Gopalganj Bridge Collapse: ढलाई के साथ ध्वस्त हुआ नाबार्ड के 3 करोड़ का पुल !
The bridge being built on the Ghoghari river in Sidhwalia block collapsed during construction, prompting an inquiry.

पटना / गोपालगंज (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। बिहार में गोपालगंज जिले के सिधवलिया प्रखंड स्थित घोघारी नदी पर बन रहा लगभग तीन करोड़ रुपये की लागत का पुल ढलाई के दौरान ही ध्वस्त (Bridge Collapse) हो गया। राहत की बात यह रही कि घटना के समय कोई मजदूर या स्थानीय व्यक्ति इसकी चपेट में नहीं आया, अन्यथा यह हादसा जानलेवा साबित हो सकता था।
यह पुल NABARD के वित्त पोषण से बन रहा था और निर्माण कार्य ग्रामीण कार्य विभाग-2 की निगरानी में कराया जा रहा था। 29.60 मीटर लंबा यह पुल बखरौर कुर्मीटोला के पास 2.89 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जा रहा था। निर्माण की जिम्मेदारी बापूधाम कंस्ट्रक्शन कंपनी छतौनी (पूर्वी चंपारण) को दी गई थी।
ढलाई के दौरान ही ढह गया ढांचाः प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पुल पर कंक्रीट की ढलाई का काम चल रहा था। इसी दौरान अचानक संरचना का एक हिस्सा झुक गया और देखते ही देखते पूरा स्पैन नदी में धंस गया। लोहे की सरियों से जकड़ा ढांचा पानी और कीचड़ में समा गया। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि पुल का मध्य भाग संतुलन खो बैठा, जिससे तकनीकी खामी या सपोर्ट सिस्टम की कमजोरी की आशंका प्रबल हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ढलाई के समय शटरिंग, सेंटरिंग और लोड बैलेंसिंग की प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील होती है। यदि इस चरण में सामग्री की गुणवत्ता या तकनीकी निगरानी में कमी रह जाए, तो पूरी संरचना ध्वस्त हो सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मानक प्रक्रियाओं का पालन किया गया था?
समय सीमा और निगरानी पर प्रश्नः जानकारी के अनुसार पुल निर्माण कार्य 7 मार्च 2025 से शुरू हुआ था और इसे 6 मार्च तक पूरा करना था। निर्माण एजेंसी को पांच वर्षों तक रख-रखाव की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। इसके बावजूद निर्माण के अंतिम चरण में ही पुल का गिर जाना परियोजना की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
क्या साइट पर नियमित तकनीकी निरीक्षण हो रहा था? क्या कंक्रीट और सरिया की गुणवत्ता का परीक्षण किया गया? क्या इंजीनियरिंग सुपरविजन पर्याप्त था? ये वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर अब जांच में तलाशा जाएगा।
पुल नहीं, सिस्टम ध्वस्त हुआ हैः स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल एक पुल का गिरना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रतीक है। उनका आरोप है कि निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग हुआ और निगरानी में लापरवाही बरती गई। यदि समय-समय पर गुणवत्ता की जांच होती, तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
बिहार में हाल के वर्षों में पुल और सड़कों से जुड़े हादसों की पुनरावृत्ति ने भी जनता के मन में अविश्वास की भावना को मजबूत किया है। ऐसे में यह घटना प्रशासन और निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही को कटघरे में खड़ा करती है।
जांच का आश्वासन, कार्रवाई की प्रतीक्षाः नाबार्ड के डीडीएम डॉ. अनुपम लाल कुसुमाकर ने इसे इंजीनियरिंग विभाग और निर्माण कंपनी की विफलता बताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मामले की विस्तृत जांच कराई जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच कितनी पारदर्शी होती है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदारों पर वास्तविक कार्रवाई होती है या मामला केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा।
विकास बनाम भरोसा की अहम चर्चाः घोघारी नदी पर बन रहा यह पुल स्थानीय ग्रामीणों के लिए आवागमन का महत्वपूर्ण साधन बनने वाला था। इसके ध्वस्त होने से न केवल करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि पर प्रश्न उठे हैं, बल्कि विकास योजनाओं की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई है।
यह घटना केवल एक तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, निगरानी तंत्र और निर्माण गुणवत्ता की सामूहिक परीक्षा है। यदि इससे सबक लेकर प्रणालीगत सुधार नहीं किए गए,तो पुल नहीं, सिस्टम ध्वस्त हुआ है जैसी जनभावनाएं और मजबूत होंगी।

स्रोतः मुकेश भारतीय/मीडिया रिपोर्ट विश्लेषण





