतिबिंब माना जा रहा है। हजारीबाग की घटना और उसके बाद की प्रतिक्रियाएं यह बताती हैं कि झारखंड में मीडिया और सरकार के रिश्ते एक नाजुक दौर से गुजर रहे हैं।

