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    Sunday, July 21, 2024
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      तब तक ऐसा नहीं होता, जरूरी है देश में जातीय जनगणना !

      एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क डेस्क / धनंजय कुमार जातिगत भेदभाव इस देश का बड़ा दुर्भाग्य है। लेकिन बावजूद इसके मैं जातीय जनगणना के पक्ष में हूँ, वो इसलिए कि जब जातियों को मानने वाले और बनाए रखने वाले अपनी जाति पर गर्व करते हैं, तो मतलब होता है कि उनकी जाति श्रेष्ठ है।

      और जब उनकी जाति श्रेष्ठ है, तो मतलब है, बहुत सी जातियाँ हैं, जो कमतर हैं, जो उस जाति में जन्म लेने की वजह से मनुष्य का जीवन नहीं जी सकते। और कुछ लोग है जो बस उस जाति में जन्म लेने की वजह से आदरणीय और पूजनीय हो जाते हैं। व्यक्तिगत गुण भले उनमें लकड़बग्घे वाले हों।

      जातीय जनगणना के विरोध में ज्यादातर वही हैं, जो जाति के आधार पर सवर्ण होने का सुख भोगते अपनी जाति पर गर्व करते हैं और संविधान द्वारा दिए गए आरक्षण को गलत मानते हैं। जो जाति से ब्राह्मण है, उन्हें मंदिर में पुजारी होने का अधिकार है,

      लेकिन जो शूद्र है या अछूत है (संविधान ने इस शब्द को असंवैधानिक और अपराध घोषित किया हुआ है, लेकिन विडंबना देखिए संविधान के लागू होने के 72 साल बाद भी व्यवहार में अछूत हर जगह विद्यमान हैं) कथित धर्म का जानकार होने के बाद भी उसे मंदिर के पुजारी आ अधिकार देने को समाज तैयार नहीं है।

      ब्राह्मण मंदिरों पर भी कब्जा बनाए रखना चाहते हैं और नौकरियों पर भी और ज़मीनों पर भी। वो कथित छोटी जातियों को कहीं भी सम्मान का पद नहीं देना चाहते। हालांकि दूसरा सच ये है कि कथित छोटी जातियों को संविधान ने जो बराबरी का अधिकार दिया है, वो भी ब्राह्मणों की वजह से ही मिला है।

      गोखले का असर गांधी पर और गांधी का असर नेहरू पर, यही वजह है कि कांग्रेस के बहुतेरे सवर्ण नेताओं के विरोध के बाद भी अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित संविधान संसद में पास हुआ। लोग संविधान के लागू होने का श्रेय भले अकेले अंबेडकर को देते हैं, लेकिन सच ये है कि अगर गोखले-गांधी-नेहरू नहीं होते, तो कथित छोटी जातियाँ काग़ज़ पर भी बराबरी का हिस्सेदार नहीं हो पातीं।

      कथित हिन्दूवादी समूहों ने गांधी को इसी वजह से मारा कि उन्होंने मनुस्मृति की जगह संविधान को श्रेष्ठ माना और मनवाया। नेहरू को पिछले 75 साल से ऐसे लोग गालियां दे रहे हैं तो इसलिए कि तमाम विरोध के बाद भी मनुस्मृति की जगह तमाम सुधारों वाला संविधान देश की व्यवस्था में लागू कर दिया।

      आज जातीय जनगणना के लिए तिलक, सावरकर और श्याम प्रसाद मुखर्जी के उत्तराधिकारियों की पार्टी बीजेपी भी सहमत हुई है, तो इसलिए संविधान ने कथित नीची या छोटी जातियों को नागरिक होने का अधिकार दिया है। उनके भी उतने ही अधिकार हैं, जितने कथित उच्च वर्ण के। संविधान नहीं होता तो ये संभव नहीं था।

      नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक समझ और सूझबूझ से वो कर दिया है, जिसे गांधी-नेहरू-लोहिया या अंबेडकर साकार करना चाहते थे। जातीय जनगणना के आधार पर ही देखा और समझा जा सकेगा कि जातिगत संख्या के आधार पर किसे कितना हिस्सा मिलता है।

      जातिभेद, हीनता और गर्व इस देश की सच्चाई है। अनपढ़ों की तो छोड़िए, पढे लिखे भी इसे उसी कट्टरता से मानते हैं। ऐसे में नौकरियों में जातीय आधार पर बहाली जरूरी है।

      यह भी सही है कि जातीय आधार पर भी न्याय दूर की कौड़ी है। जातियों में जो आगे बढ़ गए हैं, वो अपनी ही जातियों के लोगों का भी खून चूसने से बाज नहीं आते, आरक्षण में भी जालसाजी करके वो बार बार लाभ ले रहे हैं, लेकिन यह प्रशासनिक-कानूनी मसला है।

      लेकिन जातीय भेदभाव, जातिसूचक गालियों और जाति के आधार पर दुर्व्यवहार पर शिकंजा कसेगा तो। जब दफ्तर में सवर्ण और दलित का हिस्सा संख्या के आधार पर होगा तो जाहिर है, गाली या व्ययहार के समय दलित बेचारे नहीं रहेंगे। एक संतुलन का भाव बनेगा।

      जातीय आधार को लेकर अक्सर यह बात कही जाती है कि आरक्षण की वजह से प्रतिभाओं के साथ अन्याय हो जाता है। यह बिल्कुल गलत ख्याल है। प्रतिभा सिर्फ कुछ जाति विशेष में होती है ये मानना संकीर्णता और अहंकार भरी अज्ञानता है।

      अगर कथित छोटी जातियों को भी पारिवारिक-सामाजिक और आर्थिक समानता मिले तो वो भी उसी तरह अपनी योग्यता साबित कर पाएंगे, जैसे किसी अमीर सवर्ण। सवर्णों में भी जो गरीब हैं, उनके बच्चे पिछड़ते जा रहे हैं, क्यों? क्या गरीब सवर्णों में प्रतिभा की कमी है? नहीं, उन्हें आगे बढ़ने के लिए जो पारिवारिक और आर्थिक, कुछ हद तक सामाजिक भी, आधार मिला, वो कथित छोटी जातियों जैसा ही मिला, इसलिए।

      इसलिए वो ब्राह्मण और राजपूत जैसे कथित श्रेष्ठ जातियों में जन्म लेने के बाद भी बिल्डिंग का वाचमैन होने और पान की गुमटी चलाने को मजबूर हैं। उन्हें वैसा माहौल नहीं मिला कि वे पढ़ाई का महत्व समझ पाएं और ठीक से पढ़ाई कर पाएं।

      पंडित नेहरू ने सरकारी स्कूलों की नींव इसीलिए मजबूत की थी कि सबको पढ़ने का समान अवसर मिले, लेकिन निजीकरण ने क्या किया? अब गरीब आदमी का बच्चा पढ़ ही नहीं पाएगा- चाहे वो ब्राह्मण का बेटा हो या कथित छोटी जाति का।

      गाँव में हम देखते हैं- जो वहाँ रहने को अभिशप्त हैं, वो चाहे ब्राह्मण के बेटे हों या दलित के, सबकी आर्थिक-सामाजिक और बौद्धिक स्थिति एक सी है। हमारे गाँव में ब्राह्मण का बेटा भी शराब पीकर नाली में गिरा मिलता है और कथित छोटी जाति का बेटा भी साफ कपड़े पहनकर बच्चों को पढ़ा रहा है।

      ये साबित करता है प्रतिभा किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है, प्रतिभा सबमें होती है, जरूरत है एक से पारिवारिक-सामाजिक माहौल की।

      अभी एक खबर पढ़ी, जिस दलित लड़के को ब्याह के समय सवर्णों ने घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया, वह युवक यूपीएससी पास कर गया। अब वो कलेक्टर या एसपी बनेगा या किसी और बड़े पद पर जाएगा। ये कैसे संभव हुआ? संविधान की वजह से। इसलिए कम से कम पिछड़ों और दलितों को तो संविधान की महिमा समझ में आनी चाहिए।

      हालांकि कल गरीब सवर्णों को भी संविधान की महत्ता समझ में आएगी। उन्हे तिलक के विचार पढ़ना चाहिए कि वह जातियों और शिक्षा को लेकर क्या राय रखते थे। मनुस्मृति को मानने वाले जातियों के आधार पर भी नहीं, हैसियत के आधार पर व्यवहार करते हैं।

      वह जातीय भेद सिर्फ इसलिए खड़ा करते हैं, ताकि गरीब स्वजातीयों की भीड़ जरूरत पड़ने पर उनकी रक्षा कर सके। ये हर जाति को समझना है। जब आपका अपना भाई आपके और अपने बेटे में फ़र्क करता है, तो जातीय आधार पर कैसे उससे सहायता की अपेक्षा रखते हैं?

      हम जिस दिन ये समझ लेंगे, जातीय आधार खत्म हो जाएगा, फिर सिर्फ अमीर और गरीब दो जातियाँ होंगी, और उस दिन जातीय जनगणना की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी। लेकिन जबतक ऐसा नहीं होता, जातीय जनगणना जरूरी है।

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